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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 552, कुल 984 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 552

द्वितीय तरंग ४१५
'यावज्जीवं दरिद्रत्वं दश वर्षाणि बन्धनम् ।
शूलस्य पृष्ठे मरणं पुना राज्यं भविष्यति' ॥ ६० ॥
९०. "यावज्जीवन दारिद्रता, दश वर्षों तक बन्धन, शूल पृष्ठपर मरण, पुनः राज्य होगा।"

खोपड़ी पर रेखाएँ होती हैं। भगवान् बुद्ध के
समय वंगीस खोपड़ी देखकर भविष्य तथा भूत दोनों
कालो को कह देते थे। यह उनका पेशा हो गया
था। उसने इस प्रकार बहुत धन अर्जन किया था।
भगवान् बुद्ध ने उसके सम्मुख पांच खोपड़ियां रख
दीं। उसने चार का सच्चा हाल बता दिया परन्तु
पांचवें का भविष्य नहीं बता सका क्योकि वह एक
निर्वाण प्राप्त व्यक्ति की खोपड़ी थी। [सुत्तनिपात.
वंगीस सुत्त: संयुक्त निकाय: ८:१-१२ पर गाथा २६४]
भारत में एक प्रचलित आख्यान है। एक
ज्योतिषी थे। उन्हें एक खोपड़ी मिल गयी। उसपर
लिखा था 'ताहू पर कछु ओर' अभी कुछ और होना
बाकी है। पण्डित को महान् आश्चर्य हुआ। मर
जाने पर अब इसका क्या होगा। परीक्षा के लिये
उसे लाकर घर में रख दिया।
खोपड़ी घर में रखने पर लोगों को आश्चर्य
हुआ। पण्डित की स्त्री को लोगो ने बहका दिया।
इस खोपड़ी के कारण उस पर विपत्ति आने वाली
थी। पण्डितानी ने क्रोधावेश में खोपड़ी ऊखल मे
डालकर कूट डाला। पण्डितजी लौट कर आये।
उन्हें बात मालूम हुई। उन्हें पण्डितानी की दुर्बल बुद्धि
पर तो दया आयी। तथापि अपने शास्त्र पर उन्हें
और विश्वास हो गया। कपाल रेखा की वाणी
सत्य उतरी।
२. श्लोक—श्लोक में चार पाद एवं आठ
मात्रायें होती है। रामायण तथा महाभारत श्लोकों
में लिखे गये हैं। संस्कृत का कोई भी पद जो अनुष्टुप्
छन्द में होता है, उसे श्लोक कहते है। यह गायत्री
की स्तुति में कहा गया था।
कल्हण ने अनुष्टुप् छन्द में ही राजतरंगिणी
का निबन्धन किया है। किन्तु आदि एवं अन्त में
उसने छन्द परिवर्तित कर दिया है।
महाकाव्य का यह एक लक्षण हैं कि सर्ग के
अन्त में छन्द परिवर्तित कर दी जाती है।
कालिदास की भी यही शैली है।
पाठभेद :
श्लोक संख्या ९० मे 'पुना राज्यं' का पाठभेद
'पुन राज्यं' तथा 'पुनः राज्यं' मिलता है।
पादटिप्पणियाँ
९०(१) सन्धिमति और महात्मा ईशामसीह
यदि सन्धिमति का नाम संयोग से ईशान होता तो
उसे ईशा मानने मे सन्देह का अवसर नही मिलता।
कुछ यह बात प्रचलित हो गई है कि महात्मा
ईशा मसीह कश्मीर आए थे। वहाँ दश वर्ष निवास
किया था। वह किसी बौद्ध बिहार में निवास करते
थे। कश्मीर मे ही उन्होने ज्ञानाजंन किया था।
ईशा के जीवन में १० वर्ष का काल अज्ञात है।
वे १० वर्ष कहा थे ? क्या किये, ? कुछ पता नही
चलता। जीवन चरित्र की मूल घटनाओं में
साम्य है।
कुछ मुसलिम लेखकों का मत हैं कि प्रभु ईशा-
मसीह की कब्र कश्मीर की राजधानी श्रीनगर में है।
उसे हजरत यूज आसफ कहते है। यह मजार श्री-
नगर मे खानयार में है। यह भी कहा जाता है
कि यूज आसफ महात्मन् मूसा के वंशज थे। मिस्र
के बादशाह ने कश्मीर में उन्हें अपना राजदूत बना
कर कश्मीर के राजा के दरबार मे भेजा था।
अरबी में यदि यूज़ आसफ लिखा जाय तो यह
बोधि-सत्त्व तुल्य लगेगा। सम्भव है कि उक्त
मज़ार मिस्री राजदूत यूज़ आसफ की रही होगी
अथवा वहाँ कोई स्तूप था। जिसका सम्बन्ध बोधि-
सत्त्व से था। उसे ही यूज़ आसफ इस्लामीकरण
निमित्त कर दिया गया।