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प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa

महाकवि भास (व्याख्याकार: डॉ. श्रीकृष्ण कुमार) द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

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पृष्ठ 210

१४६ ] प्रतिमानाटकम्
अथवा—
गच्छन्ति तुष्टिं खलु येन केन
त एव जानन्ति हि तां दशां मे ।
इच्छामि पूजां च तथापिकर्तुं
तातस्य रामस्य च सानुरूपाम् ॥५॥
[अन्वयः—येन केन खलु तुष्टिं गच्छन्ति । ते एव हि मे तां दशां जानन्ति ।
तथापि रामस्य सानुरूपां तातस्य पूजां कर्तुम् इच्छामि ॥५॥
हिन्दी रूपान्तर—
सीता—आर्यपुत्र को कौन सा सन्ताप हो रहा है ?
राम—कल आदरणीय पिता जी का वार्षिक श्राद्ध का दिन है । पितरों की
इच्छा होती है कि उनकी सन्तान शास्त्रोक्त विधि के अनुसार अपनी सामर्थ्य से
पिण्डदान की क्रिया करें । तो मैं इस पिण्डदान की क्रिया को कैसे करूँगा, यह विचार
कर रहा हूँ। अथवा—
अर्थ [श्लोक ५]—जिस किसी प्रकार से वे सन्तुष्ट हो जाते हैं तो हो जावें ।
वे ही निश्चय से मेरी उस अवस्था को जानते हैं। तो भी जो राम के सामर्थ्य से करने
के योग्य हो, मैं पिता की वैसी ही श्राद्ध-पूजा करना चाहता हूँ । यद्यपि मेरी अवस्था
को, वन में निवास को तथा धनहीनता को वे पितर जानते हैं, अतः जैसा भी मैं श्राद्ध
करूंगा, उससे वे सन्तुष्ट हो जायेंगे, तथापि मैं अपने सामर्थ्य के अनुरूप उनका
श्राद्ध करना चाहता हूँ ॥५॥
संस्कृत-व्याख्या—श्राद्धक्रियासु ते पितरः येन केन येन केनापि प्रकारेण पुत्र-
वैभवानुरूपेण श्राद्धविधिना तुष्टिं तृप्तिं गच्छन्ति । तथापि रामस्य सानुरूपां सामर्थ्या-
नुसारं तातस्य पितुः जनकस्य पूजां श्राद्ध-निर्वपणक्रियां कर्तुं विधातुम् इच्छामि
अभिलषामि । यद्यपि मम वर्तमानदशां वने निवासं धनरहितत्वं च मे पितरः जानन्ति,
अतः यथैवाहं तेषां निर्वपणविधिं करिष्यामि तथैव ते सन्तोषं प्राप्स्यन्ति, तथापि
रामोऽहं जगति विख्यातप्रभावः । अतः तदनुसारमेव मया श्राद्धविधिः सम्पादनीया ।
परं विगतधनः कथं तन्निर्वहियेयमिति मे चिन्ता ॥५॥
व्याकरण—√तुष् + क्तिन् = तुष्टि । √दृश् + अङ् + टाप् = दशा । रूपस्य
योग्यम् = अनुरूपम् ।
छन्दः—उपजाति ।
अलङ्कार—परिकर और दीपक । सानुरूपाम् इस अभिप्रायगर्भित विशेषण
होने के कारण परिकर अलङ्कार है । तातस्य रामस्य च इन दोनों कारकों का एक
क्रिया से सम्बन्ध होने से दीपक अलङ्कार है ।
तातस्य अनुसंवत्सरश्राद्धविधिः—हिन्दू धर्म में परम्परा है कि पिता के
स्वर्ग चले जाने पर उनकी स्मृति में पुत्र श्राद्ध करते हैं। इस अवसर पर ब्राह्मणों को