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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 553, कुल 984 में से

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पृष्ठ 553

४१६ राजतरंगिणी
पादत्रयस्य दृष्टार्थः श्लोकस्याऽसीत्स योगवित् ।
द्रष्टव्ये तुर्यपादार्थप्रत्यये कौतुकान्वितः ॥ ६१ ॥
९१. श्लोक' के पाद त्रय का अर्थ देखकर, द्रष्टव्य चतुर्थ पादस्थ अर्थ के विश्वास में
वह योगवेत्ता कौतुकान्वित हो गया था ।
अचिन्तयच्च संभ्रान्तः कथमेतद्भविष्यति ।
उवाच च विधेः शक्तिमचिन्त्यां कलयंश्चिरम् ॥ ६२ ॥
९२. सम्भ्रान्त होते हुए उसने सोचा—'यह कैसे होगा ?' और देर तक विचार करते
हुए विधाता की शक्ति को (मन ही मन) अचिन्त्य कहा ।
कश्मीर में हिन्दूराज के अन्त तथा इसलाम के
प्रचार के साथ हिन्दूपरम्परा हिन्दू इतिहास आदि
को इसलामीकरण करने की प्रवृत्ति दिखाई देती है।
आदम, मूसा, सुलेमान, ईशा आदि नवियो के नाम
से कश्मीर के पुराने स्थान तथा गाथाओं का नाम-
करण किया जाने लगा। यहाँ तक कि हिन्दू राजाओं
का नाम भी बदल कर उन्हें मुसलमानी जामा पहना
दिया गया। यह इसलिये किया गया कि नवीन
बने मुसलमान तथा भावी सन्तानें हिन्दू इतिहास
संस्कृत, सभ्यता को पूर्णतया भूलकर यही समझें कि
कश्मीर में सनातन काल से इसलाम परम्परा
कायम थी और उन्होंने हिन्दूधर्म त्याग कर मुसलमान
बनकर कुछ बुरा नही किया है। बल्कि पुराने मूल
मजहब में पुनः लौट आए हैं। जिसे कभी त्याग
दिया था।
सन्धिमति का राज प्राप्ति के पश्चात् राज त्याग
कर चले जाने का उल्लेख है। सन्धिमति का राज-
त्याग के पश्चात् सन्त होकर चले जाने का भी उल्लेख
है। परन्तु उनका हुआ क्या ? वे कहाँ गये, कहाँ रहे
तथा कहाँ मरे इतिहास के गर्भ में है। ईशामसीह
का पता सूली पर चढ़ने के पश्चात् नही लगता।
हाँ यह कहा जाता है कि उन्होंने यहूदियों के राजा
होने की बात कही जिसके कारण तत्कालीन सत्ता
तथा कानून के अनुसार उन्हें सूली पर चढ़ाया गया।
सन्धिमति भी कश्मीर राज के कल्पित विद्रोहके नाम
पर ही सूली का आलिंगन किया था।
बाइबिल के समालोचकों में एक-मत ईशामसीह
को ऐतिहासिक व्यक्ति जैसा वर्णन किया गया है
नही मानता। रूसी वैज्ञानिकों ने 'डेडसी स्क्रोल'
जिसमे बाइबिल लिखी है उसका अन्वेषण कर
बताया है कि स्क्रोल का काल ईशा के कथित जन्म
काल से पूर्व का है। ईशा तथा सन्धिमति के जीवन-
काल तथा चरित्र मे इतना साम्य है कि अभी
गवेषणा की आवश्यकता है।
सन्धिमति के गुरु का नाम ईशान था।
यह शब्द 'ईशा' से मिलता है। इस विषय पर बिना
कुछ विशेष अध्ययन के कहना आधिकारिक ढंग मे
ठीक न होगा। यदि ईशान को ही कुछ लेखकों ने
ईशा नाम साम्य के कारण दिया होता तो बात
कुछ दूसरी हो जाती।
पाठभेद :
श्लोक संख्या ९१ में 'दृष्टार्थः' का 'दृष्टार्थे';
'तुर्य' का 'चतुर्थ' तथा 'पादार्थ' का पाठभेद पदार्थे'
मिलता है ।
श्लोक संख्या ९२ में 'कथमे' का पाठभेद 'कार्यो
मे' मिलता है ।