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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 760, कुल 984 में से

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पृष्ठ 760

तृतीय तरंग ५७७
गव्यूतिमात्रमासन्ने देवीधामनि धैर्यवान् ।
धुन्वन् कराभ्यां मधुपान् धावति स्म स धीरधीः ॥४०७॥
४०७. देवी मन्दिर के गव्यूति मात्र शेष रह जाने पर धीरधी एवं धैर्यशाली वह हाथों
से मधुपों (भ्रमरों) को हटाते हुए दौड़ने लगा ।
अथ स्नाय्वस्थिशेषाङ्गो लूनमांसः षडङ्घ्रिभिः ।
कराभ्यामक्षिणी रक्षन् देव्यायतनमापदत् ॥४०८॥
४०८. अनन्तर स्नायु एवं अस्थि मात्र शेष षट्चरणों (भ्रमरों) से खण्डित मांस
वाला हाथों से आँखों की रक्षा करते हुए देवी आयतन में पहुँचा ।
प्रशान्ते भृङ्गसंपाते प्रकाशमवलोकयत् ।
स देव्याः पादयोरग्रे पपातोद्भ्रान्तजीवितः ॥४०९॥
४०९. भृंग (भ्रमर) संपात (गिरना—आक्रमण) शान्त होने पर उद्भ्रान्त जीवित
(प्राण शंकित) प्रकाश देखते हुए वह देवी के चरणों के गिर पड़ा ।
स्तोकावशेषप्राणं तं देव्याश्वासयितुं ततः ।
अभिरामं वपुः कृत्वा प्रस्पर्शङ्गेषु पाणिना ॥४१०॥
४१०. तदनन्तर देवी ने स्वल्प अवशिष्ट प्राण वाले उसे अभिराम शरीर प्रदान कर
आश्वासन.हेतु, अंगों पर पाणि-स्पर्श किया ।
दिव्येन पाणिस्पर्शेन तेन पीयूषवर्षिणा ।
स क्षिप्रासादितस्वास्थ्यो दिक्षु चिक्षेप चक्षुषी ॥४११॥
४११. उस पीयूषवर्षी दिव्य पाणि स्पर्श से वह शीघ्र ही स्वास्थ्य प्राप्त कर दिशाओं
में उसने दृष्टिपात किया ।
प्रविष्टमात्रः प्रैक्षिष्ट सिंहविष्टरसीम्नि याम् ।
घोराकारां स तां देवीं तदाऽद्राक्षीन्न तां पुनः ॥४१२॥
४१२. उस समय प्रवेश करते ही उसने सिंह विष्टरासीन घोराकृति जिस देवी को
देखा, उसे पुनः नहीं देखा ।
ददर्श पुनरुद्यानलतावासे विलासिनीम् ।
स्थितां पुष्करिणीतीरे श्यामां पुष्करलोचनाम् ॥४१३॥
४१३. (उसने) पुष्करिणी तट पर उद्यान लता गृह में विलासिनी, पुष्करलोचनी
श्यामा स्त्री (षोडश वर्षीया) को स्थित देखा ।
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