राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५७६ राजतरगिणी
अथोदतिष्ठन गर्तेभ्यो घोरा भ्रमरमण्डलाः ।
पक्षशब्दैः श्रुतिं घ्नन्तो मृत्युतूर्यरवैरिव ॥ ४०० ॥
४००. मृत्यु के तूर्य ध्वनि तुल्य पक्ष शब्दों से कान को फाड़ते हुए भयंकर भ्रमर
मण्डल गर्तों से निकले ।
ते तमुच्छुष्कमुल्लेपरेणुव्रणितलोचनाः ।
सहसा नाक्रमन्ते स्म प्रहरन्तोऽपि बाधितुम् ॥ ४०१ ॥
४०१. सूखे मृत्तिका लेप कणों से व्रणित लोचन ( घायल नेत्र ) वे भ्रमर सहसा आक्र-
मण न किये और प्रहार करने पर भी उसे पीड़ित न कर सके।
रेणुभिर्येऽन्धितास्त्वंशः ते न्यवर्तन्त षट्पदाः ।
तेऽखण्डयंस्तु मृन्लेपं न्यपतन् ये नवा नवाः ॥ ४०२ ॥
४०२. रेणुओं से अंधित नेत्र भ्रमर निवर्तित हो गये और जो नवीन-नवीन भ्रमर
आये, वे मृत्तिका लेप खण्डित किये ।
तैः खण्ड्यमान मुचण्डैः व्रजतो योजनत्रयीम् ।
क्रमान्मृत्कवचं तस्य पथि संक्षयमाययौ ॥ ४०३ ॥
४०३. तीन योजन मार्ग तय करते हुए उसका मृत्तिका-कवच प्रचण्ड उन भ्रमरों
द्वारा क्रम से खण्डित होकर पथ में ही नष्ट हो गया ।
ततो मुहुः प्रहरतां तेषां महिषचर्मणि ।
घारघटघटाघोषः प्रादुरासीद्भयंकरः ॥४०४॥
४०४. तदनन्तर पुनः महिष चर्म पर उनके प्रहार करने पर भयंकर घट घट का घोष
प्रादुर्भूत हुआ।
चतुर्थयोजनस्यार्धमतिक्रम्य विवेद सः ।
रणत्कारैर्द्विरेफांस्तान् अयोवर्माण पातिनः ॥४०५॥
४०५. चौथे योजन का अर्धांश पार करने पर लौह वर्म पर गिरते उन भ्रमरों को
झंकारों से जाना ।
धावंस्ततोऽतिवेगेन खण्ड्यमानेन षट्पदैः ।
स शस्त्रवर्मणामोचि चित्तं धैर्येण नो पुनः ॥४०६॥
४०६. तदनन्तर वह अति वेग से दौड़ने लगा। भ्रमरों से खण्ड्यमान शस्त्र वर्म ने
उसे त्याग दिया, परंतु धैर्य ने चित्त को नही त्यागा ।
श्लोक संख्या ४०३ में 'संक्षियन' का पाठभेद श्लोक संख्या ४०६ में 'वित्तं' का पाठभेद
'संक्षिप' मिलता है । 'चित्तं' तथा 'पुनः' का 'पुरः' मिलता है ।