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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 172, कुल 984 में से

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पृष्ठ 172

प्रथम तरंग ९१
तत्र कौरवकौन्तेयसमकालभवात् कलौ ।
आ गोनन्दात् स्मरन्ति स्म न द्वापञ्चाशतं नृपान् ॥ ४४ ॥
४४. कौरव एवं पाण्डवों के कलियुग १ समकालीन तृतीय गोनन्द के पूर्व हुए कश्मीर मण्डल
के राजाओं का इतिहास लुप्त हो गया है ।
तस्मिन् काले ध्रुवं तेषां कुकृत्यैः काश्यपीक्षुजाम् ।
कर्तारः कीर्तिकायस्य नाभूवन् कविवेधसः ॥ ४५ ॥
४५. उन राजाओं के पूर्व कुकृत्यों के कारण काश्यपी १ में कोई कृती कवि नहीं हुआ जो
उनकी कीर्ति काया निर्माण निमित्त लेखनी उठाता ।
गिरिजा देवी पार्वती का नाम है । हिमाचल की
कन्या मानी जाती है । किन्तु गोरी उस कन्या को
कहते हैं जो आठ वर्ष की होती है । कुमारी होती है ।
ग्वारो कन्या देवी स्वरूप होती है । प्राचीन हिन्दू
प्रथा के अनुसार इस प्रकार की कन्याओं को नवरात्र
की नवमी को भोजन कराया जाता है । उनकी पूजा
होती है । पूर्वीय उत्तर प्रदेश में इसको 'छोहरी'
खिलाना कहते हैं ।
पाठभेद :
श्लोक संख्या ४४ में 'भवात्कलौ' का पाठभेद
'भवान् कलौ' तथा 'गोनन्दात्' का 'गोनदत्'
मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
४४ (१) कलियुग : उपोद्घात, कश्मीर वर्णन
के पश्चात् कल्हण इतिहास लिखने का प्रारम्भ इस
श्लोक से करता है । इसका प्रारम्भ वह कश्मीर के
बावन लुप्त राजाओं से करता है । उनका कोई
सूत्र कल्हण को नहीं मिल सका । इतिहास सामग्री
भी वह अपने समय में उनके विषय में नहीं प्राप्त
कर सका । अतएव वह स्पष्ट कहता है कि गोनन्द
(तृतीय) के पूर्व के बावन राजाओं की स्मृति
लुप्त हो गयी है ।
कल्हण ने यहाँ 'गोनन्दात्' शब्द का प्रयोग
किया है । गोनन्द प्रथम का उल्लेख उसने श्लोक
संख्या १:१६ में किया है । गोनन्दात् शब्द यहाँ पर
तृतीय गोनन्द के लिये प्रयुक्त किया गया है । ज्ञात
राजाओं का नाम गोनन्द तृतीय से प्रारम्भ होता है ।
कल्हण ने अपने इतिहास का प्रारम्भ काल
(वराहमिहिर के बृहद् संहिता से ) युधिष्ठिर
के राज्यकाल से आरम्भ किया है । युधिष्ठिर के
राज्याभिषेक तथा कथित समय का आधार कल्हण
ने नीलमत पुराण को माना है । गोनन्द प्रथम
कश्मीर का ऐतिहासिक पुराकालीन राजा रूप में
चित्रित किया गया है । नीलमत पुराण के अनुसार
गोनन्द पाण्डवों का सम कालीन था ।
राजा जनमेजय ने ऋषि वैशम्पायन से आश्चर्य
चकित होकर पूछा कि नाना देश के राजाओं ने
महाभारत में भाग लिया । क्या कारण है कि
कश्मीर के राजा महाभारत युद्ध में किसी पक्ष की
तरफ से भाग नहीं लिया । ऋषि वैशम्पायन ने राजा
जनमेजय की शंका का समाधान किया है । उसी
प्रसंग में कश्मीर के इतिहास का वर्णन किया है ।
वही कथोपकथन नीलमत पुराण का वर्तमान
स्वरूप है ।
पाठभेद :
श्लोक संख्या ४५ में 'कुकृत्यैः' का पाठभेद
'कुकृतैः' मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
४५ (१) काश्यपी : काश्यपी का यहाँ अर्थ
कश्मीर है । अगय्या पृथ्वी के सताइस नामों में एक