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पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

पृष्ठ 124, कुल 470 में से

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पृष्ठ 124

पृथ्वीराजरासौ । ११३
जो नाम ढुंढ वीसन व्रणनि । साप देह जशिय दयत ॥
छुहन सु तेह गंगा दरस । तजन देह जन संत कृत ॥
छं० ॥ ५६१ ॥ रु० ॥ २८४ ॥
दूहा ॥ तजन देह जन संत कृत । सजन अजैपुर राज ॥
निय तन असि वर पंडि हैं। मधि गंगा रिपराज ॥
छं० ॥ ५६२ ॥ रु० ॥ २८५ ॥
तन सु पाप तापह तपन । किम उधार मो होइ ॥
तुम रिषराज वसिष्ट वर । यौ उपदेसह मोहि ॥
छं० ॥ ५६३ ॥ रु० ॥ २८६ ॥
तब मुनि वर हसि यौ कहिय । बिन तप लहिय न राज ॥
अन धन सुत द्वारा मुदित । लहौ सबै सुख साज ॥
छं० ॥ ५६४ ॥ रु० २८७ ॥
तब सु तहां उपदेस किय । लगि धारन हरि ध्यांन ॥
तपत तप्प तिन रिपि गुहा । अंग उपज्यौ ग्यान ॥
छं० ॥ ५६५ ॥ रु० ॥ २८८ ॥
रिष सु उठि तीरथ गयौ । दरी सु दानव खंडि ॥
जौ लौं आऊं निथ्य करि । तौ लौं तू तप मंडि ॥
छं० ॥ ५६६ ॥ रु० ॥ २८९ ॥
गाथा ॥ तपत निसाचर तप्पं । वीते वरष तीन सै असीयं ॥
भय बाधा विण अंगं । लग्यो राम धारना ध्यानं ॥
छं० ॥ ५६७ ॥ रु० ॥ ३०० ॥
दूहा ॥ ढुंढा रिषि उपदेस किय । तिन्हि ढिग दरिय उधोर ॥
वरष तीन सत् असिअ लगि । महा प्रबल तप घोर ॥
छं० ॥ ५६८ ॥ रु० ॥ ३०१ ॥
२८५-६६ पाठान्तरः-कृत । है । हैं। ॥ २८५ ॥ सोह । सोइ ॥ २८६ ॥ यो । लहों । सबै ॥
२८७ ॥ उहां ध्यांन । तप तप्पै । अंग अंग उपज्यौ ग्यांन । अंग उपज्यौ ग्यांन ॥ २८८ ॥ उठि ।
दानव । लो । आंऊं । तिथ तूं ॥ २८९ ॥
३०० सनिचर । तांपं । सें । भो । वादक सब अंगं । लग्गों । ध्यानं ॥
३०१ ' पाठान्तरः - तिहिं । गदरीय । वरष तीन सै असीय लगि । अस अगल ॥
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