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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 892, कुल 984 में से

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पृष्ठ 892

परिशिष्ट 'ट'
गुह्यक
( तरंग १ : १५६ पृष्ठ : २१३ )
गुह्यक दस देवयोनियों में यक्षों तुल्य एक योनि हैं। अमर कोश के अनुसार दस निम्नलिखित
देवयोनियाँ हैं :
विद्याधराप्सरो-यक्ष-रक्षो-गन्धर्व-किन्नराः ।
पिशाचो गुह्यकः सिद्धो भूतोऽमी देवयोनयः ॥ १:१:११
कुवेर को गुह्यकेश्वर तथा वैश्रवण भी कहा गया है । गुह्यक उस वर्ग के लिए प्रयुक्त किया गया
है जो कुवेर के कोष की रक्षा करते थे । उनके स्वामी गुह्यकेश्वर थे ।
कुवेरस्त्र्यम्बकसखो यक्षराट् गुह्यकेश्वरः । १:२:७१
मनुष्यधर्मा धनदो राजराजो धनाधिपः ।
किन्नरेशो वैश्रवणः पौलस्त्यो नरवाहनः ॥ १:२:७२
बौद्ध भास्कर्य किंवा मूर्तिकला में कुबेर तथा यक्षों का प्रमुख स्थान है । कुवेर की अलकापुरी का
बड़ा सुन्दर वर्णन मेघदूत में कालिदास ने किया है । यक्ष का स्वामी कुवेर है । बौद्ध मूर्तियों में कुवेर तथा
यक्ष भगवान् की पूजा करते दिखाये गये हैं ।
गुह्यक शब्द का एक जाति के रूप में प्रयोग मिलता है । उन्हें देवयोनि के अन्तर्गत एक जाति महा-
भारत ने माना है । ( आदि पर्व १८६ : ७ ) इस जाति के लोग द्रौपदी के स्वयंवर के समय उपस्थित थे ।
गुह्यकेश्वर अर्थात् कुवेर की सभा में गुह्यकों का स्थान था । ( सभा पर्व १० : ३ ) गन्धमादन पर्वत पर
उनका निवास कहा गया है । भीमसेन ने उन्हें वहीं गदा से प्रहार किया था । ( शल्य पर्व ११ : ५५-५६ )
गुह्यक को यक्ष भी कहा गया है ( सभा पर्व १० : १५ ) ।
पुराणों में कुवेर के अनुयायी तथा दानव गुह्यक कहे गये हैं । ( भागवत पुराण १ : ९ : ३, १० :
३४ : २८, २ : १० : ३७, ४ : ४ : ३४ ) गुह्यक जाति हिमालय में निवास करती थी । ( भागवत ४ :
५ : २६, ४ : १० : ५ ) वे माया विद्या में निपुण थे । ( भागवत पुराण १० : ५५ : २३ ) गुह्यकों के
देवता शिव थे । वे शिव के अनुयायी थे । ( भागवत पुराण ६३ : १० ) गुह्यको ने पुण्यात्माओं के संसर्ग से
स्वर्ग प्राप्त किया था । ( भागवत पुराण ११ : १२ : ३, ११-१४ : ५, ) गुह्यकों को यक्षों तथा राक्षसों
की श्रेणी में रखा गया है । ( ब्रह्माण्ड पुराण ३ : ७ : १६७-१६८, ४ : २ : २६, मत्स्य पुराण १३ : १७,
१२१, २ ) गुह्यको के आचरण तथा कर्तव्यों का विशद वर्णन मत्स्य पुराण ( १८० : ९०, २४६ : ५३, )
तथा वायु पुराण ( अध्याय ६९ : तथा १०१ ) में मिलता है । गुह्यक वर्ग को वायु पुराण ( अध्याय ३० ) में
हिमालयवासी कहा गया है । वे 'शंकर पार्वती के साथ विराजमान थे ।' उस समय आदित्यगण, वसुगण,
अश्विनीकुमार, गुह्यकों को साथ लेकर वैश्रवण अर्थात् कुवेर, सनत्कुमार, अंगिरादि देवर्षि, विश्वावसु, गन्धर्व,
नारद, कैलास निवासी यक्षराज महामुनि उशना तथा अप्सराऐं आदि उमा, शंकर की उपासना करने लगीं ।