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प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

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पृष्ठ 176

सप्तमोऽध्यायः १२६
ऐसे ये बारह प्रकार के मंडप गूढ मंडप के आगे अनेक प्रकार के चौकी वाले किये जाते
हैं। तथा ये मंडप समचोरस आदि आकृति वाले और अनेक प्रकार के वितान (चदोवा) वाले
होते हैं ॥२४॥
नृत्यमण्डप—
त्रिकाग्रे रङ्गभूमिर्या तत्रैव नृत्यमण्डपः ।
प्रासादाग्रेऽथ सर्वत्र प्रकुर्याच्च विधानतः ॥२५॥
चौकी मंडप के आगे जो रंगभूमि है, उसी भूमि के ऊपर ही नृत्यमंडप किया जाता है।
ऐसा सब प्रासादो के आगे बनाने का विधान है ॥२५॥
[चित्र: विभिन्न मण्डप योजनाएँ]
(१) १५ यशगेह (६४ स्तंमे) (२) १६ श्रीधर (६४ स्तंमे) (३) १७ वासुकीर्ति (६४ स्तंमे)
(४) १८ विजय (६८ स्तंमे) (५) १९ श्रीवत्स (६८ स्तंमे) (६) २० गयोदय (५० स्तंमे)
पुष्पकादि मण्डपो
(७) २१ गजयश (५२ स्तंमे) (८) २२ सुविभीषक (५६ स्तंमे) (९) २३ कोशक्य (५६ स्तंमे)
पुष्पकांक सोमकादि