राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९० राजतरंगिणी
त्रिलोक्यां रत्नसूः श्लाघ्या तस्यां धनपतेर्हरित् ।
तत्र गौरीगुरुः शैलो यत् तस्मिन्नपि मण्डलम् ॥ ४३ ॥
४३. त्रैलोक्य में रत्नप्रसूता भूलोक श्लाघ्य है। भूलोक में कुबेर की उत्तर दिशा श्लाघ्य है।
यहाँ की पर्वत मालाओं में गौरी' पिता हिमाचल श्लाघ्य है, और उसमें भी पर्वतों द्वारा आवृत
कश्मीर मण्डल श्लाघ्य है।
पर यथेष्ट ध्यान दिया जाता था। विद्यालयों तथा
उनके विद्या भवनों का महत्वपूर्ण स्थान सामाजिक
जीवन में था। कल्हण राज्य प्रासाद, राजभवन किंवा
नगर के अन्य धनी मानी नागरिकों के अथवा नगर
के भवनों का वर्णन नहीं करता। केवल उत्तुंग विद्या
वेश्म का उल्लेख करता है। इससे स्पष्ट प्रतीत होता
है कि कश्मीर की इमारतों में सर्वश्रेष्ठ इमारतें
विद्यालयों की थीं। यह कश्मीर की जनता का
विद्याप्रेम तथा सरस्वती के प्रति प्रगाढ़ भक्ति का
द्योतक है। देव मन्दिरों की भव्यता की ओर संकेत
नहीं किया गया है। यह अभाव खटकता है। महत्व-
पूर्ण है। इस बात का प्रमाण है कि कश्मीर में
विद्या वेश्म को मन्दिरों की अपेक्षा प्राथमिकता दी
जाती रही होगी।
(२) कुंकुम : केशर भारत में केवल कश्मीर
में होती है। विश्व में केशर की सर्वश्रेष्ठ रोडी स्पेन
में होती है। स्पेन की केशर दुनिया में सबसे अच्छी
होती है। केशर किश्तवार तथा कश्मीर के अन्य
स्थानों में होती है। कश्मीर में केशर की खेती के
लिए पद्मपुर अर्थात् पामपुर प्रसिद्ध है।
कश्मीर तथा अन्य देशों के कुंकुम अर्थात् केशर
का वर्णन भावप्रकाश में मिलता है।
काश्मीरदेशजे क्षेत्रे कुंकुमं यद्भवेद्धि तत् ।
सूक्ष्मकेशरमारक्तपद्मगन्धि तदुत्तमम् ॥
बाह्लीकदेशसंजातं कुंकुमं पाण्डुरं भवेत् ।
केतकीगन्धयुक्तंयत् तन्मध्यं सूक्ष्मकेसरम् ॥
कुंकुमं पारसीके यत् मधुगन्धि तदीरितम् ।
ईषत्पाण्डुरवर्णं तदधमं स्थूलकेशरम् ॥
—भावप्रकाश
कश्मीर के केशर तथा अन्य स्थानों में उत्पन्न
होने वाले केशरों की विशेषता तथा रूप का वर्णन
भावप्रकाश करता है। कश्मीर का केशर घारक्त
रंग, सूक्ष्म तथा उसकी गन्ध पद्म अर्थात् कमल की
तरह होती है। यह उत्तम होती है। बाह्लीक अर्थात्
बलख देश की केशर पाण्डु रंग की होती है। उसकी
गन्ध केतकी की सुगन्ध की तरह होती है। उसके फूल
के बीच में सूक्ष्म केशर होता है। पारसीक अर्थात्
ईरान के केशर की सुगन्ध मधु अर्थात् शहद की
तरह होती है। उसका रंग पाण्डु वर्ण का होता है।
यह सूक्ष्म नहीं स्थूल होती है। कश्मीर तथा बाह्लीक
के केशर की पंखुड़ी पतली तथा ईरान की मोटी
होती है।
(३) द्राक्षादि : यहाँ स्पष्ट तात्पर्य, फलों से
है। कश्मीर का अंगूर बहुत प्रसिद्ध नहीं है। सेव,
बम्बूगोशा, और अखरोट की ख्याति है। कश्मीर
का अम्बरी सेव विश्वविख्यात है। इसका अपना
एक विचित्र मधुर स्वाद है। अखरोट जितना अच्छा
कश्मीर में होता है उतना शायद ही विश्व में
कहीं प्राप्त हो सके। बम्बूगोशा कश्मीर की खास
खोज है। कश्मीर फल और पुष्पों का भण्डार है।
जल कश्मीर में सर्वत्र शीतल मिलता है। बर्फ
गलने से स्रोतों में जल निरन्तर आता रहता है।
पाठभेद :
श्लोक संख्या ४३ में 'रत्नसूः' का 'रत्नभूः',
'गुरुः' का 'गिरि' : पाठभेद मिलता है।
पादटिप्पणियाँ :
४३ (१) कल्हण ने गौरी शब्द का प्रयोग यहाँ अत्यन्त
पवित्रता एवं श्रद्धा की दृष्टि से किया है। गौरी एवं