पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनवां समय १५ ] पृथ्वीराजरासो । ३६६
शाह के जी में रात दिन चौहान की चिंता लगी रहना ॥
दूहा ॥ तपै साचि गोरी सबर । चित सान्नै चहुआन ॥
वैरोचन की साप ज्यौं । कीटी अंग प्रमान ॥ छं० ॥ ६५ ॥ रू० ॥ ४४ ॥
अरिल्ल ॥ जग्गत निसि झंपत सुरतानह । घरी सत्त रहि सेष प्रमानह ॥
जगि आयस दिय दीन निसानह । चिंता साचि चढी चहुआनह ॥
छं० ॥ ६६ ॥ रू० ॥ ४५ ॥
सेना के साथ चढ़ाई के लिये शाह का तयार होना ॥
छंदमोतीदाम ॥ भए सुर तीन धुनक निसान । चल्यौ अश्व सज्जि सिल्है सुरतान ॥
चढे सब पांन सु उम्मर मीर । सजे सचनइ बजे रस बीर ॥ छं० ॥ ६७ ॥
बजे सब बाज भयानक भाइ । चितैं चिय्बुद्धि जिनैं जन नाइ ॥
चल्यौ सब सज्जिय सेन गरिष्ट । परी दस दिग्ग सुध्रुधरि दिष्ट ॥
छं० ॥ ६८ ॥
अशकुन होना
सवह सियांन सुसेन कपोत । सनंमुष साचि दिष्यो दज दोत ॥
भयौ दिसि वामिय काग्ग करार । रुक्यौ दिवि धोमय धूम गभार ॥
छं० ॥ ६९ ॥
सनंमुष देषिय जंबुक सेन । विरो मिन्नि चंपचि भग्गचि तेन ॥
क्रमें तस उप्पर गिद्ध असंख । चवै सुर रुद्र पसारिय पंष ॥ छं० ॥ ७० ॥
४४ पाठान्तर-चहुआन । भृंग । प्रमानं ॥
४५ पाठान्तर-जगत । जंपत । सुरतानंह । सत्त । रही । प्रमानंह । निसानंह । निसानंह ।
चहुआनह ॥
४६ पाठान्तर-मोतीदाम । निसांन । साजि । सित्ल्हे । सुरतांन ॥ ६७ ॥ रजे । चितैं ।
जिनैं । सज्जिय । गरिद्व । दिग्ध । घुंवरी । दिष्ट ॥ ६८ ॥ सिंचाम । वांमीय ॥ ६९ ॥ ऊपर ।
पसारीय ॥ ७० ॥ सुरतांन । रहो । कहु । कहैौ । आज । गह्यो चल मंनहु चढि सगुंन ॥ ७१ ॥
भयै भये । प्रथीराज । बलु । सामंत ॥ ७२ ॥ हनों । चहुवांन । गहौं । मुक्क । जुझ ॥ ७३ ॥
चल्यौ । सुरतांन । गजिय । निसांन । जलं थल हूअ थलं जल चार । ७४ ॥ लप । समुझिन ।
सुरतांन । मिलांन २ । चहुवांन ॥ ७५ ॥