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प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa

महाकवि भास (व्याख्याकार: डॉ. श्रीकृष्ण कुमार) द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

पृष्ठ 254, कुल 296 में से

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पृष्ठ 254

१६० ] प्रतिमानाटकम्
व्याकरण—सत्यं भाषितुं शीलं यस्य = सत्य + √भाष् + इनि = सत्यभाषिन् ।
पुत्रस्य शोकात् = पुत्रशोकात् । √शुच् + घञ् = शोक ।
छन्दः—अनुष्टुप् !
इदानीं कालः कथयितुम्—भास ने यहाँ कैकेयी को निर्दोष दिखाने के लिये
कल्पना की है कि राजा की रक्षा के लिये ही मन्त्रियों के परामर्श से उसने राम
को वन भेजने का कार्य किया था । अब वह रहस्य भरत के सामने कैकेयी खोलना
चाहती है, जिससे कि भरत का उसके प्रति क्रोध समाप्त हो जावे ।
सुमन्त्र ! आचक्ष्व विस्तरेण—कैकेयी उस बात को स्वयं नहीं कहना चाहती।
वह सुमन्त्र के द्वारा ही कहलाती है, जिससे कि भरत को विश्वास हो सके।
पुरा मृगयां गतेन—रामायण में श्रवणकुमार की कथा है। अन्धे माता-पिता
को वह तीर्थयात्रा करा रहा था। रात में सरयू के तट पर वह जल भरने गया।
इसी समय दशरथ वहाँ शिकार खेलने आ निकले। दूसरे घड़े में जल भरने के शब्द
उन्होंने राजा का शब्द समझकर शब्दवेधी बाण चलाया। उससे श्रवणकुमार की
मृत्यु हो गई। दुःखी होकर उन अन्धे माता-पिता ने दशरथ को शाप दिया कि
उसकी भी इसी प्रकार पुत्र के विरह के दुःख से मृत्यु होगी।
भरतः—नान्विदं कष्टं नाम ।
कैकेयी—जाद ! एतण्णिमित्तं अवराहे मां णिक्खिविअ पुत्तओ रामो वणं
पेषिदो, ण हु रज्जलोहेण । अपरिहरणीओ महरिसिसाओ पुनविप्पवासं विणा ण होहि ।
[जात ! एतन्निमित्तमपराधे मां निक्षिप्य पुत्रको रामो वनं प्रेषितः, न खलु
राज्यलोभेन । अपरिहरणीयो महर्षिशापः पुत्रविप्रवासं विना न भवति ।]
भरतः—अथ तुल्ये पुत्रविप्रवासे कथमहमरण्ये न प्रेषितः ?
कैकेयी—जाद ! मादुलउले वत्तमाणस्स पइदीहूदो दे विप्पवासो । [जात !
मातुलकुले वर्तमानस्य प्रकृतीभूतस्ते विप्रवासः ।]
भरतः—अथ चतुर्दशवर्षाणि किं कारणमवेक्षितानि ?
कैकेयी—जाद ! चउद्दस दिवस त्ति वत्तुकामाए पय्याउलहिअआए चउद्दस
वरिसाणि त्ति उत्तं । [जात ! चतुर्दश दिवसा इति वक्तुकामयपर्याकुलहृदयया
चतुर्दश वर्षाणीत्युक्तम् ।]
भरतः—अस्ति पाण्डित्यं सम्यग् विचारयितुम् । अथ विदितमेतद्
गुरुजनस्य ?
सुमन्त्रः—कुमार ! वसिष्ठवामदेव प्रभृतीनामनुमतं विदितं च ।
भरतः—हन्त ! त्रैलोक्यसाक्षिणः खल्वेते । दिष्ट्याऽनपराद्धात्रभवती ।