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प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa

महाकवि भास (व्याख्याकार: डॉ. श्रीकृष्ण कुमार) द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

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पृष्ठ 209

पञ्चमोऽङ्कः [ १४५
सीता—आर्यपुत्र के मुख का रंग ऐसा प्रतीत हो रहा है ।' जैसे कि शोक से
से हृदय सूना हो रहा हो । यह क्या बात है ?
राम—सीते ! आपने उचित ही चिन्ता की है—
अर्थ [श्लोक ४]—विधाता के बाणों से आहत किये गये मेरे शरीर में हृदय
का घाव अभी तो वैसा ही था, अभी वह घाव भरा भी नहीं था कि अनेक प्रकार के
फलों अर्थात् दुःखों को उत्पन्न करने वाले शोकरूपी बाणों के आघातः बार-बार वहीं
और वहीं गिर रहे हैं । अभी तो पिता की मृत्यु और वनवास के दुःख का घाव भरा
भी नहीं है कि हृदय पर पुनः-पुनः और आघात पड़ रहे हैं ॥४॥
संस्कृत-व्याख्या—कृतान्तशल्याभिहते कृतान्तस्य विधातुः शल्यैः बाणैः
अभिहते आहते मे मम शरीरे वपुषि हृदयस्य व्रणः पितृनिधन-जन्यशोकरूपः मान-
सिकाघातव्रणः तावत् तथा एव तथाविध एव वर्तते, न साम्प्रतमपि विरूढः । अपितु
नानाफला नानाविधानि फलानि प्रयोजनानि दुःखदायकानि येषां तथाविधाः
शोकroundशराभिघाताः शोकः विषादः एव शराः बाणाः तेषाम् अभिघाताः प्रहाराः पुनः
वारं वारं तत्र एव तत्र एव तस्मिन् हृदये एव पतन्ति । पितृमरणजन्यस्य
हृदयस्थितशोकस्य व्रणः अद्यापि न विरूढः, अपरश्च शोकशराभिघातः हृदये
आपतितः ॥४॥
व्याकरण—कृतान्तस्य शल्यैः अभिहते = कृतान्तशल्याभिहते । कृतः अन्तः
येन स = कृतान्तः । अभि + √हन् + क्त = अभिहत । शोकः एव शराः तेषाम्
अभिघाताः = शोकशराभिघाताः । अभि + √हन् + णिच् + क्त = अभिघात ।
छन्दः—उपजाति ।
अलङ्कार—विषम और रूपक । व्रणित हृदय पर पुनः आघात होने से विषम
अलङ्कार है । शोकः एव शराः में उपमेय पर उपमान का आरोप होने से रूपक
अलङ्कार है ।
धर्म विघ्नः—धर्मे विघ्नः = धर्मविघ्नः । वि + हन् + क = विघ्नः आश्रमों में
वृक्ष आदि का सेचन तपस्वियों का धर्म माना गया है ।
शोकशून्यहृदस्य—शोकेन शून्यं हृदयं यस्य तस्य । मुखस्य रागः = मुखरागः ।
रञ्ज् + घञ् = राग । राम को श्राद्ध की चिन्ता थी, अतः उनके मुख पर चिन्ता के
भावों के कारण मुख का रंग फीका हो जाना स्वाभाविक था ।
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सीता—अय्यउत्तस्स को विअ सन्तावो ? [आर्यपुत्रस्य क इव
सन्तापः ? ]
रामः—श्वस्तत्रभवतस्तातस्यानुसंवत्सरश्राद्धविधिः । कल्पविशेषेण
निर्वपणक्रियामिच्छन्ति पितरः । तत् कथं निर्वर्तयिष्यामीत्येतच्चिन्त्यते ।