सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

११६ प्रासादमण्डने
मेरुप्रासाद राजालोग बनावें। धनिक लोग मेरुप्रासाद से न्यून प्रासाद बनावे, अर्थात्
मेरुप्रासाद नही बनावे । यदि बनावें तो राजा के साथ बनावें । राजा के बिना अकेले धनिक
द्वारा बनाया हुआ मेरुप्रासाद बड़ा भयकारक माना है ॥४६॥
इति श्री पंडित भगवानदास जैन द्वारा अनुवादित प्रासादमण्डन का केसर्यादि-
प्रासाद लक्षणनाम का छट्ठा अध्याय की सुबोधिनी नामकी
भाषाटीका समाप्त ॥६॥

अथ प्रासादमण्डने सप्तमोऽध्यायः
मंडप विधान—
रत्नगर्भाङ्कनं सूर्यचन्द्रतारावितानकम् ।
विचित्रं मण्डपं येन कृतं तस्मै नमः सदा ॥१॥
लगे हुए रत्नवाले तथा सूर्य चंद्रमा और तारे जैसा तेजस्वी वितान (गुम्बद का पेटा
भाग चांदनी) वाले, ऐसे अनेक प्रकार के मण्डपो की जिसने रचना की है, उनको हमेशा
नमस्कार है ॥१॥
गर्भाग्रमंडप—
कर्णगूढा विलोक्याश्च एकत्रिकद्वारसंयुताः ।
प्रासादाग्रे प्रकर्त्तव्याः सर्वदेवेषु मण्डपाः ॥२॥
गूढ़ कोना वाला अर्थात् दीवार वाला अथवा बिना दीवार वाला खुला, तथा एक
अथवा तीन द्वारवाला, ऐसा मंडप सब देवो के प्रासाद के आगे किया जाता है ॥२॥
जिनप्रासाद के मंडप—
गूढस्त्रिकस्तथा नृत्यः क्रमेण मण्डपास्त्रयः ।
जिनस्याग्रे प्रकर्त्तव्याः सर्वेषां तु बलाणकम् ॥३॥
जिनदेव के गर्भगृह के आगे गूढ मण्डप, इसके आगे चौकी वाले त्रिकमडप और इसके
आगे नृत्यमंडप, इस प्रकार अनुक्रम से तीन मंडप बनावे । बाकी सब देवो के गर्भगृह के आगे
बलाणक बनावे ॥३॥
मंडपके पांच मान—
समं सपादं प्रासादात् सार्धं च पादोनद्वयम् ।
द्विगुणं वा प्रकर्त्तव्यं मण्डपं पञ्चधा मतम् ॥४॥
मंडप का नाप प्रासाद के बराबर, सवाया, डेढा, पौने दुगना अथवा दुगना किया जाता
है । ये मंडप के पांच प्रकार के नाप हैं ॥४॥
अपराजितपृच्छा सूत्र १८५ मे सवा दो गुणा और ढाई गुणा ये दो प्रकार का अधिक
नाप मिलाकर सात प्रकार के मंडप के नाप लिखे हैं ।

११८
प्रासादमण्डने
गर्भगृह
कौली
(अन्तराल)
गूढ मण्डप
चतुष्किका
चतुष्किका
त्रिक मण्डप
त्रिमण्डप
नव चतुष्किका
त्रिक मण्डप
चतुष्किका
नृत्य मण्डप.
रंगमण्डप
चतुष्किका
शृंगार चौकी
प्रासाद और मडपों का तलदर्शन

११६
। से दश
हाथ के
को सिर्फ
र जानना
। चाहिये ।
। अधिक
। न्यूना न
। न न्यून
प मे स्तंभ,
रहा है कि-
है। परन्तु
नही माना
सम चतुरस्र प्रासाद
(प्रासाद मण्डन अ. ७)

The provided image is completely blank and contains no text, diagrams, or content to transcribe.

सप्तमोऽध्यायः ११६
प्रासादमान से मंडप का माप—
समं सपादं पञ्चाशतपर्यन्तं दशहस्तकात् (तः) ।
दशान्तं पञ्चतः सार्धं द्विपा दोनं चतुष्करे ॥५॥
त्रिहस्ते द्विगुणं द्वयेक-हस्ते कुर्याच्चतुष्किकाम् ।
प्रायेण मण्डपं सार्धं द्विगुणं प्रत्यलिन्दकैः ॥६॥
दश हाथ से पचास हाथ तक के प्रासाद को समान अथवा सवाया, पांच हाथ से दश
हाथ तक के प्रासाद को डेढा, चार हाथ के प्रासाद को पौने दो गुना और तीन हाथ के
विस्तार वाले प्रासाद को दुगुना मंडप बनाना चाहिये। दो और एक हाथ के प्रासाद को सिर्फ
चौकी बनावे। प्रायः करके मण्डप का प्रमाण डेढ़ा या दुगना अलिन्द के अनुसार जानना
चाहिये ॥५-६॥
गूमट के घंटा कलश और शुकनास का मान—
मण्डपे स्तम्भपट्टादि-र्मध्यपट्टानुसारतः ।
शुकनाससमा घण्टा न्यूना श्रेष्ठा न चाधिका ॥७॥
मण्डप मे स्तंभ और पाट आदि सब गर्भगृह के पट्ट आदि के अनुसार रखना चाहिये ।
मण्डप के गूमट के घंटा कलश की ऊंचाई शुकनास के बराबर रखना चाहिये । कम या अधिक
नहीं रखनी चाहिये ॥७॥
अपराजितपृच्छा सूत्र १८५ श्लोक १० मे लिखा है कि—'शुकनाससमा घण्टा न न्यूना न
ततोऽधिका ।' अर्थात् गूमट के आमलसार कलश की ऊंचाई शुकनास के बराबर रक्खे । न न्यून
न अधिक रक्खे ।
मंडप के समविषम तल—
मुखमण्डपसङ्घाटो यदा भित्त्यन्तरे भवेत् ।
न दोषः स्तम्भपट्टाद्यैः समं च विषमं तलम् ॥८॥
गर्भगृह और मुखमंडप के बीच मे यदि भित्त (दीवार) का अंतर हो तो मंडप मे स्तंभ,
पट्ट और तल ये समविषम किया जाय, तो दोष नहीं है । अर्थात् ऊपर के श्लोक मे कहा है कि-
गर्भगृह के पट्ट स्तंभ के अनुसार बराबर मे मंडप के पट्ट स्तंभ आदि रखा जाता है । परन्तु
इन दोनो के बीच मे दीवार का अंतर हो तो सम विषम रखा जाय तो दोष नही माना
जाता ॥८॥

१२० प्रासादमण्डने

*मुखमंडप—
नवाष्टदशभागेषु त्रिभिश्चन्द्रावलोकनम् ।
हस्तैकं त्र्यङ्गुलोनं वा तदूर्ध्वं मत्तवारणम् ॥६॥
गर्भगृह के आगे मुखमंडप है, उसके उदयका साढे तेरह, साढे चौदह अथवा साढे पंद्रह
भाग करें। उनमें से आठ, नव अथवा दस भाग का चंद्रावलोकन (खुला भाग) रखें। तथा
आसनपट्ट के ऊपर एक हाथ का अथवा इक्कीस अंगुल का मत्तवारण (कठहरा) बनावे ॥६॥
सार्धपञ्चांशकैर्भक्तैः सपादं राजसेनकम् ।
सपादत्र्यंशका वेदी भागेनासनपट्टकम् ॥१०॥
खुले भाग के नीचे से मंडप के तल तक साढे पांच
भाग करे। उनमें से सवा भाग का राजसेन, सवातीन भाग
की वेदी और एक भाग का आसनपट्ट बनावे ॥१०॥
तदूर्ध्वं सार्धसप्तांशा यावत्पट्टस्य पेटकम् ।
सार्धपञ्चांशकः स्तम्भः पादोनं भरणां भवेत् ॥११॥
भागार्धं भरणां वापि सपादं सार्धतः शिरः ।
आसनपट्ट के ऊपर से पाट के तलभाग तक साढे सात
भाग करे। उनमें से साढे पांच भाग का स्तम्भ रक्खें।
उसके ऊपर पौन अथवा आधे भाग की भरणी और इसके
ऊपर सवा या डेढ़ भाग की शिरावटी रखें ॥११॥
पट्टो द्विभागस्तस्योर्ध्वं कर्त्तव्यश्छाद्यकोदयः ॥१२॥
त्रिभागं: ललितं छाद्यं यावत्¹ पट्टस्य पेटकम् ।
अर्धांशोर्ध्वा कपोतालि-द्विभागः पट्टविस्तरः ॥१३॥
शिरावटी के ऊपर दो भागका पाट रक्खे। उसके
ऊपर तीन भाग निकलता और पाट के पेटा भाग तक नमा
हुआ सुन्दर छज्जा बनावे। उसके ऊपर आधे भाग की
केवल बनावें, पाट का विस्तार दो भाग रक्खे ॥१२-१३॥
मुखमंडप

  • विशेष जानकारी के लिए देखो अपराजितपृच्छा सूत्र १८४ श्लोक ५ से १३ तक
    १. तत्पेटं पट्टपेटकम् ।

लूणवसही जैन मंदिर आबू के मडप का दृश्य
अनुपम कोतरणी वाला स्तभ

आबू जैन मंदिर के मडप के स्तभ और इलिका तोरण

सप्तमोऽध्यायः १२१
स्तंभ का विस्तारमान और भेद—
प्रासादाद् दशरुद्रार्क-भागेन स्तम्भविस्तरः ।
वेदाष्टरविविंशत्यः कर्णा वृत्तस्तु पञ्चधा ॥१४॥
प्रासाद के दसवा, ग्यारहवा अथवा बारहवा भागके बराबर स्तंभ का विस्तार (मोटाई)
रक्खे । तथा चार, आठ, बारह और बीस कोना वाला और गोल, ऐसे पाच प्रकार के
स्तंभ हैं ॥१४॥
अपराजितपृच्छा सूत्र १८४ श्लोक ३५ मे तेरहवा और चौदहवा भाग के बराबर भी
स्तंभ का विस्तार रखना लिखा है ।
आकृति से स्तंभसंज्ञा—
"चतुरस्रश्च रुचका भद्रका भद्रसंयुताः ।
वर्द्धमानाः प्रतिरथैस्तथाष्टाश्रैश्चाष्टास्रकाः ॥
ग्रासनोर्ध्वं भवेद् भद्र-मष्टकर्णोस्तु स्वस्तिकाः ।
प्रकर्त्तव्या पञ्चविधा स्तम्भाः प्रासादरूपिणः ।।” अप० सू० १८४
चार कोना वाला चतुरस्र, भद्रवाला भद्रक, प्रतिरथवाला वर्द्धमान, आठ कोना वाला
अष्टास्र और ग्रासन के ऊपर से भद्र और आठ कोना वाला स्वस्तिक नाम का स्तंभ कहा जाता
है । ये पांच प्रकार के स्तंभ प्रासाद के अनुसार बनाना चाहिये ।
क्षीरार्णवग्रंथ के अनुसार स्तंभ का विस्तार मान—
“एकहस्ते तु प्रासादे स्तम्भः स्याच्चतुरङ्गुलः ।
द्वौ हस्ते चाङ्गुलं सप्त त्रिहस्ते च नवाङ्गुलः ॥
तस्योर्ध्वं दशहस्तानां हस्ते हस्ते च द्वयङ्गुला ।
सपादाङ्गुला वृद्धिः स्यात् त्रिंशद्धस्ते यदा भवेत् ॥
अङ्गुलैका ततो वृद्धि-श्चत्वारिंशच्च हस्तके ।
तस्योर्ध्वं च शतार्द्धं च पादोनमङ्गुलं भवेत् ॥”
एक हाथ के विस्तार वाले प्रासाद का स्तंभ चार अंगुल, दो हाथ के प्रासाद का स्तंभ
सात अंगुल, तीन हाथ के प्रासाद का स्तंभ नव अंगुल, चार से दश हाथ के प्रासाद का स्तंभ
प्रत्येक हाथ दो दो अंगुल, ग्यारह से तीस हाथ के प्रासाद का स्तंभ प्रत्येक हाथ सवा सवा अंगुल,
इकतीस से चालीस हाथ के प्रासाद का स्तंभ प्रत्येक हाथ एक एक अगुल और इकतालीस से
प्रा० १६

१२२ प्रासादमण्डने
पच्चास हाथ के विस्तार वाले प्रासाद का स्तंभ पौन पौन अंगुल बढाकर स्तंभ का विस्तार
करना चाहिये ।
स्तंभका अन्य विस्तार मान—
“एक हस्ते तु प्रासादे स्तम्भः स्याच्चतुरङ्गुलः ।
सप्ताङ्गुलश्च द्विहस्ते त्रिहस्ते तु नवाङ्गुलः ॥
द्वादशाङ्गुलविस्तारः प्रासादे चतुर्हस्तके ।
चतुर्हस्तादितः कृत्वा यावद् द्वादशहस्तकम् ॥
सार्धाङ्गुला भवेद् वृद्धिः प्रतिहस्ते विवर्द्धयेत् ।
द्वादशहस्तस्योर्ध्वं तु यावत् त्रिशद्धस्तकम् ॥
अङ्गुलैका ततो वृद्धिर्हस्ते हस्ते प्रदापयेत् ।
अत ऊर्ध्वं ततः कुर्याद् यावत्पञ्चाशद्धस्तकम् ॥
अर्धाङ्गुला भवेद् वृद्धिः कर्त्तव्या शिल्पिभिः सदा ।
उच्छ्रयं चतुर्गुणं प्रोक्तमेतत्स्तम्भस्य लक्षणम् ॥”
इति ज्ञानप्रकाशदीपार्णवे ।
एक हाथ के प्रासाद मे स्तंभ का विस्तार चार अंगुल, दो हाथ के प्रासाद में सात
अंगुल, तीन हाथ के प्रासाद में नव अंगुल और चार हाथ के प्रासाद में बारह अंगुल रक्खे ।
पीछे पांच हाथ से बारह हाथ तक के प्रासाद मे प्रत्येक हाथ डेढ़ डेढ़ अंगुल, तेरह हाथ
से तीस हाथ तक के प्रासाद मे प्रत्येक हाथ एक एक अंगुल और इकतीस से पचास हाथ तक के
प्रासाद मे प्रत्येक हाथ आधा आधा अंगुल बढा करके स्तंभ का विस्तार रक्खे और विस्तार से
चार गुणी स्तंभ की ऊंचाई रक्खे ।
प्राग्ग्रीव मंडप—
द्वाराग्रे स्तम्भवेद्याद्या प्राग्ग्रीवो मण्डपो भवेत् ।
द्विद्विस्तम्भविवृद्धया च षोडशैव प्रकीर्त्तिताः ॥१५॥
प्रासाद के द्वारके आगे दो स्तंभवाली प्रथम वेदी है, वह प्राग्ग्रीव मंडप है । उनमें दो २
स्तंभ बढ़ाने से सोलह प्रकार का प्राग्ग्रीव मंडप होता है ॥१५॥
विशेष जानने के लिये देखो अपराजितपृच्छा सूत्र १८८ श्लोक १ से ११
आठ जाति के गूढ मंडप—
भित्तिः प्रसादवद् गूढे मण्डपेऽष्टविधेषु च ।
चतुरस्रः सुभद्रश्च तथा प्रतिरथान्वितः ॥१६॥

सर्वाङ्ग पूर्ण सांगोपांग वाला प्राचीन देवालय
आमेर - जयपुर (राजस्थान)

जगतशरणजी का प्राचीन मेरु मडोवर वाला देवालय
श्रामेर-जयपुर (राजस्थान)

सप्तमोऽध्यायः
१२३
तीनों आद्यस्तंभ मोढेरा
सोमपुरा
२ पालिताना
(काठियावाड)
स्तम्भो के नमूने

१२४ प्रासादमण्डने
मुखभद्रयुतो वापि द्वित्रिप्रतिरथैर्युतः ।
कर्णोदकान्तरेणाथ भद्रोदकविभूषितः ॥१७॥
आठ प्रकार के गूढ मंडपों की भी दीवार प्रासाद के दीवार जैसी बनावें अर्थात् प्रासाद
की दीवार जितने थरवाली हों उतने थरवाली और रूपों की आकृति वाली हो तो रूपों की
आकृति वाली गूढ मंडप की दीवार बनानी चाहिये । वे समचोरस, सुभद्र और प्रतिरथ वाला,
मुखभद्र और दो या तीन प्रतिरथ वाला, कर्ण जलान्तर वाला अथवा भद्र जलान्तर वाला,
ऐसे आठ प्रकार के गूढ मंडप है ॥१६-१७॥

सप्तमोऽध्यायः - १२५
गूढमण्डप की फालना—
कर्णतो द्विगुण भद्रं पादोनप्रतिकर्णकः ।
भद्रार्धं मुखभद्रं च शेषं षड्द्वसु भाजितम् ॥१८॥
कोने से दुगुणा भद्र और पौन भाग का प्रतिरथ रखे, भद्र से आधा मुखभद्र रखे ।
बाकी नंदी आदि छठ्ठ अथवा आठवे भाग की रखे ॥१८॥
दलेनाधेन पादेन दलस्य निर्गमो भवेत् ।
मूलप्रासादवद् बाह्ये पीठजङ्घादिमेखला ॥१६॥
फालनाओ का निर्गम अपना चौथा अथवा आधा भाग का रखे तथा पीठ जंघा आदि
की मेखलाएं मुख्य प्रासाद के जैसी बाहर निकलती हुई बनावे ॥१६॥
गवाक्षेणान्वितं भद्र-मथ जालकसंयुतम् ।
गूढोऽथ कर्णगूढो वा भद्रे चन्द्रावलोकनम् ॥२०॥
गूढ मंडप के भद्र मे जाली अथवा गवाक्ष बनावे । कोने गुप्त (अंधकार मय) रखें
अर्थात् दीवार बनावे अथवा भद्र मे चन्द्रावलोकन (खुला भाग) रखें ॥२०॥
त्रिद्वारे चैकवक्त्रेऽथ मुखे कार्या चतुष्किका ।
गूढे प्राकाशके वृत्त-मर्धोदयं करोटकम् ॥२१॥
इत्यष्टगूढमण्डपाः ।
गूढ मंडप मे तीन अथवा एक द्वार बनावे और द्वारके आगे चौकी मंडप बनावे । मंडप
की गोलाई के विस्तार मान से आधे मान का करोटक (गूमट) का उदय रखे ॥२१॥
विशेष जानने के लिये देखे अप० सू० १८७ वर्द्धमानादि अष्टमंडप ।
गूमट' के उदयका तीन प्रकार—
“अर्धोदयश्च यत्प्रोक्तो वामन उदयो भवेत् ।
कृते चैव भवेच्छान्तिः सर्वयज्ञफल लभेत् ॥
अर्धोदयश्च नवधा द्वौ भागौ परिवर्जयेत् ।
अनन्त उदयो नाम सर्वलोकसुखावह ॥
अर्धोदयश्च नवधा त्रयभागान् परित्यजेत् ।
वाराह उदयो नाम अनन्तफलदायकः ॥” ज्ञानरत्नकोशे ।

१२६ . प्रासादमण्डन.
गूमट का उदय विस्तार से आधे मानका रक्खें, यह वामन नाम का उदय कहा जाता है
यह सब यज्ञों के फल को देने वाला है और शान्तिदायक है। उदय का नव भाग कर, उन में से
दो भाग कम करके सात भाग का उदय रक्खें, उसको अनन्त नाम का उदय कहते हैं, यह सब
लोगों के लिये सुख कारक है। नव भाग मे से तीन भाग कम करके छह भाग का उदय रक्खें
उसको वाराह नाम का उदय कहते हैं। यह अनन्त फल को देने वाला है।
गूमट का न्यूनाधिक उदय फल--
"उदयाश्च समाख्याता अनन्त फलदायकाः ।
तत्र देशे भवेच्छान्ति-रारोग्यं च प्रजायते ॥
उदये हीनाश्च ये केचित् क्रियन्ते मण्डपा भुवि ।
तत्र मारी महाव्याधी राष्ट्रभङ्गभयं भवेत् ॥
दुर्भिक्षं चातिरीद्रं च राजा च म्रियते तथा ।
धनं निष्फलतां याति शिल्पिनो म्रियन्ते ध्रुवम् !!" इति ज्ञानरत्नकोशे ।
उदय का जो मान बतलाया है, उसी मान के अनुसार कार्य करने से वह अनन्त फल
को देने वाला, देश में शान्ति करने वाला और आरोग्यता को बढ़ाने वाला है। यदि ये मंडप
कहे हुए उदय के मान से हीन करें तो देश में महामारी, अनेक प्रकार की व्याधियां, देश भंग
का भय, भयंकर दुर्भिक्ष, राजा को मृत्यु, धनकी निष्फलता और शिल्पियों की मृत्यु, इत्यादि
उपद्रव होने का भय है।
बारह चौको मंडप--
एकत्रिवेदपट्सप्ता-ङ्कचतुष्कयस्त्रिकत्रये ।
अग्रे भद्रं विना पार्श्वे पार्श्वयोरग्रतस्तथा ॥२२॥
अग्रतस्त्रिचतुष्कयश्च तथा पार्श्वद्वयेऽपि च ।
मुक्तकोणं चतुष्के चेदिति द्वादश मण्डपाः ॥२३॥
गूढमंडप के आगे एक, तीन, चार, छह, सात और नव चौकी वाले, ये छह प्रकार के
मंडप हुए, उनमें छट्ठा नव चौकी वाले मंडप के आगे एक चौकी हो ७, अथवा आगे चौकी न हो
परन्तु दोनों बगल मे एक एक चौकी हो ८, तथा दोनों बगल मे और आगे एक एक चौकी हो ९,
अथवा आगे तीन चौकी हो, अर्थात तीन तीन चौकी वाली चार लाईन हो १०, इसके दोनों
बगल में एक २ चौकी हो ११ अथवा दोनों बगल में और आगे एक ३ चौकी हो १२, ऐसे बारह
प्रकार के चौकी मंडप हैं॥२२-२३॥

सप्तमोऽध्यायः १२७
अपराजितपृच्छा सूत्र १८७ मे विशेषरूप से कहा है कि—
गूढमंडप के आगे एक चौकी वाला सुभद्र १, तीन चौकी वाला किरीटीर, तीन चौकी के
आगे एक चौकी, ऐसा चार चौकी वाला दुंदुभी ३, तीन २ चौकी की दो लाईन, ऐसा छह
चौकी वाला प्रान्त ४, छह चौकी के आगे एक चौकी ऐसा सात चौकी वाला मनोहर कामद ५,
[रेखाचित्र विवरण:]
१. सुभद्र १
२. किरीट २ — ३ पद, ८ स्तंभ
३. दुन्दुभि ३ — ५ पद, १० स्तंभ (३२ स्वीर्क मण्डप)
४. प्रान्त ४ — ६ पद, १२ स्तंभ
५. मनोहर ५ — ७ पद, १४ स्तंभ
६. शांत ६ — ९ पद, १६ स्तंभ
७. नंद ७ — १० पद, १८ स्तंभ (कुंभोद्भव मण्डप)
[१२ चौकी मण्डप:]
८. सुदर्शन ८ — २४ पद, २० स्तंभ
९. रूपक ९ — २२ पद, २२ स्तंभ
१०. सुनाभ १० — २४ पद, २४ स्तंभ
११. सिंह ११ — २५ पद, २६ स्तंभ
१२. सूर्योत्थक १२ — २८ पद, २८ स्तंभ

१२८ प्रासादमण्डने
तीन २ चौकी की तीन लाईन ऐसा नव चौकी वाला शान्त नाम का मंडप कहा जाता है ॥६॥
शान्तमंडप के आगे एक चौकी हो तो नंद ७, शान्तमंडप के आगे चौकी न हो,
परन्तु दोनों बगल में एक २ चौकी हो तो सुदर्शन ८, शान्तमंडप के आगे और दोनों बगल में
एक २ चौकी हो तो रम्यक ९, तीन २ चौकी वाली चार लाईन हो तो सुनाभ १०, सुनाभ
मंडप के दोनो बगल में एक २ चौकी हो तो सिंह ११, और सिंह मंडप के आगे एक चौकी
हो तो सूर्यात्मक नामका मंडप १२ कहा जाता है । इन मंडपों के ऊपर गूमट अथवा संवरणा
किया जाता है ।
गूढस्याग्रे प्रकर्त्तव्या नानाचतुष्किकान्विताः ।
चतुरस्रादिभेदेन बितानैर्बहुभिर्युताः ॥२४॥
इति द्वादशत्रिकमंडपाः ।
पुष्पकादि मण्डपो.
[१ सुभद्र, ३२ स्तंभ] [२ श्यामभद्र, ३४ स्तंभ] [३ सिंहक, ३६ स्तंभ] [४ पद्माधिक, ३८ स्तंभ] [५ कर्णिकार, २० स्तंभ]
[६ हर्षण, २२ स्तंभ] [७ सुग्रीव, २४ स्तंभ] [८ विमानभद्र, २६ स्तंभ]
[९ मानव, २८ स्तंभ] [१० नंदन, ३० स्तंभ] [११ कुल्य, ३२ स्तंभ]
[१२ शत्रुमर्दल, ३४ स्तंभ] [१३ सुमेरु, ३६ स्तंभ] [१४ विशालाक्ष, ३८ स्तंभ]

सप्तमोऽध्यायः १२६
ऐसे ये बारह प्रकार के मंडप गूढ मंडप के आगे अनेक प्रकार के चौकी वाले किये जाते
हैं। तथा ये मंडप समचोरस आदि आकृति वाले और अनेक प्रकार के वितान (चदोवा) वाले
होते हैं ॥२४॥
नृत्यमण्डप—
त्रिकाग्रे रङ्गभूमिर्या तत्रैव नृत्यमण्डपः ।
प्रासादाग्रेऽथ सर्वत्र प्रकुर्याच्च विधानतः ॥२५॥
चौकी मंडप के आगे जो रंगभूमि है, उसी भूमि के ऊपर ही नृत्यमंडप किया जाता है।
ऐसा सब प्रासादो के आगे बनाने का विधान है ॥२५॥
[चित्र: विभिन्न मण्डप योजनाएँ]
(१) १५ यशगेह (६४ स्तंमे) (२) १६ श्रीधर (६४ स्तंमे) (३) १७ वासुकीर्ति (६४ स्तंमे)
(४) १८ विजय (६८ स्तंमे) (५) १९ श्रीवत्स (६८ स्तंमे) (६) २० गयोदय (५० स्तंमे)
पुष्पकादि मण्डपो
(७) २१ गजयश (५२ स्तंमे) (८) २२ सुविभीषक (५६ स्तंमे) (९) २३ कोशक्य (५६ स्तंमे)
पुष्पकांक सोमकादि