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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 761, कुल 984 में से

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पृष्ठ 761

५७८ राजतरंगिणी
गृहीतहारमुक्तार्घा बद्ध्वा पीनस्तनाञ्जलिम् ।
महार्हैः कान्तिकुसुमैः यौवनेनार्चिताङ्गकाम् ॥ ४१४ ॥
४१४. यौवन मुक्ता'हार रूपी अर्घ्य से एवं पीन स्तन रूपी कुसुमों से (जिसके)
अंगों को पूजित (अर्चिता) कर रहा था।
यावकाहारिणौ पादौ दधतीं कृच्छ्रचारिणौ ।
स्तनच्छन्नमुखं द्रष्टुं तपस्यन्ताविवाऽन्वहम् ॥ ४१५ ॥
४१५. दुष्कर आचरणशील' उसके चरण जो कि यव के आहारी अथवा यावक²
(महावर—अलक्तक—अलता) से सुन्दर थे, स्तन की ओट में स्थित मुख को देखने के लिये
मानो प्रतिदिन तपस्या कर रहे थे ।
श्लोकसंख्या ४१४ में 'गृहीत' का 'गृहीत्वा' ; लाषी चरण मुख का दर्शन नही कर पाते थे ।
'क्तार्घा' का 'क्तार्घान्' ; 'बद्ध्वा' का 'बद्धा', इसका एक भाव यह भी है—उसके अलता से
एवं 'बद्ध' पाठभेद मिलता है । रंगे सुन्दर चरण जो मालूम पड़ते थे कि कठिनता से
चल पाते थे और इस कामना से तपस्या कर रहे
पादटिप्पणियाँ : थे कि उसका मुख जो उसके स्तनों से छिपाया
४१४ (१) यौवन : कल्हण ने अपनी उपमा का देखा जा सके ।
उत्कृष्ट उदाहरण उपस्थित किया है। यौवन को (२) यावक यह शब्द श्लिष्ट है। इसका
उसने मुक्ताहार बनाया है; दोनों स्तनों को अंजलि दोनों अर्थ होता है। यव का आहार तथा महावर
के दोनों हाथ तथा दोनों स्तन के मध्य गहरे स्थान होता है। यव का आहार कुछ व्रतों पर करने की
को बद्ध अंजलि का गहरा स्थान एवं कान्ति को प्रथा कश्मीर मे थी ।
पुष्प बनाकर उसने अंजलि में रखकर दुर्गा की श्री रणजीत सीताराम पण्डित ने अर्थ
अद्भुत पूजा का रूपक बाँधा है। दुर्गा को पूजा दिया है—
तण्डुल की अपेक्षा मुक्ता से करना उत्तम माना Pink like new barley were her two
जाता है। दोनों का वर्ण उज्ज्वल है। feet which suffered distress and were
practising austerities for the sight of
४१५ (१) एक तपस्वी का चित्र चित्रित किया her face hidden by breasts' (Page 90.)
गया है। यव का आहार कर किसी इष्ट की प्राप्ति स्टीन निम्नलिखित अनुवाद किया है :
हेतु आचरण पूर्ण तपस्या करता है। उसी प्रकार She had feet which were most
उस कामिनी के मुख दर्शन हेतु उसके चरण तपस्या charmingly (coloured) with red lac
कर रहे थे। यह कवि के उत्प्रेक्षालंकार का एक (यावकाहारिणौ), which seemed to move
उदाहरण है। with difficulty and which appeared daily
to perform austerities in their desire to
इसका एक भाव यह भी है कि उत्तुंग पयो- see her face hidden by her breasts.
धर के बीच में पड़ जाने के कारण मुख के दर्शनाभि- (Page 109)