प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)
Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary
मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा
६० प्रासादमण्डने
अब मै उदुम्बर ( देहली ) का स्वरूप कहता हूं। यह स्तंभों की कुम्भियों की ऊंचाई के
बराबर ऊंचाई का रक्खे। यदि किसी कारण वश नीचा करने की आवश्यकता हो तो कुम्भी के
अर्धभाग, तीसरा भाग अथवा चौथा भाग जितना नीचा कर सकते है। ऐसे चार प्रकार के
उदुम्बर का उदय प्रशस्त माना है। इससे हीन अथवा अधिक उदय का बनावें तो दुषित होता
है * खुरथर के उदय बराबर अर्द्ध चन्द्रका उदय रक्खे, और इसके ऊपर उदुम्बर रक्खे। गर्भगृह
के भूमितलका उदय उदुम्बर के आधे, तीसरे अथवा चौथे भाग मे रक्खें। बाहर के मंडपों का
भूमितल पीठ के उदयान्त तक रक्खें और रंगमंडप का भूमितल पीठ के नीचे के अंत्य भाग
मे रक्खे।
क्षीरार्णव में भी कहा है कि—
“उदुम्बरे क्षते¹ कुम्भी स्तम्भकं चावपूर्वकम् ।
सान्धारे च निरन्धारे कुम्भिकान्तमुदुम्बरम् ॥” अध्याय १०६
यदि किसी कारण वश उदुम्बर का उदय कम किया जाय तो भी कुम्भी और स्तंभ का
मान पहले जितना ही रखना चाहिये, अर्थात् स्तम्भकी कुम्भी कम नही करनी चाहिये ऐसा विशेष
नियम है। बाकी सांधार और निरंधार प्रसादो मे कुम्भी के उदय बराबर उदुम्बर का उदय
रखना चाहिये, ऐसा सामान्य नियम है।
अर्द्धचन्द्र (शंखावर्त्त) --
खुरकेन समं कुर्या-दर्ध चन्द्रस्य चोच्छ्रतिः ।
द्वाख्याससमं दैर्घ्यं निर्गमं स्यात् तदर्धतः ॥४२॥
द्विभागमर्धचन्द्रं च भागेन द्वौ गगाऽकौ ।
शङ्खत्रसमायुक्तं पद्माकारैरलङ्कृतम् ॥४३॥
इति अर्द्धचन्द्रः ।
- कितने ही आधुनिक शिल्पियो की मान्यता है कि—“उदुम्बर (देहलो) कुम्भा से निचा उतारने
की आवश्यकता हो तब उसके बराबर स्तंभ की कुम्भिया भी नीची उतारनी चाहिये ।” उनकी यह मान्यता
प्रामाणिक मालूम नही होती. क्योकि क्षीराणव अ० १०६ मे स्पष्ट लिखा है कि—'उदुम्बरे क्षते (हते)
कुम्भी स्तम्भं तु पूर्ववत् भवेत् ।' कभी उदुम्बर उदय मे कम करने की आवश्यकता हो तब स्तम्भ और उनकी
कुम्भिया प्रथम के मान के अनुसार रखनी चाहिये । एवं अपराजित पृच्छा सूत्र १२६ मे तो कुम्भियो से ही
उदुम्बर नीचा उतारने को कहा है. तो कुम्भिया नीचे कैसे की जाय ? इससे साफ मालूम होता हैं कि जब
उदुम्बर नीचा करने की आवश्यकता हो, तब कुम्भियां नीचे नही करनी चाहिये, किन्तु कुम्भा के उदय बराबर
ऊंचाई में रखनी चाहिये । (१) 'हृते'
तृतीयोऽध्यायः ६१
उदुम्बर के आगे जो अर्द्धचन्द्र के जैसी आकृति की जाती है, उसका उदय खुर थर के
उदय के बराबर रक्खे। द्वार के विस्तार के बराबर अर्द्धचन्द्र लंबा बनावे और लम्बाई से
आधा निर्गम रक्खे। लम्बाई के तीन भाग करके उनमे से दो भाग का अर्द्धचंद्र और इसके
दोनो तरफ आधे २ भाग का दो गगारक बनावे। अर्द्धचन्द्र और गगारक के बीच मे पत्तेवाली
वेलयुक्त शंख और पद्मपत्र जैसी आकृति से सुशोभित बनावे ॥४२-४३॥
उत्तरंग—
"उदुम्बरसपादेन उत्तरङ्गं विनिर्दिशेत् ।
तदुच्छ्रयं विभजेत भागा अथैकविंशतिः ॥
पत्रशाखा त्रिशाखा च द्विसार्धा तु कारयेत् ।
मालाधरं च त्रिभागं कर्तव्यं वामदक्षिणे ॥
ऊर्ध्वे छाद्यकः पादोनः पादोना फालना तथा ।
रथिका सप्तभागाश्च भागैकं कण्ठं भवेत् ॥
षड्भागमुत्सेधं कार्य-मुद्गमं च प्रशस्यते ।
ईदृशं कारयेत् प्राज्ञः सर्वयज्ञफलं भवेत् ॥" वास्तुविद्या अ० ६
द्वार के उदुम्बर के उदय से उत्तरंग का उदय सवाया रक्खे। जो उदय आवे उसके
इक्कीस भाग करे। उनमे से ढाई भाग को पत्रशाखा और त्रिशाखा बनावे । उसके ऊपर तीन
भाग का मालाधर, पौन भाग की छज्जी, पौन भाग का फालना, सात भाग की रथिका
( गवाक्ष ), एक भाग का कंठ और छह भाग का उद्गम बनावे । इस प्रकार बुद्धिमान पुरुष
उत्तरंग बनावेगे तो सब यज्ञो के बराबर फलदायक होता है ।
उत्तरंग
उद्गम ६
रथिका ७
कण्ठ १
फालना ३/४
छाद्यक ३/४
मालाधर ३
२।। १/२
—उत्तरंग रेखा २१ भाग—
६२ प्रासादमण्डने
नागरप्रासाद का द्वारमान—
एकहस्ते तु प्रासादे द्वारं स्यात् षोडशाङ्गुलम् ।
षोडशाङ्गुलिका वृद्धि-र्यावद्धस्तचतुष्टयम् ॥४४॥
अष्टहस्तान्तकं यावद् दीर्घे वृद्धिर्गुणाङ्गुला ।
द्व्यङ्गुला प्रतिहस्तं च यावद्धस्तशताद्धर्कम् ॥४५॥
यानवाहनपल्यङ्कं द्वारं प्रासादसद्मनाम् ।
दैर्ध्यार्द्धेन पृथुत्वं स्याच्छोभनं तत्कलाधिकम् ॥४६॥
इति नागरप्रासादद्वारमानम् ।
नागर जाति के प्रासाद के द्वार का उदय एक हाथ के विस्तार वाले प्रासाद के द्वार का
उदय सोलह अंगुल रखना चाहिये । पीछे चार हाथ तक सोलह २ अंगुल, पांच से आठ हाथ तक
तीन २ अंगुल और नौ से पचास हाथ तक प्रत्येक हाथ दो २ अंगुल बढ़ा करके द्वार का उदय
रखना चाहिये । इस प्रकार पचास हाथ के प्रासाद के द्वार का उदय १६० अंगुल¹ होता है ।
पालखी, वाहन, शय्या और पलंग तथा प्रासाद और घर का द्वार, ये सब विस्तार में लंबाई
से आधा रखना चाहिये । उसमे भी लंबाई का सोलहवां भाग विस्तार में बढ़ावे तो अधिक
शोभायमान होता है ॥४४ से ४६॥
क्षीरार्णवमें कहा है कि—
“एकहस्ते तु प्रासादे द्वारं च षोडशाङ्गुलम् ।
इयं वृद्धि. प्रकर्त्तव्या यावच्च चतुर्हस्तकम् ॥
वेदाङ्गुला भवेद् वृद्धि-र्यावच्च दशहस्तकम् ।
हस्तविंशतिमाने च हस्ते हस्ते त्रयाङ्गुला ॥
द्वयाङ्गुला भवेद् वृद्धिः प्रासादे त्रिंशद्धस्तके ।
अङ्गुलेका ततो वृद्धि-र्यावत्पञ्चाशद्धस्तकम् ॥
नागराख्यमिदं द्वार-मुक्तं क्षीरार्णवे मुने ।।
दशमाशो यदा हीनं द्वारं स्वर्गे मनोहरम् ॥
अधिकं दशमांशेन प्रासादे पर्वताश्रये ।
तावत्क्षेत्रान्तरे ज्ञातु-मर्हहेवमुनीश्वर ! ॥
(१) समरांगण सूत्रधार अध्याय ५५ श्लोक १२६ मे चार से अधिक मान के प्रासादो मे तीन तीन
अंगुल बढाना लीखा हैं । जिसे पचास हाथ के प्रासाद का द्वारमान २०२ अंगुल का होता है ।
तृतीयोऽध्यायः ६३
शिवे द्वारं भवेज्ज्येष्ठं कनिष्ठं च जनालये ।
मध्यमं सर्वदेवानां सर्वकल्याणकारकम् ॥
उत्तममुदयार्धेन पादोनं मध्यमानकम् ।
तस्य हीनं कनिष्ठं च विस्तारे द्वारमेव च ॥
एवं ज्ञानं यदा ज्ञात्वा यदा द्वारं प्रतिष्ठितम् ।
नागरं सर्वदेवानां सर्वदेवेषु दुर्लभम् ॥”
इति विश्वकर्मकृते क्षीरार्णवे नारदपृच्छिते शताग्रे पञ्चमोऽध्यायः ।
एक से चार हाथ तक प्रत्येक हाथ सोलह २ अंगुल की, पांच से दश हाथ तक चार २ अंगुल
की, ग्यारह से बीस हाथ तक तीन २ अगुल की, इक्कीस से तीस हाथ तक दो २ अगुल की
और इकतीस से पचास हाथ तक एक अंगुल की वृद्धि करके द्वार बनाना चाहिये । हे मुनि !
यह क्षीरार्णव मे नागर जाति के द्वार का मान कहा। उसमे से दसवां भाग कम करें तो स्वर्ग
के और अधिक करे तो पर्वत के आश्रित प्रासाद के द्वारका मान होता है। शिवालय मे ज्येष्ठ
द्वार, मनुष्यालय मे कनिष्ठ द्वार और सब देवो के प्रासादो मे मध्यम द्वार बनाना चाहिये । यह
सब कल्याण करने वाला है। उदय से आधा विस्तार रक्खे तो यह उत्तम मान का द्वार माना
जाता है। इसमे उत्तम मान के विस्तार का चतुर्थांश कम रक्खे तो मध्यम मान का और इसमे
भी मध्यम मान के विस्तार का चतुर्थांश कम रखें तो कनिष्ठ मान का द्वार माना जाता है।
ऐसा समझ करके ही सब देवों के लिये यह नागर जाति का द्वार बनाना चाहिये ।
भूमिजादिप्रासादका द्वारमान—
एकहस्ते सुरागारे द्वारं सूर्याङ्गुलोदयम् ।
सूर्याङ्गुला प्रतिकरं वृद्धिः पञ्चकरावधि ॥४७॥
पञ्चाङ्गुला च सप्तान्तं नवान्तं सा युगाङ्गुला ।
द्व्यङ्गुला तु शतार्द्धान्तं वृद्धिः कार्या करं प्रति ॥४८॥
इति भूमिजप्रासादद्वारमानम् ।
एक हाथ के विस्तार वाले प्रासाद के द्वार का उदय बारह अंगुल, पीछे पांच हाथ तक
प्रत्येक हाथ बारह २ अंगुल, छह और सात हाथ तक पाच २ अंगुल, आठ और नव हाथ तक
चार २ अंगुल, दस से पचास हाथ तक के प्रासाद के द्वार का उदय दो २ अंगुल बढ़ा करके
रक्खे । (उदय मे आधा विस्तार रखना चाहिये । विस्तार मे उदय का सोलहवां भाग बढाने
से अधिक शोभायमान होता है) ॥४७-४८॥
६४ प्रसादमण्डने
द्राविडप्रासाद का द्वारमान—
प्रासादे एकहस्ते तु द्वारं कुर्याद् दशाङ्गुलम् ।
रसहस्तान्तकं यावत् तावती वृद्धिरिष्यते ॥४९॥
पञ्चाङ्गुला दशान्तं च द्वयङ्गुला च शताद्र्द्धकम् ।
पृथुत्वं च तदर्धेन शुभं स्यात्तु कलाधिकम् ॥५०॥
इति द्राविडद्वारमानम् ।
एक हाथ के प्रासाद के द्वार का उदय दस अंगुल, पीछे छह हाथ तक प्रत्येक हाथ
दस २ अंगुल, सात से दस हाथ तक पांच २ अंगुल और ग्यारह से पचास हाथ तक के प्रासाद के
द्वार का उदय प्रत्येक हाथ दो दो अंगुल बढ़ा करके रक्खे। उदय से आधा विस्तार रक्खें।
विस्तार मे उदय का सोलहवां भाग बढ़ावे तो अधिक शोभायमान होता है ॥४९-५०॥
अन्य जाति के प्रासादों का द्वारमान—
विमाने भूमिजं मानं वैराटेपु तथैव च ।
मिश्रके लतिने चैव प्रशस्तं नागरोद्भवम् ॥५१॥
विमाननागरच्छन्दे कुर्याद् विमानपुष्पके ।
सिंहावलोकने द्वारं नागरं शोभनं मतम् ॥५२॥
वलभ्यां भूमिजं मानं फांसाकारेषु द्राविडम् ।
धातुजे रत्नजे चैव दारुजे च रथारुहे ॥५३॥
इति द्वारमानम् ।
विमान और वैराट जाति के प्रासाद का द्वार भूमिज जाति के मान का, मिश्र और
लतिन जाति के प्रासाद का द्वार नागर जाति के मान का, विमाननागर, विमानपुष्पक और
सिंहावलोकन जाति के प्रासाद का द्वारमान नागर जाति के मान का, वलभी प्रासाद का
द्वारमान भूमिज जाति के मान का, फांसनाकार, धातु, रत्न, दारुज और रथारुह जाति के
प्रासाद का द्वार द्राविड जाति के मान का रखना चाहिये ॥५१-५३॥
द्वारशाखा—
नवशाखं महेशस्य देवानां सप्तशाखिकम् ।
पञ्चशाखं सार्वभौमे त्रिशाखं मण्डलेश्वरे ॥५४॥
तृतीयोऽध्यायः ६५
एकशाखं भवेद् द्वारं शूद्रे वैश्ये द्विजे सदा ।
समशाखं च धूमाये श्वाने रासभवायसे' ॥५५॥
महादेव के प्रासाद का द्वार नवशाखा वाला, दूसरे देवों के प्रासाद का द्वार सात
शाखा वाला, चक्रवर्ती राजाओं के प्रासाद का द्वार पांच शाखावाला, सामान्य राजाओं के
प्रासाद का द्वार तीन शाखावाला, ब्राह्मण, वैश्य और शूद्र जाति के गृहों के द्वार एक
शाखावाला बनावे । दो, चार, छह और आठ, ये सम शाखावाले द्वार धूम, श्वान, खर और
ध्वांक्ष आय वाले घरों मे बनाने चाहिये ॥५४-५५॥
शाखा के आय—
“नवशाखे ध्वजश्चैको वृषभः पञ्चशाखिके ।
त्रिशाखे च तथा सिंहः सप्तशाखे गजः स्मृतः ॥” अप० सू० १३१
नवशाख मे ध्वज आय, पंचशाख मे वृषभाय, त्रिशाख में सिंह आय और सप्तशाख में
गज आय देनी चाहिये ।
प्रासाद के अंग तुल्य शाखा—
त्रिपञ्चसप्तनन्दाङ्गे शाखाः स्युरङ्गतुल्यकाः ।
हीनशाखं न कर्त्तव्य-मधिकालय' सुखावहम् ॥५६॥
प्रासाद के भद्र आदि तीन, पांच, सात अथवा नव अंग है। उनमे से जितने अंग का
प्रासाद हो, उतनी शाखाये बनानी चाहिये । अंग से कम शाखा नहीं बनाना चाहिये, लेकिन
यदि अधिक बनावे तो वह सुखदायक है ।
शाखा से द्वारका नाम और परिचय—
“पद्मिनी नवशाखं च सप्तशाखं तु हस्तिनी ।
नन्दिनी पञ्चशाखं च त्रिविधं चोत्तमं भवेत् ॥
मुकुली मालिनी ज्येष्ठा गान्धारी सुभगा तथा ।
मध्यमेति द्विधा प्रोक्ता कनिष्ठा सुप्रभा स्मृता ॥
मुकुली चाष्टशाखं च षट्शाखं च मालिनी ।
(१) श्वाने ध्वाङ्क्षे च रासभे ।
प्रा० ६
६६ प्रासादमण्डने
गान्धारी च चतुः शाखं त्रिशाखं सुभगा स्मृता ॥
सुप्रभा तु द्विशाखं चैकशाखं स्मरकीत्तितम् ॥" अप० सू० १३१
नवशाखा वाला द्वारका नाम पद्मिनी, सात शाखा वाला द्वारका नाम हस्तिनी और
पंचशाखा वाला द्वारका नाम नन्दिनी है। ये तीनों द्वार उत्तम हैं। मुकुली और मालिनी ये
त्रिशाखा द्वार
तृतीयोऽध्यायः ६७
दोनों द्वार ज्येष्ठ हैं। गांधारी और सुभगा ये दोनों द्वार मध्यम हे और सुप्रभा द्वार कनिष्ठ है।
आठ शाखावाला द्वार मुकुली, छह शाखावाला मालिनी, चार शाखावाला गांधारी, तीन
शाखावाला सुभगा, दो शाखावाला सुप्रभा और एक शाखावाला स्मरकीर्त्ति नाम का द्वार है।
न्यूनाधिक शाखामान—
अङ्गुलं सार्धमर्द्धं१ वा कुर्याद्धीनं तथाधिकम् ।
आयदोषविशुद्ध्यर्थं १ ह्रस्ववृद्धी न दूषिते ॥५७॥
द्वार शाखा के मान से शुभ आय न आती हो तो एक, डेढ़ अथवा आधा अंगुल न्यूनाधिक
करके श्रेष्ठ आय लानी चाहिये । आय दोष की शुद्धि के लिये शास्त्रीय मान मे इतना न्यूनाधिक
परिवर्तन किया जाय तो दोष नही है ॥५७॥
त्रिशाखा—
चतुर्भागङ्कितं कुर्याच्छाखाविस्तारमानकम् ।
मध्ये द्विभागिकं कुर्यात् स्तम्भं पुरुषसंज्ञकम् ॥५८॥
स्त्रीसञ्ज्ञका भवेच्छाखा पार्श्वतो भागभागिका ।
निर्गमे चैकभागेन रूपस्तम्भः प्रशस्यते ॥५६॥
शाखा के विस्तार का चार भाग करे । उनमे से दो भाग का रूप स्तंभ बनावैं। यह
स्तंभ पुरुष संज्ञक है। इसके दोनो तरफ एक २ भाग की शाखा रक्खे। यह शाखा स्त्री संज्ञक
है। रूप स्तंभ का निर्गम एक भाग का रखना श्रेष्ठ है ॥५६॥
शाखा स्तंभ का निर्गम—
एकांशं सार्धभागं च पादोनद्वयमेव च ।
द्विभागं निर्गमे कुर्यात् स्तम्भं द्रव्यानुसारतः ॥६०॥
द्रव्य की अनुकूलता के अनुसार शाखा के स्तंभ का निर्गम एक, डेढ़, पोना दो अथवा
दो भाग तक रख सकते है ॥६०॥
शाखोदर का विस्तार और प्रवेश—
पेटके विस्तरं कार्यं प्रवेशस्तु युगांशकः ।
कोशिका स्तम्भमध्ये तु भूषणार्थं हि पार्श्वयोः ॥६१॥
(१) 'ह्रासो वृद्धिर्न दुष्यति ।'
६८ प्रसादमण्डने
शाखा के विस्तार का चौथा भाग शाखा का प्रवेश ( निर्गम ) रक्खे । रूपस्तंभ के दोनों
तरफ शोभा के लिये एक २ कोणिका बनावें, इसमे चंपा के फूलों की अथवा जलवट की आकृति
करें ॥६१॥
सूत्रधार राजसिंह कृत वास्तुराज में कहा है कि—
“सर्वेषां पेटके व्यासः प्रवेशस्तु युगांशकः ।
सार्धवेदांशतो वापि पञ्चांशोऽथवा मतः ॥” अध्याय ६
सब शाखाओं का प्रवेश शाखा के विस्तार के चौथे भाग, साढे चार भाग अथवा पांचवें
भाग तक रक्खें । अपराजित पृच्छा सूत्र १३२ श्लो० २४ वें में भी यही लिखा है ।
शाखा के द्वारपाल का नाम—
द्वारदैर्घ्ये चतुर्थांशे द्वारपालो विधीयते ।
स्तम्भं शाखादिकं शेषं त्रिशाखा च विभाजयेत् ॥६२॥
इति त्रिशाखमानम् ।
द्वार के उदय का चार भाग करके एक भाग के उदय में द्वारपाल बनावें और बाकी
तीन भाग के उदय में स्तंभ और शाखा आदि बनावें ॥६२॥
तृतीयोऽध्यायः ६६
शाखा के रूप—
“कालिन्दी वामशाखाया दक्षिणे चैव जाह्नवी ।
गङ्गाऽर्कतनयायुग्म-मुभयोर्वामदक्षिणे ॥
गन्धर्वा निर्गमे कार्या एकभागा विचक्षणैः ।
तत्सूत्रे खल्वशाखा च सिंहशाखा च भागिका ॥
नन्दी च वामशाखायां कालो दक्षलताश्रितः ।
यक्षाः स्युरन्तशाखाया निधिहस्ताः शुभोदयाः ॥” अप० सू० १३२
बांयी द्वार शाखा के द्वारपाल की बांयी और यमुना और दाहिनी ओर गंगा, तथा
दाहिनी द्वार शाखा के द्वारपाल की बायी ओर गंगा और दाहिनी ओर यमुना देवी का
रूप बनाना चाहिये । गंधर्व शाखा के समसूत्र मे खल्वशाखा रक्खे, इन दोनों का निर्गम भी
एक भाग रक्खें। सिंहशाखा का निर्गम भी एक भाग रक्खें। हाथ में निधि को धारण किये हुए
बांयो शाखा मे नंदी और दाहिनी शाखा में काल नाम के यक्षो के रूप बनावे ।
पञ्चशाखा—
पत्रशाखा च गन्धर्वा रूपस्तम्भस्तृतीयकः ।
चतुर्थी खल्वशाखा च सिंहशाखा च पञ्चमी ॥६३॥
इति पञ्चशाखाः ।
पहली पत्रशाखा, दूसरी गान्धर्वशाखा, तीसरा रूपस्तंभ, चौथी खल्वशाखा और
पांचवी सिंहशाखा है।
पञ्चशाखा का मान—
“शाखाविस्तारमानं च षड्भिर्भागैर्विभाजयेत् ।
एकभागा भवेच्छाखा रूपस्तम्भो द्विभागिकः ॥
निर्गमश्चैकभागेन रूपस्तम्भः प्रशस्यते ।
कोणिका स्तम्भमध्ये च उभयोर्वामदक्षिणे ॥
गन्धर्वा निर्गमे कार्या एकभागा विचक्षणैः ।
तत्सूत्रे खल्वशाखा च सिंहशाखा च भागिका ॥
सपादः सार्धभागो वा रूपस्तम्भः प्रशस्यते ।
उत्सेधस्याष्टमांशेन शस्तं शाखोदरं मतम् ॥” अप० सू० १३२
पंचशाखा के विस्तार का छह भाग करें। उनमें से एक २ भाग की चार शाखा और
दो भाग का रूपस्तम्भ बनावे । रूपस्तम्भ का निर्गम एक भाग रक्खे, इसके दोनों तरफ एक २
७० प्रासादमण्डने
कोणी बनावें । गान्धर्व शाखा का निर्गम एक भाग रक्खें। उसके समसूत्र में खल्वशाखा और
सिंहशाखा एक २ भाग निकलती रक्खें। स्तंभ का निर्गम सवा अथवा डेढ़ भाग का भी रख
सकते हैं। द्वार के उदय का अष्टमांश शाखा के पेटाभाग का विस्तार रक्खें।
सप्तशाखा के मान--
प्रथमा पत्रशाखा च गन्धर्वा रूपशाखिका ।
चतुर्थी स्तम्भशाखा च रूपशाखा च पञ्चमी ॥६४॥
षष्ठी तु खल्वशाखा च सिंहशाखा च सप्तमी ।
स्तम्भशाखा भवेन्मध्ये रूपशाखाग्रसूत्रतः ॥६५॥
इति सप्तशाखाः।
प्रथमा पत्रशाखा, दूसरी गान्धर्वशाखा, तीसरी रूपशाखा, चौथी स्तंभशाखा, पांचवीं
रूपशाखा, छठी खल्वशाखा और सातवीं सिंहशाखा है। मध्य में स्तंभशाखा रक्खें। यह
रूपशाखा से आगे निकलती हुयी रक्खें ॥६४-६५॥
सप्तशाखा का मान—
"शाखाविस्तारमानं तु वसुभागविभाजितम् ।
भागभागाश्च शाखाः स्यु-र्मध्यस्तम्भो द्विभागिकः ॥
कोणिका भागपादेन विस्तारे निर्गमे तथा ।
निर्गमः सार्धभागेन रूपस्तम्भः प्रशस्यते ॥
गन्धर्वा सिंहशाखा च निर्गमो भागमेव च ।
निर्गमश्च तदर्धेन शेषाः शाखाः प्रशस्यते ॥" अप० सू० १३२
सप्तशाखा के विस्तार का आठ भाग कर उनमे से प्रत्येक शाखा का विस्तार एक २
भाग और मध्य में स्तंभ का विस्तार दो भाग रक्खें। स्तंभ में दोनो तरफ विस्तार में और
निर्गम मे पाव २ भाग की कोणिका बनावें। डेढ़ भाग निकलता रूपस्तंभ रखना अच्छा है।
गंधर्व और सिंहशाखा का निर्गम एक २ भाग और बाकी शाखाओं का निर्गम आधा २ भाग
रखना अच्छा है।
नवशाखा के नाम--
पत्रगान्धर्वसञ्ज्ञा च रूपस्तम्भस्तृतीयकः ।
चतुर्थी खल्वशाखा च गन्धर्वा त्वथ पञ्चमी ॥६६॥
तृतीयोऽध्यायः ७१
रूपस्तम्भस्तथा षष्ठी रूपशाखा ततः परम् ।
खल्वशाखा च सिंहाख्या मूलकर्णेन सम्मिता ॥६७॥
इति नवशाखाः ।
प्रथमा पत्रशाखा, दूसरी गात्रर्वशाखा, तीसरी स्तंभशाखा, चौथी खल्वशाखा, पांचवी
गांधर्वशाखा, छठा रूपस्तंभ, सातवी रूपशाखा, आठवीं खल्वशाखा और नवमी सिंहशाखा है ।
ये नवशाखा का विस्तार प्रासाद के कोने तक किया जाता है ॥६६-६७॥
नवशाखा का मान—
“शाखाविस्तारमानं तु रुद्रभागविभाजितम् ।
द्विभागः स्तम्भ इत्युक्त उभयोः कोणिकाद्वयम् ॥
निर्गमः सार्धभागेन पादोनद्वयमेव च ।
रूपस्तंभद्वयं कार्यं गन्धर्वाद्द्यमेव च ॥” अप० सूत्र १३२
नवशाखा के विस्तार का ग्यारह भाग करके, उनमे से दोनों स्तंभ दो २ भाग रखना
चाहिये । उनके दोनो तरफ पाव २ भाग की कोणिकाये बनावे । स्तंभका निर्गम डेढा अथवा
पौने दुगुना रक्खें । इन नवशाखाओं मे दो स्तंभ और दो गांधर्व शाखा है । दोनो स्तंभ का
विस्तार दो २ भाग और ऽत्येक शाखा का विस्तार एक २ भाग रखना चाहिये ।
उत्तरंग के देव—
यस्य देवस्य या मूर्त्तिः सैव कार्योत्तरङ्गके ।
शाखायां च परिवारो गणेशश्चोत्तरङ्गके ॥६८॥
इति श्री सूत्रधारमंडनविरचिते वास्तुशास्त्रे प्रासादमण्डने भिट्ट-
पीठमण्डोवरगर्भगृहोदुम्बरद्वारप्रमाणनामस्तृतीयोऽध्यायः ।
प्रासाद के गर्भगृह मे जिस देव की मूर्त्ति प्रतिष्ठित हो, उस देव की मूर्त्ति द्वार के उत्तरंग
में रखनी चाहिये । तथा शाखाओं में उस देव के परिवार का रूप बनाना चाहिये । उत्तरंग मे
गणेश को भी स्थापित कर सकते है ॥६८॥
इति श्री पंडित भगवानदास जैन का अनुवादित प्रासादमंडन के
तीसरे अध्याय की सुबोधिनी नाम्नी भाषाटीका समाप्ता ॥३॥
अथ प्रासादमण्डने चतुर्थोऽध्यायः
द्वारमान से मूर्त्ति और पद्वासन का मान--
द्वारोच्छ्रायोऽष्टनवधा भागमेकं परित्यजेत् ।
शेषे त्र्यंशे द्विभागार्चा त्र्यंशोना द्वारतोऽथवा ॥१॥
द्वार के उदय का आठ अथवा नव भाग करे । उनमें से ऊपर का एक भाग छोड़ दें,
बाकी जो सात अथवा आठ भाग रहे, उनके तीन भाग करें। उनमें से दो भाग की मूर्त्ति और
एक भाग ऊंचाई में पद्वासन ( पीठिका ) बनावें अथवा दरवाजे का तीन भाग करके उसमें से
दो भाग की मूर्त्ति बनावें ॥१॥
द्वारदैर्घ्ये तु द्वात्रिंशे तिथिशक्रकलांशकैः ।
ऊर्ध्वार्चा आसनस्था तु मनुविश्वार्कभागतः ॥२॥
द्वार के उदय का बत्तीस भाग करे । उनमें से पंद्रह, चौदह अथवा सोलह भाग के मान
की खड़ी मूर्ति बनावें । बैठी मूर्ति चौदह, तेरह अथवा बारह भाग की बनावें ॥२॥
क्षीरार्णव अ० ११० में लीखा है कि-
“द्वारं चाष्टविभक्तं च त्रिधा भक्तं च सप्तभिः ।
पीठमानं भागमेकं शेषं च प्रतिमा मुने ! ॥
सप्तभागं भवेद् द्वारं षड्भागं च त्रिधाकृतम् ।
द्विभागं प्रतिमामानं शेषं पीठं हि चोच्यते ॥
द्वारं षड्भागिकं कुर्यात् त्रिधा पञ्च प्रकल्पयेत् ।
पीठञ्चैकेन भागेन द्विभागं प्रतिमा भवेत् ॥
एवमूर्ध्वप्रतिमा च अर्द्धं शयनासनं भवेत् ।
पीठमानं च नान्यत्र शेषस्थाने च निष्कलम् ॥
जलशय्याप्रमाणेन द्वारविस्तारसाधितम् ।
अन्यथा च यदा अर्चा विस्तरं नैव लङ्घयेत् ॥”
द्वार की ऊंचाई का आठ भाग करके ऊपर का एक भाग छोड़ दें, बाकी के सात भाग का
तीन भाग करें, उनमें से दो भाग की प्रतिमा और एक भाग की पीठ ( पद्वासन ) बनावें ।
चतुर्थोऽध्यायः ७३
अथवा द्वार की ऊंचाई का सात भाग करके ऊपर का एक भाग छोड़ दें, बाकी छह भाग के
तीन भाग करे, उनमे से दो भाग की प्रतिमा और एक भाग का पवासन बनावे । द्वार की ऊंचाई
का छह भाग करके ऊपर का एक भाग छोड़ दें, बाकी के पाच भाग का तीन भाग करें, उनमे
से दो भाग की प्रतिमा और एक भाग का पवासन बनावे । यह खड़ी प्रतिमा का मान है ।
शयनासन प्रतिमा के पीठ का मान द्वारोदय के अर्द्धमान का बनावे और बाकी प्रतिमा का
मान जानें । जलशय्या वाली प्रतिमा के मानानुसार द्वार का विस्तार रक्खे । अर्थात् जलशय्या-
वाली प्रतिमा द्वार के विस्तार से अधिक मान की नही बनानी चाहिये ।
गर्भगृह का मान--
चतुरस्त्रीकृते क्षेत्रे दशभागविभाजिते ।
*द्विद्विभागेन द्वौ भित्ती षड्भागं गर्भमन्दिरम् ॥३॥
प्रासाद की समचोरस भूमि के दस भाग करे । उनमे से दो दो भाग की दोनो तरफ की
दीवार और बाकी छह भाग का गर्भगृह बनावें ॥३॥
गर्भगृह के मान से मूत्तिका मान--
तृतीयांशेन गर्भस्य प्रासादे प्रतिमोत्तमा ।
मध्यमा स्वदशांशोना पञ्चांशोना कनीयसी ॥४॥
गर्भगृह के विस्तार के तीसरे भाग की प्रतिमा बनाना उत्तम है । प्रतिमा का दसवां
भाग प्रतिमा के मान मे से घटादें तो मध्यम मान की और पांचवां भाग घटावे तो कनिष्ठ मान
की प्रतिमा माना जाता है ॥४॥
देवों का दृष्टिस्थान--
आयभागैर्भजेद् द्वार-मष्टममूर्ध्वतस्त्यजेत् ।
सप्तमसप्तमे दृष्टि-नृपे सिंहे ध्वजे शुभा ॥५॥
देहली के ऊपर से लेकर उत्तरंग के नीचे भाग तक के द्वार के बीच मे आठ भाग करें ।
उनमें से ऊपर का आठवां भाग छोड़कर उसके नीचे का सातवां भाग का आठ भाग करें ।
(२) 'भित्तिद्विभागा कर्त्तव्या ।'
- कितने ही शिल्पी सातवां और आठवां भाग के मध्य मे आख की कीकी रहे, इस प्रकार प्रतिमा
की दृष्टि रखते हैं, इससे आय का मेल नही मिलता, जिसे उनकी मान्यता प्रमाणिक मालूम नही होती ।
प्रा० १०
७४ प्रसादमण्डने
उनमें से भी ऊपर का एक भाग छोड़कर के उसके नीचे का सातवां भाग गज आय है, उसमें
सब देवों की दृष्टि रखनी चाहिये । अर्थात् द्वार के मध्य उदय का चौंसठ भाग करके उनमें से
पचपनवें भाग में दृष्टि रखें । अथवा आठ भाग वाले सातवें भाग के वृष, सिंह और ध्वज आय मे
भी दृष्टि रखना शुभ माना है ॥५॥
विशेष देवों का दृष्टिस्थान--
षष्ठभागस्य पञ्चांशे लक्ष्मीनारायणादिदृक् ।
शयनाचैंशलिङ्गानि द्वारार्द्धं न व्यतिक्रमेत् ॥६॥
द्वार के आठ भागों में जो छठा भाग है, उसके आठ भाग करके पांचवें भाग में
लक्ष्मीनारायण की दृष्टि रखें । शयनासन वाले देव और शिवलिङ्ग की दृष्टि द्वार के अर्धभाग
में रखें, किन्तु द्वारार्थ का उल्लंघन करके दृष्टि नहीं रखें ॥६॥
देवों का पदस्थान--
पट्टाधो यक्षभूताद्याः पट्टाग्रे सर्वदेवताः ।
तदग्रे वैष्णवं ब्रह्मा मध्ये लिङ्गं शिवस्य च ॥७॥
इति प्रतिमाप्रमाणदृष्टिपदस्थानम् ।
गर्भगृह के स्तंभ के ऊपर जो पाट रखा जाता है, उसके नीचे यक्ष, भूत और नाग आदि
को स्थापित करे । तथा दूसरे सब देव पाट के आगे स्थापित करे । उसके आगे वैष्णव और
ब्रह्मा को और गर्भगृह के मध्य (ब्रह्मभाग) में शिवलिग को स्थापित करें ॥७॥
वत्थुसार पयरण ३ के मत से पदस्थान--
“गब्भगिहइड्ढपयंसा जक्खा पढमंसि देवया बीए ।
जिणकिणहरवी तहए बंभु चउत्थे शिवं पणगे ॥"
गर्भगृह के बराबर दो भाग करें, उनमे से दीवार के तरफ के भाग के पांच भाग करे,
इनमे दीवार वाले प्रथम भाग में यक्षको, दूसरे भाग मे देवियो को, तीसरे भाग में जिनदेव,
कृष्ण (विष्णु) और सूर्य को, चौथे भाग मे ब्रह्मा को और पांचवें भाग मे (गर्भगृह के मध्य
भाग में) शिवलिङ्ग को स्थापित करें ।
समरांगण सूत्रधार अ० ७० के मत से पदस्थान--
“भक्ते प्रासादगर्भार्द्धे दशधा पृष्ठभागतः ।
पिशाचरक्षोदनुजाः स्थाप्या गन्धर्वगुह्यकाः ॥
आदित्यचण्डिकाविष्णु-ब्रह्मेशानाः पद क्रमात् ॥”
चतुर्थोऽध्यायः ७५
गर्भगृह के बराबर दो भाग करके दीवार की तरफ के अर्धभाग के दस भाग करे, उनमे
से दीवार से प्रथम भाग मे पिशाच, दूसरे में राक्षस, तीसरे मे दैत्य, चौथे मे गंधर्व, पांचवे मे
यक्ष, छठे में सूर्य, सातवें मे चंडिका, आठवे में विष्णु, नवे मे ब्रह्मा और दसवे मे शिव को
स्थापित करे।
अग्निपुराण अ० ६७ के मत से पदस्थान—
“षड्भिर्विभाजिते गर्भे त्यक्त्वा भागं च पृष्ठतः ।
स्थापनं पञ्चमांशे च यदि वा वसुभाजिते ॥
स्थापनं सप्तमे भागे प्रतिमासु सुखावहम् ॥”
गर्भगृह का छह भाग करे, उनमे से दीवार के पासका एक भाग छोड़ दे, उसके आगे के
पांचवे भाग मे सब देवो को स्थापित करे। अथवा गर्भगृह के आठ भाग करके दीवार के पासका
एक भाग छोड़ दे, उसके आगे सातवें भाग में सब देवो को स्थापित करना सुखकारक है।*
प्रहार थर—
छाद्यस्योर्ध्वे प्रहारः स्याच्छृङ्गे शृङ्गे तथैव च ।
प्रासादशृङ्गशृङ्गेषु अधोभागे तु छाद्यकम् ॥८॥
छज्जा के ऊपर प्रहार का थर बनावें। प्रत्येक शृङ्ग के नीचे प्रहार का थर बनाना
चाहिये। उसके नीचे छाद्य ( छज्जा ) बनावे ॥८॥
छाद्यके थरमान—
छाद्यं भागद्वयं सार्धं सार्धभागं च पालवम् ।
मण्डलीकं भागमेकं भागेन तिलकस्तथा ॥६॥ △
छज्जा का उदय दो भाग अथवा डेढ़ ( ढाई ? ) भाग, पालव डेढ़ भाग, मुंडलिक एक
भाग और तिलक एक भाग रखना चाहिये ॥६॥
शृंगक्रम—
मूलकर्णे रथादौ च एक द्वित्रिक्रमान् न्यसेत् ।
निरन्धारे मूलभित्तौ सान्धारे भ्रमभित्तिषु ॥१०॥
*विशेष माहिती के लिये स्वय द्वारा अनुवादित 'देवतामूर्ति प्रकरण' ओर 'रूपमण्डन' देखना चाहिये।
△ यह श्लोक बहुतसी प्रतो मे नही है।
७६ प्रासादमण्डने
मूलकर्ण (कोना), रथ, उपरथ आदि प्रासाद के अंग है, उनके ऊपर एक, दो अथवा
तीन शृङ्ग अनुक्रम से चढावें। निरंधार (प्रकाश वाला) प्रासाद की मुख्य दीवार पर और
सांधार (परिक्रमा वाला) प्रासाद हो तो परिक्रमा की दीवार पर शृङ्गों का क्रम रखें ॥१०॥
उरःशृंग का क्रम-
उरुशृङ्गाणि भद्रेस्यु-रेकादिग्रहसंख्यया ।
त्रयोदशोर्ध्वे सप्ताधो लुप्तानि चोर्ध्वशृङ्गकैः ॥११॥
प्रासाद के भद्र के ऊपर
एक से नव तक उरःशृङ्ग
चढ़ाये जाते है। शिखर के
उदय का तेरह भाग करके
उनमें से सात भाग के मान
का उरःशृङ्ग बनावें। दूसरा
उरःशृङ्ग प्रथम के उरःशृङ्ग
का तेरह भाग करके उनमें
से सात भाग का बनावें।
इस प्रकार ऊपर के उरः
शृङ्ग का तेरह भाग करके
सात भाग के उदय में नीचे
का उरःशृङ्ग रखें ॥११॥
उरुशृंग की रचना शिखर का निर्माण
शिखर निर्माण-
रेखामूले च दिग्भागं कुर्यादग्रे षडंशकम् ।
षड्बाह्ये दोषंदं प्रोक्तं पञ्चमध्ये न शोभनम् ॥१२॥
शिखर के नीचे के दोनों कोने के विस्तार का दस भाग करें। उनमें से शिखर के ऊपर
के स्कंध का विस्तार छह भाग रखें। इस स्कंध का विस्तार छह भाग से अधिक रखें तो
चतुर्थोऽध्यायः ७७
शिखर दोष कारक होता है और पांच भाग से कम रखे तो शिखर शोभायमान नही
होता ॥१२॥
ज्ञानरत्नकोष में लीखा है कि--
"चतुरस्रीकृते क्षेत्रे दशधा प्रतिभाजिते ।
द्वौ द्वौ भागौ तु कर्त्तव्यौ कोणे कोणे न संशयः ॥
भद्रं भागत्रयं कार्यं सार्धभागं तु चानुगम् ।
व्यासमानं सपादं च उच्छ्रयेण तु कारयेत् ॥
स्कन्धं षड्भागिकं कार्यं तस्योर्ध्वं नवधा भवेत् ।
चतुर्भागायतं कोणं त्रिभिर्भागैस्तु चानुगम् ॥
भद्रपूर्णं तु द्विभिर्भागै-स्ततस्तु साधयेत् कलाम् ॥"
प्रासाद के समचोरस क्षेत्र का दस भाग करे । उनमे से दो दो भाग के दो कोण, तीन
भाग का भद्र और डेढ़ २ भाग के दो प्रतिकर्ण बनावे । शिखर विस्तार से ऊंचाई में सवाया
रक्खें और उसका स्कंध छह भाग विस्तार में रक्खें । इसका नव भाग करके चार भाग के
दोनों कोण, तीन भाग के दोनों
प्रतिकर्ण और पूरा भद्र दो भाग
का रक्खे । पीछे रेखा बनावें ।
कलारेखा की साधना--
"आदिकोणं द्विधा कृत्य
प्रथमं वेदभाजितम् ॥
द्वितीयं तु त्रिभिर्भागै-रेवं
सप्तकला भवेत् ।
उदयं द्व्यष्टभिर्भागैः कृत्वा
रेखां समालिखेत् ॥
ऊर्ध्वतिर्यग् भागानां भागे
भागे तु लाञ्छयेत् ।
एवं तु सिध्यते रेखा भद्रे
कोणे तथानुगे ॥"
एक तरफ के कोण का दो
भाग करें। उनमें से प्रथम भाग
का चार और दूसरे भाग का
२५६ रेखा का नकशा
७८ प्रासादमण्डने
तीन भाग करने से सात कला रेखा होती हैं । इसी तरह दूसरी तरफ के कोण की भी
सात कला रेखा होती है। ऐसी कुल चौदह कला रेखाओं में दोनों प्रतिकर्ण की दो कला रेखा
मिलाने से सोलह कला रेखा होती है । इनके उदय में सोलह २ भाग करने से दोसौ छप्पन
कला रेखायें होती है ।
उदयभेदोद्भू रेखा—
सपादं शिखरं कार्यं सकर्णं शिखरोदयम् ।
सपादकर्णयोर्मध्ये रेखाः स्युः पञ्चविंशतिः ॥१३॥
मूलरेखा के विस्तार से शिखर का उदय सवाया करें । सवाया शिखर में दोनों कोने के
मध्य मे पचीस रेखाये है ॥१३॥
सपादकर्णयोर्मध्ये¹ उदये पञ्चविंशतिः ।
प्रोक्ता रेखाः कलाभेदै-र्वलणे पञ्चविंशतिः ॥१४॥
सवाया उदय वाले शिखर के दोनों कोने के मध्य में पचीस रेखा उदय में होती हैं ।
कला के भेद से ये शिखर के नमन में पचीस रेखायें है ॥१४॥
कलाभेदोद्भूव रेखा—
पञ्चादिनन्दयुग्मान्तं खण्डानि तेष्वनुक्रमात् ।
अंशवृद्ध्या कलाः कार्या दैर्घ्ये स्कन्धे च तत्समाः ॥१५॥
शिखर के उदय का पांच से लेकर उनतीस खंड करें । उन खंडों में अनुक्रम से एक २
कला उदय मे बढ़ावें । जैसे-प्रथम पांच खंडों में एक से पांच कला, छठे मे छह और सातवें मे
सात, इस प्रकार उनतीसवे खंड में उनतीस कला है । उदय मे जितनी कला होवे, उतनी कला
संख्या स्कंध मे भी बनाना चाहिये ॥१५॥
अष्टादावष्टषष्ट्यन्तं चतुर्वृद्ध्या च षोडश ।
दैर्घ्यतुल्याः कलाः स्कन्धे एकहीनांशोऽशोभनम् ॥१६॥
प्रथम समचार की त्रिकखंडों मे आठ २ कला रेखा है । पीछे आगे के प्रत्येक खंड में
चार २ कला बढ़ाने से अठारहवें खंड में अड़सठ कला रेखा होती हैं । उदय मे जितनी कला रेखा
हो, उतनी स्कंध मे भी बनावे । एक भी कम रक्खे तो शोभायमान नही लगता ॥१६॥
(१) पुनरुक्त मालूम होता है ।
चतुर्थोऽध्यायः ७६
रेखाचक्र—
ऊर्ध्वा अष्टादशांशाः स्यु-स्तिर्यक्पोडश एव च ।
चक्रेऽस्मिंश्च भवन्त्येव रेखाणां षट्शरद्वयम् ॥१७॥
शिखर के उदय मे अठारह और तिरछी सोलह रेखा होती है, ऐसा चक्र बनाने से
दौसो छप्पन रेखायें होती हैं, ऊपर 'कला रेखा की साधना' पढ़ें ॥१७॥
प्रथम समचार की त्रिखंडा कलारेखा—
त्रिखण्डात् खण्डवृद्धिस्च यावदष्टादशैव हि ।
एकैकांशे कलाष्टौ च समचारस्तु पोडश ॥१८॥
त्रिखंड से लेकर एक २ खंड वढाते हुए अठारह खंड तक बढावे । प्रथम प्रत्येक त्रिखंड मे
समचार की आठ २ कला रेखाये है । ऐसे सोलह चार है ॥१८॥
दूसरा सपादचार की त्रिखंडा कलारेखा—
द्वितीयप्रथमे खण्डे कलाष्टौ द्वितीये नव ।
तृतीये दशखण्डेषु शेषेषूर्ध्वेष्वयं क्रमः ॥१९॥
दूसरा सपादचार हो तो प्रथम खंड में आठ, दूसरे खंड मे नव और तीसरे खंड मे दस
कला रेखा बनावे । इस प्रकार बाकी के चारो मे भी इसी क्रम रेखा बनावे ॥१९॥
तीसरा सार्द्धचार की त्रिखंडा कलारेखा—
अष्टदिक्सूर्यभागैश्च त्रिखण्डा तृतीया भवेत् ।
अनेन क्रमयोगेन कोष्ठानङ्कैः प्रपूरयेत् ॥२०॥
तीसरा सार्धचार हो तो प्रथम खंड मे आठ, दूसरे खंड में दस और तीसरे खंड मे बारह
कलारेखा बनावे । इस क्रम से दूसरे चारो के कोठे को अंको से पूर्ण करे ॥२०॥
सोलह प्रकार के चार—
'समः सपादः सार्द्धंश्च पादोनो द्विगुणस्तथा ।
द्विगुणश्च सपादो द्वौ सार्ध. पादोनकस्त्रयः ॥
- श्लोक १८ से २० तक का खुलासा वार आशय समझने के लिये देखो चार के भेदो से त्रिखडा
की रेखा और कला जानने का यत्र ।