पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआदि पर्व ] पृथ्वीराजरासौ । ११५
सब मिलि सु ताहि पुज्जा करिय । वरप पंच दुअ मास दिन ॥
दिन अवधि दइत पूछिय तिनह । को तुम कारन काम किन ॥
छं० ॥ ५७२ ॥ रू० ॥ ३०५ ॥
॥ अनंगपाल की सुता का ढूंढा को वर चाहने को पूजने का कहना ॥
गाहा ॥ इह सुनि अनंग नरिंदं । पुत्ती सित पंच अवर दुज राजं ॥
वर चाहत तुम पासं । ए वर बीर वास इक ठामं ॥
छं० ॥ ५७३ ॥ रू० ॥ ३०६ ॥
॥ ढूंढा का राज-स्त्रियों की सेवा से संतुष्ट होना ॥
दूहा ॥ दिल्ली ढिग गहरिय गुफा । ढूंढा तहां वयट्ठ ॥
अठ्ठोत्तर सौ राज त्रिय । सेवा करत सु तुट्ठ ॥ छं० ॥ ५७४ ॥ रू० ॥ ३०७ ॥
॥ ढूंढा का वर देकर काशी को उड़ जाना ॥
पहरी ॥ दिय वाच वान्ध दानव सु राज । सज्जौ सु अप्प वर वचन साज ॥
उड़ि चल्यौ अप्प कासी समग्ग । आयौ सु गंग तट कज्ज जग्ग ॥ ५७५ ॥
सत अट्ठ पिंड करि अंग अब्बि । होमे सु अप्प वर मझि छब्बि ॥
मंग्यौ सु ईस पहि वर पसाय । सत अट्ठ पुत्र अवतरन काय ॥ ५७६ ॥
तन रह्यौ जोति गय देव थान । मिलि ताहि अक्कूशिय करत गान ॥
छं० ॥ ५७७ ॥ रू० ॥ ३०८ ॥
॥ ढूंढा का फिर जन्म लेना और उसका वृत्तान्त चंद का वर्णन करना ॥
दूहा ॥ इम आतम उद्धार करि । जनम लियो भुअ आइ ॥
सो वृतंत कवि चंद कहि । बरन्यौ कवित बनाइ ॥ छं० ॥ ५७८ ॥ रू० ॥ ३०९ ॥
॥ ढूंढा का वर दैना और काशी में यज्ञ कर तन त्यागना ॥
दूहा ॥ तब ढूंढा वर दान दिय । सुति सत अट्ठ प्रसन्न ॥
कासी जाय रु जग्ग किय । सित्त पिंड किय तन्न ॥ छं० ॥ ५७९ ॥ रू० ॥ ३१० ॥
३०६ पाठात्तर :- अगंग । पुत्ती सय । काम वास ॥
३०७ पाठान्तर :- ढिल्ली । गुफा । ढूंठा । वयठ । अठोत्तर । सो । तुठ ॥
३०८ पाठान्तर :- दीय । दानवह । स । अप । पंचन । चल्यौ मग । समग । कज जग ।
अठ अबि । स । मधि । छवि । सब्ब । स । यसाई । पसाइ । आठ । आठ । अवतार । काइ ।
ज्योति । थांन । अकुरीस । भ्यांन ॥
३०९-१० पाठान्तर :- उधार । लीया । भूअ । आइ । वृतांत । चंदनै । वरन्यो सकल
बनाय ॥ ३०९.॥ ढुंढै । वरदांन । आठ । कीय । सत्त । कीय ॥ ३१० ॥