प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)
Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary
मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थोऽध्यायः ७७
शिखर दोष कारक होता है और पांच भाग से कम रखे तो शिखर शोभायमान नही
होता ॥१२॥
ज्ञानरत्नकोष में लीखा है कि--
"चतुरस्रीकृते क्षेत्रे दशधा प्रतिभाजिते ।
द्वौ द्वौ भागौ तु कर्त्तव्यौ कोणे कोणे न संशयः ॥
भद्रं भागत्रयं कार्यं सार्धभागं तु चानुगम् ।
व्यासमानं सपादं च उच्छ्रयेण तु कारयेत् ॥
स्कन्धं षड्भागिकं कार्यं तस्योर्ध्वं नवधा भवेत् ।
चतुर्भागायतं कोणं त्रिभिर्भागैस्तु चानुगम् ॥
भद्रपूर्णं तु द्विभिर्भागै-स्ततस्तु साधयेत् कलाम् ॥"
प्रासाद के समचोरस क्षेत्र का दस भाग करे । उनमे से दो दो भाग के दो कोण, तीन
भाग का भद्र और डेढ़ २ भाग के दो प्रतिकर्ण बनावे । शिखर विस्तार से ऊंचाई में सवाया
रक्खें और उसका स्कंध छह भाग विस्तार में रक्खें । इसका नव भाग करके चार भाग के
दोनों कोण, तीन भाग के दोनों
प्रतिकर्ण और पूरा भद्र दो भाग
का रक्खे । पीछे रेखा बनावें ।
कलारेखा की साधना--
"आदिकोणं द्विधा कृत्य
प्रथमं वेदभाजितम् ॥
द्वितीयं तु त्रिभिर्भागै-रेवं
सप्तकला भवेत् ।
उदयं द्व्यष्टभिर्भागैः कृत्वा
रेखां समालिखेत् ॥
ऊर्ध्वतिर्यग् भागानां भागे
भागे तु लाञ्छयेत् ।
एवं तु सिध्यते रेखा भद्रे
कोणे तथानुगे ॥"
एक तरफ के कोण का दो
भाग करें। उनमें से प्रथम भाग
का चार और दूसरे भाग का
२५६ रेखा का नकशा