पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४०० | पृथ्वौराजरासो । | [ नवां समय १६
अरब खां का कहना कि आज ठहर
जाइए शकुन अच्छा नहीं है ॥
गही सुरतान सु आरब बग्ग । रहौ दिन आज सगुंन न जग्ग ॥
रहै कुहु अज्ज ततार सुदिन । मची चढि चल्लहु मन्नि सगुन्न ॥ कं० ॥७१॥
सुलतान का कहना कि काफ़िर चौहान को जीतना कौन बड़ी
बात है जो इतना बिचार करते हैं ॥
कहै सुरतान अहो तुम क्रूर । भयं भय क्षित्यु सु भंषहु नूर ॥
कहा बल जुद्ध कहै प्रथिराज । कित्तौ बल सामत जुडिच्च साज ॥ कं० ॥७२॥*
छनां रन सूर जिके चहुआन । गहैं जुध राज सु छंडिय प्रान ॥
कहा डर काफर दाषहु मुक्झ । कहा भर आवध आंगरि जुक्झ ॥
कं ॥ ७३ ॥ *
नसंनि चमंकि च्ल्यौ सुरतान । टमंकिय गज्जिय न्ह निसान ॥
जल व्यल होय थलं जल भार । असमग्गह मग्ग चल्लै गछिन्लार ॥ कं० ॥७४॥
मिल्यौ इक साहन लष समुंद । समुझिकन कंन भयो सुर मुंद ॥
चल्थौ सुरतान मिलान मिलान । बढी अति चिंत दुनी चहुआन ॥
कं० ॥ ७५ ॥ रू० ॥ ४६ ॥
शाह का चौहान की ओर जाना और दूतों का
यह समाचार नागौर में हुसैन को देना ॥
दूहा ॥ गयौ साचि चहुआन घर । दिण मिलान मिलान ॥
गए सुचर नागौर पुर । कही षबरि सुरतान ॥ छं० ॥ ७६ ॥ रु० ॥ ५७ ॥
पृथ्वीराज का चढ़ाई का समाचार सुनकर सरदारों को बुला-
कर सिंध तक शाह के पहुंचने का हाल कहना ॥
कवित्त ॥ सुनिय षबरि प्र थराज । कचिय जे चरन चरित सद्द ॥
बोलि मंत्रि कयमास । बोलि चामंड गुभक्क गद्द ॥
- यह ७२ और ७३ दो छंद सं० १६४७ वाली पुरानी पुस्तक में नहीं किन्तु इतर में हैं ॥
.४१ पाठान्तर-चहुवान । धर । दीए । मिलांन २ । सुंचर । सुरतांन ॥