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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 737, कुल 984 में से

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पृष्ठ 737

५५८ राजतरङ्गिणी
२. काली श्री: तीसरे तथा चौथे पुल वितस्ता
के मध्य एक भव्य इमारत शाह हमदान की है।
इस स्थान पर काली का पवित्र जलस्रोत है। प्रवर-
सेन द्वितीय ने इस स्रोतस्थान पर मन्दिर निर्माण
कराया था। मन्दिर का नाम कालीश्री था।
इस समय इस महाल का नाम कलारापुर है।
यह शब्द कालीश्रीपुर अथवा कैलाशपुर का
अपभ्रंश प्रतीत होता है। निस्सन्देह कैलाश अथवा
काली का सम्बन्ध शिव से होता है।
यह मन्दिर सुलतान कुतुबुद्दीन (सन् १३७३-
९४ ई०) ने नष्ट किया था। इस मन्दिर के ध्वंसा-
वशेष से उसने खानखाह का शाह हमदान में निर्माण
कराया था। यह दो बार अग्नि से जल चुका है।
पुनः बनाया गया है।
स्थान अपनी प्राचीन गरिमा में भव्य रहा
होगा। लकड़ी की बहुत बड़ी इमारत बनी है।
शाह हमदान के नाम से प्रसिद्ध है। इसका प्रांगण
बड़ा है। प्रांगण में पुराने शिलाखण्ड बिखरे तथा
कहीं न कहीं लगे आज भी मैंने अपनी आँखों
से देखा था।
यह स्थान हिन्दू मुसलमान दोनों द्वारा पूजित
है। वितस्ता की तरफ कथा है कि हमदान खान-
खाह के पृष्ठ भाग से एक नाग अथवा जलस्रोत
निकलता था।
जहाँ जलस्रोत का स्थान है वह घेरकर खान-
गाह का अंग बना दिया गया है। उसके द्वार पर
आज भी कपड़ा पड़ा रहता है। ताकि कोई हिन्दू उसे
देख न सके। यहाँ पर एक पीर किंवा मुन्तज़िम बैठा
रहता है। इस लकड़ी की इमारत तथा वितस्ता के
मध्य में चौतरा है। तत्पश्चात् वितस्ता जल तक जाने
के लिए सीढ़ियाँ बनी हैं।
नदी के तट पर शाह हमदान की इमारत के
पुश्तेपर एक बड़ा सिन्दूर का टीका लगा है। यहीं
प्राचीन कालीश्री की स्मृति में हिन्दू पुष्प
चढ़ाकर पूजा करते हैं। नदी की धारा तक पत्थर
की सीढ़ियाँ बनी हैं। पुश्ता के नीचे काफी बड़ा स्थान
चौतरानुमा बना है। उस पर आज भी हिन्दू खड़े
होकर पूजा तथा स्नान करते हैं। मैंने यहाँ स्वयं
पुष्प चढ़ाया है। दो एक हिन्दुओं को पूजा करते
देखा था।
सिखों ने सन् १८१९ ई० में कश्मीर विजय
की। सिख राज्यपाल सरदार हरी सिंह ने
शाह हमदान को नष्ट करने की आज्ञा दी।
हरी सिंह ने आदेश दिया। मन्दिर के स्थानपर
मुस्लिम जियारत आदि बनी है अतएव उसे मुसल-
मान वापस कर दें। उन्होंने श्री फूल सिंह सैनिक
अधिकारी को आज्ञा दी कि मसजिद उड़ा दी
जाय। वितस्ता के पार पत्थर मसजिद घाट पर
तोप लगा दी गयी।
मुसलमान शाह हमदान को नष्ट होते देखकर श्री
बीरबल धर के मकान पर गये। उन्हीं के बुलाने
पर सिख सेना कश्मीर में आयी थी। श्री बीरबल
के निवेदन पर यह ध्वंस कार्य रोक दिया गया।
पुश्ता की दीवाल पर हिन्दुओं ने सिन्दूर लगा दिया।
उसी की पूजा उस समय से काली श्री के नाम
से होती है।
३. सद्भावश्री : कादी कदल के समीप जामा
मसजिद के पश्चिम सद्भावश्री का मन्दिर था।
उसे पीर हाजा मुहम्मद सुलतान कुतुबुद्दीन साहब
की ज़ियारत में बदल दिया गया है। यहां ये दफ़न
किये गये थे।
४. लौकी श्री : श्रीनगर में वितस्ता तटपर लोकी-
श्री का मन्दिर था। इस मन्दिर का घाट अब भी
लोहागे पार कहा जाता है। यह शब्द लोकीश्री-
पार का अपभ्रंश है।
५. पांचवां मन्दिर किस स्थान पर था
पता नहीं चलता। उक्त मन्दिरों की श्रृंखला देखते
यही अनुमान लगाया जा सकता है कि उसे भी
वितस्ता के दक्षिण तटपर होना चाहिये।