प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)
Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary
मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थोऽध्यायः ७६
रेखाचक्र—
ऊर्ध्वा अष्टादशांशाः स्यु-स्तिर्यक्पोडश एव च ।
चक्रेऽस्मिंश्च भवन्त्येव रेखाणां षट्शरद्वयम् ॥१७॥
शिखर के उदय मे अठारह और तिरछी सोलह रेखा होती है, ऐसा चक्र बनाने से
दौसो छप्पन रेखायें होती हैं, ऊपर 'कला रेखा की साधना' पढ़ें ॥१७॥
प्रथम समचार की त्रिखंडा कलारेखा—
त्रिखण्डात् खण्डवृद्धिस्च यावदष्टादशैव हि ।
एकैकांशे कलाष्टौ च समचारस्तु पोडश ॥१८॥
त्रिखंड से लेकर एक २ खंड वढाते हुए अठारह खंड तक बढावे । प्रथम प्रत्येक त्रिखंड मे
समचार की आठ २ कला रेखाये है । ऐसे सोलह चार है ॥१८॥
दूसरा सपादचार की त्रिखंडा कलारेखा—
द्वितीयप्रथमे खण्डे कलाष्टौ द्वितीये नव ।
तृतीये दशखण्डेषु शेषेषूर्ध्वेष्वयं क्रमः ॥१९॥
दूसरा सपादचार हो तो प्रथम खंड में आठ, दूसरे खंड मे नव और तीसरे खंड मे दस
कला रेखा बनावे । इस प्रकार बाकी के चारो मे भी इसी क्रम रेखा बनावे ॥१९॥
तीसरा सार्द्धचार की त्रिखंडा कलारेखा—
अष्टदिक्सूर्यभागैश्च त्रिखण्डा तृतीया भवेत् ।
अनेन क्रमयोगेन कोष्ठानङ्कैः प्रपूरयेत् ॥२०॥
तीसरा सार्धचार हो तो प्रथम खंड मे आठ, दूसरे खंड में दस और तीसरे खंड मे बारह
कलारेखा बनावे । इस क्रम से दूसरे चारो के कोठे को अंको से पूर्ण करे ॥२०॥
सोलह प्रकार के चार—
'समः सपादः सार्द्धंश्च पादोनो द्विगुणस्तथा ।
द्विगुणश्च सपादो द्वौ सार्ध. पादोनकस्त्रयः ॥
- श्लोक १८ से २० तक का खुलासा वार आशय समझने के लिये देखो चार के भेदो से त्रिखडा
की रेखा और कला जानने का यत्र ।