पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०० पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व
कवित्त ॥ देव चरित रमि धाइ । इक्क कार हीय मद्धि धरि ॥
सु रचि तिथ्य अडसट्ठि । मान पहुकर प्रकास करि ॥
दिग अंबर उर धारि । तारि तारी तप तारनि ॥
मन सुर भाग समान । खाइ रष्यै परि पारनि ॥
बर तर्प चंद अन दर्प करि । तामस द्रिग विकराल मन ॥
सस गवरि अंग अंग सिष उसिष । नृपति समंतन असुर वन ॥
छं० ॥ ५०५ ॥ रू० ॥ २४८ ॥
॥ श्राप से विमुक्त होने के विचार से बीसलदेवजी का गोकर्ण
की यात्रा के लिये बीसल सरवर पर प्रस्थान करना ॥
दूहा ॥ तजि नरिंद अजमेर पुर । चित गोक्रन हर थान ॥
बीसल सरवर ऊपरैं । बीसल दिय प्रस्थान ॥
छं० ॥ ५०६ ॥ रू० ॥ २५० ॥
॥ तपस्विनी के श्राप से बीसलदेवजी की बुद्धि का चल विचल होना ॥
दूहा ॥ काम कुमत्तौ उप्पन्नौ । दीय तपसनी स्वाप ॥
बीसल दे बुधि चल विचल । प्रगटि पुब्ब कौ पाप ॥
छं० ॥ ५०७ ॥ रू० ॥ २५१ ॥
महाकाव्यादि के पठित विद्वानों को चंद कवि पर तो नहीं किन्तु इन दोष देने वालों की कुशाग्र
बुद्धि पर बड़ा आश्चर्य होगा क्योंकि संस्कृत काव्यों तथा अन्य बड़े २ ग्रंथों में प्रायः ऐसे उदाहरण
मिलते हैं। देखो माघ के चतुर्थ सर्ग के २१ वें श्लोक में सहरितालसमाननवांशुकः । दो वार
प्रयोग हुआ है और रघुवंश के दूसरे सर्ग के श्लोक ३१ की अंत की पंक्ति चित्रार्पितारम्भइवावतस्थे ॥
कुमारसंभव के तीसरे सर्ग के ४२ वें श्लोक में भी महाकवि कालिदासजी ने प्रयोग कियी है।
तथा रघुवंश के सातवें सर्ग के ६ छठे श्लोक से लेकर ग्यारहवें ११ तक के सब श्लोक जैसे के तैसे
कुमारसंभव के सातवें ७ सर्ग के ५७ सत्तावनवें श्लोक से ६२ बासठवें तक महाकवि कालिदासजी
ने प्रयोग किये हैं ॥
२४८ पाठान्तरः-द्वार । इक्क । रहिय । रहीय । मधि । तिथ । अडसठि । मांन । उधारि ।
समांन । रषे । पारन तर्प । दर्प । अंग अंग ॥
२५०-५१ पाठान्तरः-तेजिं । नरेंद्र । चिंत । गऊकन । यांन । उपरे । प्रस्थांन ॥ २५० ॥
कांम । कुमती । ऊपनों । दिय । तपशिनी । सराप । कों ॥ २५१ ॥