पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५०२ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व
॥ बीसलदेवजी के मरण और असुर हो नर भक्षण करने की
बात सुनकर सारंगदेवजी का अपनी राणी को रणथंभ भेजना
और आप उन से युद्ध करने को तयार होना ॥
दूहा ॥ सुनिय बात तो तात तब । हौं पठई रिनथंभ ॥
संच वद्दि तिन तेग बल । जुद्ध जुरन आरंभ ॥
छं० ॥ ५१२ ॥ रु० ॥ २५६ ॥
॥ सारंगदेवजी की राणी गवरी का चिंता करना ॥
दूहा ॥ उन गति मो गति इक्क होइ । कै अवगत्ति मिलंत ॥
हास मिटै दुष को संधै । इहय चित्त मो चिंत ॥
छं० ॥ ५१३ ॥ रु० ॥ २५७ ॥
॥ सारंगदेवजी का सेना लेकर ढुंढा राक्षस से युद्ध करने को
अजमेर पहुँचना ॥
दूहा ॥ एक सल्ल भरि सध्य करि । सवल सकर दिय फेरि ॥
द्वै निसान चहुवान चढि । पहुँचिय गढ अजमेर ॥
छं० ॥ ५१४ ॥ रु० ॥ २५८ ॥
॥ सारंगदेवजी का तीन दिन कोट में रहना, वहां असुर का न
मिलना और अजमेर की भ्रष्ट और भयानक
दशा देखकर चिंता करना ॥
कवित्त ॥ अति उद्यान सब थान । भये गढ धाम भयानक ॥
दिष्ट देषि सारंग । दैव चिंते तब बानिक ॥
ताकै कुल उपनीय । तपनि चम कौ कुल षोयौ ॥
तात पुकारे नीर । भरे नैनन्ह घन रोयौ ॥
दिन तीन रहत हुअ कोट मधि । असुर नयन दिष्यौ नहियँ ॥
तब सुचित भए सारंग दे । पुरी बसाऔं इह कहिय ॥
छं० ॥ ५१५ ॥ रु० ॥ २५९ ॥
५६-५८ पाठान्तर :-वत्त । हों । मो । रन । वंदि । बर । जुध ॥ २५६ ॥ इन । हुंक ।
हुव । कैं । अवगति । चित ॥ २५७ ॥ भर । सद्य । निसांन । चहुआंन । चहुवांन । पहुचिय ॥ २५८ ॥
२५९ पाठान्तर :-उद्यांन । यांन । धांम । वांनिक । वाकै । नैननं । रहंत । बसावौ ।
बसावौं । कहीय ॥