राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८४ राजतरंगिणी
पौराणिक परम्परा के अनुसार गान्धार में सिन्धु नदी के दोनों तटों पर दो नगर तक्षशिला तथा
पुष्कलावती आबाद थे । तक्षशिला सराय कला रेल जंक्शन से रावलपिण्डी के उत्तर-पश्चिम २० मील
पर हरो नदी की उपत्यका में आबाद है । यहाँ ३ नगरों के ध्वंसावशेष हैं। धुर दक्षिणी ध्वंसावशेष
का स्थान उठती अधित्यका मीर टीला पर है । पुष्कलावती किंवा पुष्करावती नगर स्वात प्रदेश में परगना
चारसद्दा मील डयारत अंचल में १७ मील उत्तर-पूर्व पेशावर में स्थित है । स्वात उपत्यका को प्राचीन काल
में उड्डियान देश कहते थे । स्कन्द पुराण की तालिका में उसकी क्रम संख्या १३ तथा ग्राम-संख्या ९ लाख
दी गयी है ।
सातवीं शताब्दी में हुएनसांग जिस समय उत्तरापथ में प्रवेश किया उस समय उदभाण्डपुर कपिशा
के राजा की द्वितीय राजधानी थी । उस राज्य में लम्पक (लगमान) नगर, नगरहार (जलालाबाद),
वर्ण (वन्नू) तथा जागूड़ अर्थात् दक्षिणी अफगानिस्तान गजनी पड़ता था । गजनी का नाम स्कन्द पुराण में
गाजनक आया है । उसके ग्रामों की संख्या ७२ हजार दी गयी है । देशों की तालिका में उसकी क्रम-संख्या
७ है ।
गान्धार देश के विषय में हुएनसांग लिखता है । गान्धार की राजधानी पुरुषपुर थी । राजवंश
लुप्त हो गया था । कपिशा राज्य के अन्तर्गत था । नगर तथा ग्राम उजड़ गये थे । बहुत थोड़े लोग वहाँ
निवास करते थे । श्री लक्ष्मीधर ग्यारह पिशाच देशों में गान्धार को भी मानते हैं । यहाँ अर्थ यह लगाना
चाहिए कि वहाँ के लोग पैशाची भाषा मानते थे । (कम्परेटिव ग्रामर आफ प्राकृत लेंगुवेज पैरा-२७)
स्कन्द पुराण के देशों में तथा महावस्तु के जनपदों में गान्धार और कम्बोज जनपद का नाम नहीं
है । किन्तु अंगुत्तर निकाय में १६ जनपदों में गान्धार, कम्बोज का नाम दिया गया है । महावंश में शिवि
तथा दशार्ण दो अन्य जनपदों का उल्लेख किया गया है । महावस्तु में बुद्ध ज्ञान प्रचारार्थ दिये गये नामों में
शिवि देश सम्मिलित है । शिवि स्कन्द पुराण के देशों की तालिका में ४५वाँ नाम है । उसके ग्रामों की
संख्या १० हजार दी गयी है । कम्बोज जनपद का भी उल्लेख है । स्कन्द पुराण की तालिका में क्रमसंख्या
१९ तथा ग्रामों की संख्या १० लाख दी गयी है । गान्धार जनपद स्कन्द पुराण तथा महावंश के रचना-
काल में अपना महत्त्व खो चुका था । उसका महत्त्व शिवि एवं दशार्ण जनपदों को जो उसी क्षेत्र के थे मिल
गया था । बौद्ध काल में शिवि देश अपने सुन्दर दुशालों के लिए अत्यन्त प्रसिद्ध था । चण्डप्रद्योत अवन्ती के
राजा ने जीवक को पाण्डु रोग से मुक्त होने पर शिवि का बना दुशाला दिया था । जीवक तक्षशिला का
स्नातक था । यहाँ उसने आयुर्वेद तथा चिकित्सा शास्त्र की शिक्षा प्राप्त की थी । तक्षशिला में उन दिनों
भारतवर्ष के कोने-कोने से यथा लाट देश, कुरु देश तथा शिवि देश से विद्यार्थी शिक्षा प्राप्ति निमित्त जाया
करते थे । विनय पिटक में स्पष्ट उल्लेख है । जीवक ने इन दुशालों (सिवेयक दुस्स) को भगवान् बुद्ध को
अर्पित किया था । शिवि जातक में कोशल के राजा प्रसेनजित ने भगवान् बुद्ध को १ लाख मूल्य के शिवि
राज्य में बने वस्त्र अर्थात् सिवेयक वस्त्रं दिया था । मालूम होता है कि गान्धार क्षेत्र उन दिनों शिवि
तथा दशार्ण देशों में मिल गया था ।
श्यान (थाईलैण्ड) के उत्तर स्थित यूनान प्रान्त का प्राचीन भारतीय नाम गान्धार था । ईसा से
दो शती पूर्व वहाँ भारतीय आबाद हो गये थे । तेरहवीं शताब्दी तक यूनान का नाम गान्धार ही प्रचलित था।
भारतीय गान्धार पश्चिमी पाकिस्तान का पेशावर तथा रावलपिण्डी का जिला था ।