प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)
Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa
महाकवि भास (व्याख्याकार: डॉ. श्रीकृष्ण कुमार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४४ ] प्रतिमानाटकम्
तत्पराम् । भारतीय स्त्रियां प्रत्येक अवस्था में सुख-दुःख में समृद्धि-निर्धनता में, यश-
अपयश में, मान-अपमान में पति का साथ देती हैं। यही उनका धर्म है । अतः वे
पति के शोक को दूर करने और उनकी प्रसन्नता को बढ़ाने में सहायक होती हैं ।
प्रत्यग्राभिषिक्तानि...—वृक्षों को सीता ने अभी अभी सींचा है । अतः उनके
आलवाल में जल भरा हुआ है । पक्षी उसको आनन्द से पी रहे हैं । बिलों में जल
भर जाने से कीड़े बाहर निकल रहे हैं और वृक्षों के मूल में पंक मिश्रित जल की रेखा
का वलय बन गया है ।
भोः कष्टम्—राजमहलों में पली अति कोमल सीता को, घड़ा उठा कर
वृक्षों का सेचन करते देख कर राम के मन में व्यथा होती है ।
अपि तपो वर्धते—तपस्वियों का कुशल मंगल पूछने के लिये तप के सम्बन्ध
प्रश्न किया जाता है । अपि यहाँ प्रश्नार्थक है ।
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सीता—हुं अय्यउत्तो ? जेदु अय्यउत्तो । (हुं, आर्यपुत्र ?
जयत्वार्यपुत्रः ।)
रामः—मैथिलि ! यदि ते नास्ति धर्मविघ्नः, आस्यताम् ।
सीता—जं अय्यउत्तो आणवेदि । (यदार्यपुत्र आज्ञापयति ।) (उपविशति)
रामः—मैथिलि ! प्रतिवचनाथिनीमिव त्वां पश्यामि । किमिदम् ?
सीता—सोअसुण्णहिअअस्स विअ अय्यउत्तस्स मुहराओ । किं एदं ।
(शोकशून्यहृदयस्येवार्यपुत्रस्य मुखरागः किमेतत् ?)
रामः—मैथिलि ! स्थाने खलु कृता चिन्ता ।
कृतान्तशल्याभिहते शरीरे
तथैव तावद्धृदयव्रणो मे ।
नानाफलाः शोकशरामिघाता-
स्तत्रैव तत्रैव पुनः पतन्ति ॥४॥
[अन्वयः—कृतान्तशल्याभिहते मे शरीरे हृदयव्रणः तावत् तथा एव । नाना-
फलाः शोकशरामिहताः पुनः तत्र एव तत्र एव विशन्ति ॥४॥]
हिन्दी रूपान्तर—
सीता—हुं, आर्यपुत्र हैं ? आर्यपुत्र की जय हो ।
राम—सीते ! यदि आपके धार्मिक कार्य में विघ्न न हो रहा हो तो
बैठिये ।
सीता—जैसा आर्यपुत्र आदेश देते हैं । (बैठती है)
राम—सीते ! मैं देख रहा हूँ कि तुम कुछ पूछना चाहती हो, यह क्या
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