सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 894, कुल 984 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 894

परिशिष्ट ट ८७
श्रीकृष्ण द्वारा गुह्यक शंखचूड़ के वध की कथा भागवत (१०:३४;२८) में दी गयी है । एक समय
शंखचूड़ गुह्यक गोपियों को लेकर उत्तर दिशा की ओर भाग गया । श्रीकृष्ण उस अधम गुह्यक के पास पहुँचे ।
गुह्यक गोपियों को छोड़कर भाग गया । श्रीकृष्ण ने उसका पीछा किया । वध कर मणि लेकर वापस आये ।
इससे दो बातें स्पष्ट होती हैं । गुह्यक दस्यु आदि अनुचित कार्य करते थे । उनका निवास स्थान उत्तर दिशा
में था । मथुरा से उत्तर दिशा पंजाब, कश्मीर, हिमाचल की ओर पड़ता है । उत्तर दिशा का अर्थ प्रायः
हिमालय का उत्तरीय पर्वतीय अंचल माना जाता रहा है ।
प्रद्युम्न तथा शम्बरासुर वधके प्रसंग में गुह्यकों का पुनः उल्लेख भागवत (१०:५५:२३) में किया
गया है । तदनन्तर शम्बरासुर ने यक्ष, गन्धर्व, पिशाच, नाग और राक्षसों की सैकड़ों माया का प्रयोग किया ।
गुह्यक मायावी थे । युद्ध में माया का प्रयोग करते थे । यह बात अन्य पुराणों में भी कही गयी है । शम्बर ने
गुह्यकों की माया का प्रयोग किया । गुह्यकों ने युद्ध में भाग नहीं लिया था परन्तु उनकी युद्ध नीति का प्रयोग
शम्बर ने प्रद्युम्न के विरुद्ध किया था ।
भागवत (११:१२:३) में पुनः दैत्य, राक्षस, गन्धर्व, अप्सरा, नाग, सिद्ध, चारण, गुह्यक को एक
ही वर्ग में रखा गया है । गुह्यकों के पूर्वज ब्रह्मर्षि थे । देव योनि वर्ग में थे । इसका उल्लेख भागवत (११-
१४:५) में किया गया है । इन ब्रह्मर्षियों की संतान देवता, दानव, गुह्यक, मनुष्य, सिद्ध, गन्धर्व, विद्याधर,
चारण, किन्नर, नाग, राक्षस, और किम्पुरुष आदि थे ।
रामायण में कैलास के समीप गुह्यकों के रहने की बात कही गयी है । सुग्रीव ने उत्तर दिशा में
माता सीता को खोजने के लिए जिन देशों तथा जातियों का नाम लिया है उनमें गुह्यक थे । वाल्मीकि रामा-
यण किष्किन्धा काण्ड सर्ग ४३ श्लोक ३ मे उल्लेख आता है—'वहाँ यक्षों के स्वामी विश्रवाकुमार श्रीमान्
राजा कुबेर, जो समस्त विश्व के लिए वन्दनीय है, धनदाता है, यक्षराज गुह्यको के साथ निवास
करते हैं ।
गुह्यकों का उल्लेख यक्षो के साथ नीलमत पुराण में किया गया है :
आश्रमानि तथा मध्वश्चकुस्तीर्थान्यनेकंशः ।
गन्धर्वाप्सरसो यक्षाः शैलेन्द्राश्च सगुह्यकाः ॥ 186 = २५९-२६०
× × ×
गुह्यकेश्वर का भी उल्लेख नीलमत में मिलता है :
गुहेश्वरः शतमुखा यष्टिकापथ एव च ।
कदम्बेशस्तथा पुण्यः क्षेत्रं चैव समन्ततः ॥ 118 = १६०-१६१
यावच्छत सुखं तीर्थं पावतीर्थं गुह्येश्वरम् ।
तावत् क्षेत्रं समं पुण्यं चाराणस्याथवाधिकम् ॥ 119 = १६१-१६२
कल्हण के गुह्यक शब्द के व्यवहार से गुह्यक जाति की सत्यता तथा वास्तविकता पर विशेष प्रकाश
पड़ता है । पुराणों में गुह्यकों को यक्षों की एक उपजाति माना है । कल्हण के इस वाक्य से कि राजा ने
गुह्यको से सहायता ली (रा० १:१५६) इसका अर्थ है पुल निर्माण का कार्य उनसे लिया । इससे मालूम
होता है । उस समय गुह्यक नाम की जाति कश्मीर में रहती थी । यह जाति परिश्रमी तथा निपुण थी । पुल