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पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

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पृष्ठ 411

नवां समय १० ] पृथ्वीराजरासो । ४०१
बोल्लि चंद पुंडीर । बोल्लि पीची प्रसंग बर ॥
बोल्लि गज्जि गहिल्लोत । बोल्लि काकन्द नाह नर ॥
बोलेति सव्व सामंत भर । कही वत्त सो कहिय चर ॥
सासंत संत भर सव्व मिल्लि । सिंधु सुचंपिय साह घर ॥
छं० ॥ ७७ ॥ रु० ॥ ४८ ॥
लड़ने के लिये प्रस्तुत होने का सब का मत होना ॥
दूहा ॥ कहत सव्व सामंत मति । चढि दल्ल सजौ समंकि ॥
सुनिव मंति कायमास कहि । करहु निसान तमंकि ॥
छं० ॥ ७८ ॥ रु० ॥ ४९ ॥
युद्ध की तयारी होना ॥
गाथा ॥ भय टामंक निसानं । पत्तं निज गेह सूर सामंतं ॥
वाजे वज्जि अनेकं । चय संगे राज चहुआनं ॥ छं० ॥ ७९ ॥ रु० ॥ ५० ॥
गुरुराम ब्राह्मण का आकर आशिर्वाद देना, बहुत कुछ
दान कराना और वेद मंत्र से तिलक करना ॥
छंद पद्धरी ॥ आये सुनाम गुर राम राज । पढि पच मंच द्विज बोल्लि साज ॥
ग्रह नव सुदान विधि विद्ध दीन । वेदंत विप्र अभिषेक कीन ॥
छं० ॥ ८० ॥
चव सहस हेम दिय विप्र दान । अस्सेष वेद चय साम गान ॥
दिय दान भूरि पंषी सु चंड । दीनौ सु अध्य जिन हध्य मंडि ॥
छं० ॥ ८१ ॥
जै जया जोच जंपी सु आन । मंगल सुचार चव पढि गान ॥
आसिय दयन चहुआन रान । गुरु राम जज्जि आहुत्त प्रान ॥
छं० ॥ ८२ ॥
४८ पाठान्तर-प्रथीराज । चरनि । कैमास । भुक्कू । एह । पीचि । गजि । सब । मिल्लि ॥
४९ पाठान्तर-सुनै । मंत । कैमास । करहु । निसांन ॥
५० पाठान्तर-पतं । गेह । सामंता । चहुआनं ॥
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