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पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

पृष्ठ 125, कुल 470 में से

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पृष्ठ 125

११४ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व
॥ अनंगपाल राजा का दिल्ली बसाना ॥
दूहा ॥ पंडव बंस अनंग नृप । पति हथिनापुर ठाम ॥
एक समै जमुना तटह । वसिय राज तहँ गाम ॥
छं० ॥ ५६६ ॥ रु० ॥ ३०२ ॥
अनंग पाल तूंअर तहां । दिल्लि बसाई आनि ॥
राज प्रजा नर नारि सब । वसे सकल मन मानि ॥
छं० ॥ ५७० ॥ रु० ॥ ३०३ ॥
॥ अनंगपाल की सुता का निगमबोध कालिंद्री तट पर गौरी
पूजने जाना ॥
कवित्त ॥ अनंग पाल तूंअर । नरिंद घरमाधि राइ गुर ॥
सुता तास अति सुभग । बरष अठ्ठह सरूप बर ॥
सषी सु आनि समानि । सीख गुन वर अठ्ठह तर ॥
सावन आवन मास । गवरि नित करै पुज्ज उर ॥
निगम-बोध कालिंदि तट । गई सकल पूजन गवरि ॥
तिह्नि काल मेघ ब्रष्षह प्रबल । * भई लग्गि भींजन कुँअरि ॥
छं० ॥ ५७१ ॥ रु० ॥ ३०४ ॥
॥ अनंगपाल की सुता का ढंढा को पूजना और उस का
कारण पूछना ॥
कवित्त ॥ अनगपाल नृप सुता । संग पुच्ची ति पंच सित ॥
प्रोचित पुची एक । पुचि सा चंडि सेव चित ॥
सब मिलि जमना तीर । गई अस्नान सवारिय ॥
दिषि देवल मृत पिंड । तेह्र ढंढा तप धारिय ॥
३०२-३ पाठान्तर :-ठांम । यमुना । तहां । गांम । ३०२५ तोअर । दिल्लि । आनि ।
प्रज । बसे सकल तहां आंनि । मांनि ॥
। * भई लगि भींजन = यह प्राचीन हिन्दी की वाग रीति अर्थात् मुहावरा है ॥
३०४ पाठान्तर :-तूवर । राय । अठह । सषी आनि समांग । आंनि । समांनि । सीत ।
अठोतर । सावन । स पुज वर । निगमोघ । कालिदि । गइ । वरसि । लगि । भीजन । कुवरि ॥
३०५ पाठान्तर :- अनगपाल पुत्री सु एक । सथ साथिणी पंचच सत । पंच सत । ता मइ ।
मंदि । जमुना । वपु स्रान । मृत । तिह्नि । ढुंढा । धारीय । पूजा । करीय । इय । दैत । पूज्यै । तिनहि ॥