पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआदि पर्व ] पृथ्वीराजरासौ । १०१
॥ बीसलदेवजी को सांप का काटना और उस से उन का मरना ॥
दूहा ॥ वार रवी तिथि सत्तमी । चलि रथ सुतर सतंग ॥
तिहि वेरां आयौ कहै । डेरा माँचि पनंग ॥
छं० ॥ ५०८ ॥ रु० ॥ २५२ ॥
कवित्त ॥ देषि राज करि क्रोध । वान को दंड धरिय कर ॥
वेधि पनग फन छिक्कि । पद्यौ धर तरफत बेसिर ॥
कुट तिहि बेर सतंग । खेल देषन कौं धायौ ॥
एक मोजरी मढ़ि । पनग फन आनि लुकायौ ॥
फिरि राय आय हेंवर चढ्यौ । पहरत मोजे पग डस्यौ ॥
भवितव्य बात आघात गति । इतनी कहि राजन ढस्यौ ॥
छं० ॥ ५०९ ॥ रु० ॥ २५३ ॥
दूहा ॥ ओषद मंच अनंत जप । कितने करे उपाय ॥
ज्यों ज्यों तन लहरत चढत । त्यों त्यों दुचितौ राय ॥
छं० ॥ ५१० ॥ रु० ॥ २५४ ॥
कवित्त ॥ राज मरन उपनो । सब्ब जन सोच उपन्नौ ॥
पट रागिनि पावार । निकसि तब ही सत किन्नौ ॥
तिन मुष इम उच्चरौ । होइ जदवनि सपुत्तय ॥
यो असीस इह फुरौ । तुम्म भोगवहु धरत्तिय ॥
जिन रथी मढ़ि उठे अतुर । धपै ज्वाल तिन मुष विषय ॥
नर भषय जहां लसकर* सहर । मिलै मनिष ते ते अभय ॥
छं० ॥ ५११ ॥ रु० ॥ २५५ ॥
२५२ पाठान्तर :-तिथ । सपतमी । तिथि । कह्यो । डेरां । मांहि । माहि । पबंग ॥
२५३ पाठान्तर :-वांन । बंड । नाग । छिक्र । वेंसिर । छुट्यो । सं० १७९० और १६४७ में
“मिलि राजन मोजरीय” । को । आयौ । मधि । पनंग । आंनि । आय राय ॥
२५४ पाठान्तर :-उपद्द । उपाइ । ज्यों ज्यों । लहरी । त्यो त्यो । दुचितो ॥
२५५ पाठान्तर :-उपनौ । ऊपनौ । उपंतो । निकसी । कीनो । इह । उच्चलौ । सपुतय ।
सपुतह । कुरौं । भोगवो । धरतय । इन । मधि उठै । भपै । शहर । मिले । मनुष । भपै ॥
- हिं० लसकर (SK: लश To be skilful or clever, to do anything skilfully and scien-
tifically or लस To play or sport, to work and कर Who or what does, makes or causes.)
Hence a camp or cantonment &c.