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पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

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आठवां समय १५] | पृथ्वीराजरासो । ३८३
पृथ्वीराज की विजय ॥
दूहा ॥ भई जीत सोमेस सुअ, लियौ मुगत्न गज मेलि ।
देखि षेत सब दिग्ध बहु, बोर वरंनिय केलि ॥ छं० ॥ ६९ ॥ रू० ॥ ४३ ॥
रन सुद्दिप क्रुद्दिप तजिय, घाइल लीन उठाइ ॥
भये सूखट जे अंत तन, दाघ दिग्ध तन ताई ॥ छं० ॥ ७० ॥ रु० ४४ ॥
हुच्च डेरा नौवति विहसि, पंच सबद दरवार ॥
जिन भट लग्गे सस्त्र तन, तिन तन कीनिय सार ॥ छं० ॥ ७१ ॥ रू० ४५ ॥
इति श्री कविचंद विरचिते पृथिराजरासके मेवाती मुगल
कथा नाम अष्टम प्रस्तावः ॥ ८ ॥
४३ पाठान्तर-जीति । दिघ ॥
४४ पाठान्तर-दाघ दिघ ॥
४५ पाठान्तर-निहसि । कीनीय ॥