प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)
The Paleography of India by G.H. Ojha
रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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यह भी पाया जाता है कि उस समय चौपायों के कानों पर स्त्रुव, स्वस्तिक आदि के और पांच तथा
आठ के अंकों के चिह्न भी बनाये जाते थे और उनके कान काटे तथा छेदे भी जाते थे १.
पृष्ठ ७ वें के टिप्पण ६ में दिये हुए ग्रंथों के अतिरिक्त 'महाभारत' ग्रंथ' और आपिशलि३, स्फोटायन४,
गार्ग्य ५, शाकल्य ६, शाकटायन ७, गालव ८, भारद्वाज९, काश्यप १०, चाक्रवर्मण ११ और सेनक १२ नामक
वैयाकरणों के नाम भी पाणिनि ने दिये हैं और उनका मत प्रकट किया है.
पाणिनि से पूर्व यास्क १३ ने निरुक्त लिखा जिसमें औदुंबरायण, क्रौष्टुकी, शतबलाक्ष मौद्गल्य,
शाकपूणि, शाकटायन, स्थौलाष्ठीवी, आग्रायण, औपमन्यव, और्णवाभ, कात्थक्य, कौत्स, गार्ग्य, गालव,
चर्मशिरस्, तैटीकि, वार्ष्यायणि और शाकल्य नामक वैयाकरणों और निरुक्तकारों के नाम और मत
का उल्लेख मिलता है १४, जिनमें से केवल गार्ग्य, शाकटायन, गालव और शाकल्य के नाम पाणिनि में
मिलते हैं, जिससे अनुमान होता है कि पाणिनि और यास्क के पूर्व व्याकरण और निरुक्त के बहुत
से ग्रंथ उपलब्ध १५ थे, जिनमें से अब एक भी उपलब्ध नहीं है.
जननीय' (इन्द्र के जन्म पर ग्रंथ) के नाम दिये हैं और अंत में 'आदि' लगाकर बतलाया है कि ऐसे ग्रंथ बहुत से होंगे
(शिशुक्रन्दयम सभाद्वंद्वेन्द्र जननादिभ्यश्छः ४.३.८८). इस प्रकार पाणिनि ने केवल 'ग्रंथ' शब्द ही नहीं दिया वरन कई ग्रंथों के
नाम और उनके विषयों का पता भी दिया है. पाणिनि के सूत्र 'कृते ग्रंथे' (४.३.८७) के वार्तिक पर कात्यायन ने आ-
ख्यायिका का भी उल्लेख किया है और भाष्यकार पतंजलि ने 'वासवदत्ता,' 'सुमनोत्तरा' और 'भैमरथी' आख्यायिकाओं
के नाम दिये हैं.
१. कर्णे लक्षणस्याविष्टाष्टपञ्चमणिभिन्नच्छिन्नच्छिद्र स्त्रुवस्वस्तिकस्य ६. ३. ११५; कर्णाद्वर्णाल्लक्षणात् ६. २. ११२. इन सूत्रों पर का-
शिकाकारों ने लिखा है कि पशुओं के स्वामि का संबंध बतलाने या उनका विभाग जतलाने के वास्ते दांतली आदि के जो
चिह्न उनके कानों पर किये जाते हैं उनको लक्षण कहते हैं. पाणिनि के इन सूत्रों के अनुसार 'अष्टकर्णः गौः' या 'अष्टकर्णी
गौः' का अर्थ यही है कि जिस बैल या गौ के कान पर पहचान के लिये 'आठ' का चिह्न बना हो. ऐसे ही पञ्चकर्णी,
स्वस्तिककर्णी आदि. ऐसे शब्दों का अर्थ 'आठ कान वाली' आदि नहीं हो सकता.
जानवरों के कानों पर इस प्रकार के तरह तरह के चिह्न करने की प्रथा वेदों के समय में भी प्रचलित थी. अथर्ववेद
संहिता में तांबे के छुरे से दोनों कानों पर 'मिथुन' (स्त्रीपुरुष) का चिह्न बनाने का विधान है (अथर्व. सं. ६.१४१) और
दूसरी जगह कानों के छेदने और उनपर चिह्न करने की प्रथा को बुरा बतलाया है (१२. ४. ६). मैत्रायणी संहिता में इस
विषय का एक प्रकरण का प्रकरण है जिससे पाया जाता है कि रेवती नक्षत्र में यह कर्म करना चाहिये तब इससे समृद्धि
होती है. केवल दाहिने कान पर भी चिह्न होता था और दोनों कानों पर भी, और उन चिह्नों के नाम से गौरों के नाम पड़ते
थे—'स्थूणाकर्णी' (थंभे के चिह्नवाली), 'दात्राकर्णी' (दांतली के चिह्नवाली), 'कर्करिकर्णी' (वीणा के चिह्नवाली) आदि.
अलग अलग पुरुषों के अलग अलग चिह्न होते थे—वसिष्ठ की 'स्थूणाकर्णी', जमदग्नि की 'कर्करिकर्णी' आदि.
दाण के फल से या लोहे से चिह्न करने का निषेध किया गया है; या तो चिह्न तांबे से बनाया जाय या सांठे को पानी में
भिगोकर उसके डंठल से (मैत्रायणी संहिता; ४.२.६.).
२. महान् व्रीह्यपराह्ण''''''भारत (६.२.३८). ३. वा सुप्यापिशलेः (६.१.९२).
४. अवङ् स्फोटायनस्य (६.१.१२३). ५. ओतो गार्ग्यस्य (८.३.२०). ६. लोपः शाकल्यस्य (८.३.१९).
७. लङः शाकटायनस्यैव (३.४.१११). डा. ऑपर्ट ने जो शाकटायन का व्याकरण अभयचंद्रसूरि की टीका सहित
छपवाया है वह पाणिनि के उल्लेख किये हुए प्राचीन शाकटायन का नहीं किंतु जैन शाकटायन का नवीन व्याकरण है जो
ई. स. की नवीं शताब्दी में राष्ट्रकूट (राठौड़) राजा अमोघवर्ष (प्रथम) के समय में बना था.
८. इको ह्रस्वोऽङ्यो गालवस्य (६.३.६१.). ९. ऋतो भारद्वाजस्य (७.२.६३).
१०. तृषिमृषिकृशेः काश्यपस्य (१.२.२५). ११. ई चाक्रवर्मणस्य (६.१.१३०). १२. गिरेश्च सेनकस्य (५.४.११२.)
१३. पाणिनि ने 'यस्कादिभ्यो गोत्रे' (२.४.६३.) सूत्र से 'यास्क' नाम सिद्ध किया है.
१४. देखो, क्रमशः, यास्क का निरुक्त- १.२.१७; ८.२; १.१.६, ३; ७.१४.६; १.३.३; १०.१.३; १०.८.६; १०.८.१०; ७.१५.१;
८.४.३; १.१४.२; १.३.४; ४.३.२; ३.१५.१; ४.३.२; १.२.८; और ६. २८. ३.
१५. यह संभव नहीं कि यास्क अथवा पाणिनि ने इतने आचार्यों के एक विषय के ग्रंथ कंठस्थ करके उनका तारतम्य
विचार कर नया निरुक्त अथवा व्याकरण बनाया हो. यदि उस समय लिखना या लिखित ग्रंथ न थे तो क्या पाणिनि और
यास्क इन सब आचार्यों के ग्रंथों को वेद के सूक्तों की तरह कंठस्थ करने वालों को सामने बिठाकर उनके मत सुनते गये
होंगे और अपना निबंध बना कर स्वयं रटते और शिष्यों को रटाते गये होंगे?