प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)
Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary
मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयोऽध्यायः ६७
दोनों द्वार ज्येष्ठ हैं। गांधारी और सुभगा ये दोनों द्वार मध्यम हे और सुप्रभा द्वार कनिष्ठ है।
आठ शाखावाला द्वार मुकुली, छह शाखावाला मालिनी, चार शाखावाला गांधारी, तीन
शाखावाला सुभगा, दो शाखावाला सुप्रभा और एक शाखावाला स्मरकीर्त्ति नाम का द्वार है।
न्यूनाधिक शाखामान—
अङ्गुलं सार्धमर्द्धं१ वा कुर्याद्धीनं तथाधिकम् ।
आयदोषविशुद्ध्यर्थं १ ह्रस्ववृद्धी न दूषिते ॥५७॥
द्वार शाखा के मान से शुभ आय न आती हो तो एक, डेढ़ अथवा आधा अंगुल न्यूनाधिक
करके श्रेष्ठ आय लानी चाहिये । आय दोष की शुद्धि के लिये शास्त्रीय मान मे इतना न्यूनाधिक
परिवर्तन किया जाय तो दोष नही है ॥५७॥
त्रिशाखा—
चतुर्भागङ्कितं कुर्याच्छाखाविस्तारमानकम् ।
मध्ये द्विभागिकं कुर्यात् स्तम्भं पुरुषसंज्ञकम् ॥५८॥
स्त्रीसञ्ज्ञका भवेच्छाखा पार्श्वतो भागभागिका ।
निर्गमे चैकभागेन रूपस्तम्भः प्रशस्यते ॥५६॥
शाखा के विस्तार का चार भाग करे । उनमे से दो भाग का रूप स्तंभ बनावैं। यह
स्तंभ पुरुष संज्ञक है। इसके दोनो तरफ एक २ भाग की शाखा रक्खे। यह शाखा स्त्री संज्ञक
है। रूप स्तंभ का निर्गम एक भाग का रखना श्रेष्ठ है ॥५६॥
शाखा स्तंभ का निर्गम—
एकांशं सार्धभागं च पादोनद्वयमेव च ।
द्विभागं निर्गमे कुर्यात् स्तम्भं द्रव्यानुसारतः ॥६०॥
द्रव्य की अनुकूलता के अनुसार शाखा के स्तंभ का निर्गम एक, डेढ़, पोना दो अथवा
दो भाग तक रख सकते है ॥६०॥
शाखोदर का विस्तार और प्रवेश—
पेटके विस्तरं कार्यं प्रवेशस्तु युगांशकः ।
कोशिका स्तम्भमध्ये तु भूषणार्थं हि पार्श्वयोः ॥६१॥
(१) 'ह्रासो वृद्धिर्न दुष्यति ।'