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पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

पृष्ठ 54, कुल 470 में से

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पृष्ठ 54

३८ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व
दूहा ॥ सुनि सुवचन गिरि राज कौ । कहि रिषि कारन बात ॥
पुत्त एक जच्चूं तुमहि । गरित सपूरन गात ॥
छं० ॥ १७७ ॥ रू० ॥ ९० ॥
॥ हिमालय का अपने सब पुत्रों को ऋषि का अभिप्राय कहना ॥
कवित्त ॥ तब सुचिंत गिर ईस । पुत्त सबे निज स्रव्वं ॥
कहि कारन षिति षात । अप्य रष्यौ कुल अव्वं ॥
इत्त सु रिषि सुत ब्रह्म । नाम वाचिष्ट महा मंति ॥
धर्म्म पार तप पार । पार श्रुत कर्म परम गति ॥
जच्चे सु षोइ तुम एक कहुँ । चिंतिय चत कारज्ज रिषि ॥
संब षो वास बिल उद्धरै । पद पामौ परमुच अषि ॥
छं० ॥ १७८ ॥ रू० ॥ ९१ ॥
॥ हिमालय के बड़े पुत्र का उत्तर देना
कि वह भूमि निषिद्ध है ॥
कवित्त ॥ तब अष्पहि अग्र पुत्त । सुनहु गिरि राज चिंत चित ॥
पिता बाच रिष काज । कोइ खंडहि सुक्रम्स चित ॥
उह सु भूमि निषेध । थान जानहु तुम सब्बं ॥
अंग क्रंम अरु देव । षेव जाजन नहि अव्वं ॥
कुच्छित्त देस कारन विक्रम । तहँ सु केम किज्जै गमन ॥
अप्पियै प्रान मंग्गै जो रिषि । पै दुष्ट थान थप्पहिँ न तन ॥
छं० ॥ १७९ ॥ रू० ॥ ९२ ॥
॥ वशिष्ठ का प्रत्युत्तर दे कहना कि वह भूमि बड़ी रम्य है ॥
कवित्त ॥ तब जंपे सुत ब्रह्म । सुनौ गिरि राज पुत्त सम ॥
इहि सु भौमि बिल थान । रम्य मंडहि सु तप्प दम ॥
९०. पाठान्तर :-गिरिराज । संपूरन ॥
९१ पाठान्तर :-ईसं । रख्यौ । महामति । परमगति । कहुं । संव । संवसौ । परमुच ॥
९२ पाठान्तर :-गिरिराज । सुक्रम । रुव्व । अव्व । तहां । कहहां । पै ॥
९३ पाठान्तर :-जंपै । सुन्न । गिरिराज । तिथ । गंधर्व । मूर्त्तिमान । सज्जै । तिसर ।
धात्र । महि ।