प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)
Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary
मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तमोऽध्यायः १२१
स्तंभ का विस्तारमान और भेद—
प्रासादाद् दशरुद्रार्क-भागेन स्तम्भविस्तरः ।
वेदाष्टरविविंशत्यः कर्णा वृत्तस्तु पञ्चधा ॥१४॥
प्रासाद के दसवा, ग्यारहवा अथवा बारहवा भागके बराबर स्तंभ का विस्तार (मोटाई)
रक्खे । तथा चार, आठ, बारह और बीस कोना वाला और गोल, ऐसे पाच प्रकार के
स्तंभ हैं ॥१४॥
अपराजितपृच्छा सूत्र १८४ श्लोक ३५ मे तेरहवा और चौदहवा भाग के बराबर भी
स्तंभ का विस्तार रखना लिखा है ।
आकृति से स्तंभसंज्ञा—
"चतुरस्रश्च रुचका भद्रका भद्रसंयुताः ।
वर्द्धमानाः प्रतिरथैस्तथाष्टाश्रैश्चाष्टास्रकाः ॥
ग्रासनोर्ध्वं भवेद् भद्र-मष्टकर्णोस्तु स्वस्तिकाः ।
प्रकर्त्तव्या पञ्चविधा स्तम्भाः प्रासादरूपिणः ।।” अप० सू० १८४
चार कोना वाला चतुरस्र, भद्रवाला भद्रक, प्रतिरथवाला वर्द्धमान, आठ कोना वाला
अष्टास्र और ग्रासन के ऊपर से भद्र और आठ कोना वाला स्वस्तिक नाम का स्तंभ कहा जाता
है । ये पांच प्रकार के स्तंभ प्रासाद के अनुसार बनाना चाहिये ।
क्षीरार्णवग्रंथ के अनुसार स्तंभ का विस्तार मान—
“एकहस्ते तु प्रासादे स्तम्भः स्याच्चतुरङ्गुलः ।
द्वौ हस्ते चाङ्गुलं सप्त त्रिहस्ते च नवाङ्गुलः ॥
तस्योर्ध्वं दशहस्तानां हस्ते हस्ते च द्वयङ्गुला ।
सपादाङ्गुला वृद्धिः स्यात् त्रिंशद्धस्ते यदा भवेत् ॥
अङ्गुलैका ततो वृद्धि-श्चत्वारिंशच्च हस्तके ।
तस्योर्ध्वं च शतार्द्धं च पादोनमङ्गुलं भवेत् ॥”
एक हाथ के विस्तार वाले प्रासाद का स्तंभ चार अंगुल, दो हाथ के प्रासाद का स्तंभ
सात अंगुल, तीन हाथ के प्रासाद का स्तंभ नव अंगुल, चार से दश हाथ के प्रासाद का स्तंभ
प्रत्येक हाथ दो दो अंगुल, ग्यारह से तीस हाथ के प्रासाद का स्तंभ प्रत्येक हाथ सवा सवा अंगुल,
इकतीस से चालीस हाथ के प्रासाद का स्तंभ प्रत्येक हाथ एक एक अगुल और इकतालीस से
प्रा० १६