राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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[बायाँ स्तम्भ]
नाम कश्मीर भी है। यहाँ काश्यपी का पृथ्वी भी
अर्थ लगाया जाय तो अर्थ के भाव में विशेष अन्तर
नहीं पड़ता। वह अधिक व्यापक अवश्य हो जाता
है। कश्मीर मण्डल के कवियों के स्थान पर पृथ्वी
पर कोई कवि नहीं हुआ। यह अर्थ हो जायगा।
श्लोक ४५ से ४७ तक संस्कृत साहित्य तथा
कवियों की प्रशस्ति में कहे गये श्रेष्ठ पद हैं। उनके
माधुर्य, पद लालित्य तथा भाव का अनुवाद करना
कठिन है। कवि तथा लेखक अपनी लेखनी द्वारा
व्यक्तियों को महान् तथा अमर बना देता है। कवि
कल्हण ने उसे अत्यन्त संक्षिप्त तथा स्पष्ट रूप में
रखा है। अंग्रेजों के महान् कवि कारलाइल ने भी
इसी प्रकार भावोद्रेक 'हीरोज् प्रोएट' में किया है !
कल्हण राजतरंगिणी १:१३ से २० तक
श्लोकों में कश्मीर के इतिहास लिखने का हेतु
उपस्थित करता है। वह स्वीकार करता है।
इतिहास का पुनर्लेखन उचित नहीं है। तथापि
लोग इतिहास लिखते हैं। नवीन सामग्रियों की
प्राप्ति, नवीन अनुसन्धान, त्रुटि पूर्ण भ्रामक
एकांगी घटनावलियों तथा मतों को निवारणार्थ
घोर नवीन कल्पना, गंतव्य और अनुभूति द्वारा
लेखक इतिहास लिखने के लिए अनुशासित होता
है। कल्हण ने कश्मीर के तत्कालीन इतिहासों में
व्याप्त त्रुटियों के निवारणार्थ लेखनी उठाई थी।
पूर्व काल में कश्मीर का अत्यन्त विस्तृत इति-
हास था। राजाओं का व्यापक वर्णन किया गया
था। इतिहासकार सुव्रत ने कश्मीर का संक्षिप्त
इतिहास लिखा था। डाक्टर बूलर का मत है कि
सुव्रत ने विद्यालयों तथा पाठशालानों में अध्ययन
तथा अध्यापनार्थ विद्यार्थियों के लिए इतिहास का
संक्षिप्त नोट बनाया था। उस नोट के कारण
कालान्तर में इतिहास का विस्तृत वर्णन विस्मृत
हो गया।
सुव्रत के संक्षिप्त इतिहास के प्रयोग तथा प्रच-
लन के कारण प्राचीन इतिहास ग्रन्थ लुप्त हो गये।
[दायाँ स्तम्भ]
सुव्रत की रचना कठिन थी। समझने के लिए
व्याख्या तथा भाष्य की आवश्यकता पड़ती थी। सर्व
साधारण को इतिहास का वास्तविक ज्ञान नहीं प्राप्त
हो सकता था। इतिहास के वैज्ञानिक अध्ययन के
लिए सुलभ सामग्री प्राप्त नहीं थी।
कवि क्षेमेन्द्र ने नृपावली नामक ऐतिहासिक
ग्रन्थ की रचना की थी। इतिहास की अपेक्षा उसे
काव्य कहना अधिक संगत होगा। निस्सन्देह काव्य
दृष्टि से श्रेष्ठ होने पर भी कल्हण के विचार से उसमें
इतनी त्रुटियां रह गयी थी कि उसमें निहित इतिहास
सामग्री को निर्दोष कहना कठिन था। क्षेमेन्द्र का
उपनाम व्यासदास था।
कश्मीर मण्डल में कवि क्षेमेन्द्र राजा अनन्त
(१०२८-१०६३ ई०) तथा राजा कलश (१०६३-
१०८९ ई०) के राजत्व काल में समय व्यतीत
किया था। उसका जन्म शारदा अर्थात् शारदी में
हुआ था। शारदी भारत में विद्या का केन्द्र था।
उसने वहां शिक्षा प्राप्त की थी। उसे हर प्रकार की
ज्ञानार्जन की सुविधा थी। वातावरण पाण्डित्यपूर्ण
था। अनेक विचारधाराओं के संगम में उसने स्नान
किया था। उस समयका इतिहास कश्मीर की राज-
नीतिक, राजवंशीय, प्रासादीय, दलीय, षड्यन्त्रों,
असंतोषों, नैराश्य एवं रक्तरंजित घटनाओं से भरा
पड़ा है। उसके ग्रन्थ 'समयमातृका' का रचना-काल
सन् १०५० ई० तथा अंतिम ग्रन्थ 'दशावतार चरित'
का सन् १०६० ई० है। क्षेमेन्द्र के पूर्वज कश्मीर
राजा की राजसेवा में अमात्य पद पर थे। क्षेमेन्द्र के
पिता का नाम प्रकाशेन्द्र था। पितामह का नाम
'सिन्धुनामय' था। प्रपितामह का नाम 'सिन्धु' था।
उसने साहित्य शास्त्र 'अभिनव गुप्त' से सीखा था।
उसके दीक्षा गुरु 'सोमपाद' थे। गुरु के विचारों से
प्रभावित था। इसके ग्रन्थ 'रामायण मंजरी' और
'भारत मंजरी' में रामायण, और महाभारत की
कथाओं का और 'बृहत्कथा मंजरी' में मौलिक कथाओं
संक्षिप्त संग्रह है। महाकवि 'गुणाढ्य' ने पैशाची