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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 738, कुल 984 में से

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पृष्ठ 738

तृतीय तरंग १५९
वितस्तायां स भूपालो बृहत्सेतुमकारयत् ।
ख्याता ततः प्रभृत्येष तादृङ्नौसेतुकल्पना ॥ ३५४ ॥
३५४. उस भूपाल ने वितस्ता (नदी) पर बृहत् सेतु' का निर्माण कराया उस समय
से उस प्रकार का नौका द्वारा सेतु निर्माण ख्यात (प्रचलित) हुआ ।
श्रीजयेन्द्रविहारस्य बृहद्बुद्धस्य च व्यधात् ।
मातुलः स नरेन्द्रस्य जयेन्द्रो विनिवेशनम् ॥ ३५५ ॥
३५५. नरेन्द्र के मातुल जयेन्द्र ने जयेन्द्र विहार' का निर्माण कराया, और बृहद्^२
बुद्ध की स्थापना की ।

पाठभेद :
श्लोक संख्या ३५४ में 'ततः' का पाठभेद 'तदा'
मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
३५४ ( १ ) बृहत् सेतु—शाब्दिक अर्थ बड़ा
पुल होता है । कल्हण ने इस का पुनः उल्लेख त.
८ : ३१७१ में किया है। इस सेतु के स्थान का
निश्चयात्मक पता कल्हण नहीं देता । किन्तु पढ़ने से
प्रतीत होता है कि मक्षिका स्वामी ( मायसुम )
के पास इसे होना चाहिये था ।
कल्हण राजा हर्ष के समय ( रा० त०
७ : १५४८ ) तथा श्रीवर ( १ : ३ : ९६ ) में एक
नाव के पुल का वितस्ता पर उल्लेख करता है ।
वितस्ता पर आजादी ( सन् १९४७ ई० ) के
पूर्व केवल लकड़ो के पुल विभिन्न शैलो के, बने थे ।
कश्मीर का पर्यटक उनमे अत्यन्त प्रभावित होता था ।
जैन कदल वितस्ता पर बने श्रीनगर पुल का जैनुल
आवदीन बादशाह के समय में होना मिलता है ।
श्रीवर ने इसका उल्लेख तृतीय रा० त० १:३:१८,
१९) में किया है। यह पुल पन्द्रहवी शताब्दी में
वर्तमान था ।
प्रतीत होता है कि इसके पूर्व श्रीनगर में
नौका पाट कर पुल नही बनाया गया था । इसके
निर्माण के पश्चात् नाव पाटकर स्थाय पुल बनाने
की परम्परा प्रचलित हो गयी । अतएव ऐतिहासिक
दृष्टि से इस पद का महत्त्व है ।

३५५ ( १ ) जयेन्द्र विहार : ह्वेनसांग चनी
पर्यटक ने इस बिहार में दो वर्षो तक (सन् ६३१-
६३३ ई० ) निवास किया था । उसे 'चे मे इन तो
लो' के नाम से लिखा है । यह जयेन्द्र बिहार ही
है । यहाँ उसने अनेक शास्त्रों की शिक्षा प्राप्त
की थी ।
यह बिहार श्रीनगर की जामा मसजिद के
समीप था । सर वालर लारेन्स का कहना है कि
उसके समय में भी श्रीनगर में लद्दाख से आने
वाले बौद्ध लद्दाखी इस मसजिद के स्थान का पुराना
नाम 'स्ते-रमु स्वक-कंग' कहते थे । वे यहाँ की यात्रा
प्राचीन बिहार होने के कारण करते थे। यहाँ पूजा
करते थे ।
( २ ) बृहद् बुद्ध—सम्भवत' बृहद् बुद्ध का
विशाल प्रतिमा ठोस थी, जैसा कि ललितादित्य
ने कांस्य ताम्र अथवा अष्ट धातु की परिहासपुर में
निर्माण कराकर प्रतिष्ठित किया था। (त.४:२०३)
तरंग ४ : २०१ से प्रकट होता है कि जयेन्द्र
बिहार भस्म हो गया था । बुद्ध की प्रतिमा राजा
क्षेमगुप्त ने गलाकर सिक्का ढलवाया था । उसने
पीतल की प्रतिमा से ढले सिक्को का आमदनी से
क्षेम गौरीश्वर का मन्दिर निर्माण कराया था ।
श्रीनगर की अन्य बुद्ध प्रतिमाओ का उल्लेख राजा
हर्ष ( त. ७ : १०९७ ) तथा राजा सुस्सल के काल
में मिलता है। बृहद बुद्ध का उल्लेख चौदहवी