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प्रबोधसुधाकर (हिन्दी अनुवाद सहित)

Prabodhasudhakara with Hindi Translation - Gita Press

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished86 पृष्ठ

विषय-सूची

श्रीहरिः
विषय-सूची
विषय पृष्ठ-संख्या
१-देह-निन्दा ... ... १
२-विषय-निन्दा ... ... ८
३-मनोनिन्दा ... ... १५
४-विषयनिग्रह ... ... १६
५-मनोनिग्रह ... ... १९
६-वैराग्य ... ... २२
७-आत्मसिद्धि ... ... २५
८-मायासिद्धि ... ... २८
९-लिंगदेहादि-निरूपण ... ... ३२
१०-अद्वैत ... ... ३५
११-कर्तृत्व-भोक्तृत्व ... ... ३९
१२-स्वप्रकाशता ... ... ४०
१३-नादानुसन्धान ... ... ४२
१४-मनोलय ... ... ४३
१५-प्रबोध ... ... ४५
१६-द्विधाभक्ति ... ... ४८
१७-ध्यानविधि ... ... ५२
१८-सगुण-निर्गुणकी एकता ... ... ५५
१९-अनुग्रह ... ... ६४

[चित्र: बालकृष्ण]

ॐ श्रीपरमात्मने नमः
प्रबोधसुधाकर
देह-निन्दा
नित्यानन्दैकरसं सच्चिन्मात्रं स्वयंज्योतिः ।
पुरुषोत्तममजमीशं वन्दे श्रीयादवाधीशम् ॥ १ ॥
नित्य एकरस आनन्दस्वरूप, सच्चिन्मात्र, स्वयंप्रकाश,
पुरुषोत्तम, अजन्मा और ईश्वर, यदुनाथ श्रीकृष्णचन्द्रकी वन्दना
करता हूँ।
यं वर्णयितुं साक्षाच्छ्रुतिरपि मूकेव मौनमाचरति ।
सोऽस्माकं मनुजानां किं वाचां गोचरो भवति ॥ २ ॥
जिनका साक्षात् ( विधि-मुखसे ) वर्णन करनेमें श्रुति भी
मूकके समान मौन हो जाती हैं, वे ( भगवान् ) क्या हम मनुष्यों-
की वाणीके विषय हो सकते हैं ?
यद्यप्येवं विदितं तथापि परिभाषितो भवेदेव ।
अध्यात्मशास्त्रसारैर्हरिचिन्तनकीर्तनाभ्यासैः ॥ ३ ॥
१

प्रबोधसुधाकर
यद्यपि भगवान् ऐसे हैं तथापि अध्यात्मशास्त्रोंके सारोंसे तथा
हरि-चिन्तन और कीर्तनाभ्यासादिसे उनका कथन किया ही
जाता है।
कॢप्तैर्बहुभिरुपायैरभ्यासज्ञानभक्त्याद्यैः ।
पुंसो विना विरागं मुक्तेरधिकारिता न स्यात् ॥ ४ ॥
सम्पादन किये हुए अभ्यास, ज्ञान और भक्ति आदि नाना
उपायोंसे भी बिना वैराग्यके मनुष्यको मुक्तिका अधिकार नहीं होता।
वैराग्यमात्मबोधो भक्तिश्चेति त्रयं गदितम् ।
मुक्तेः साधनमादौ तत्र विरागो वितृष्णता प्रोक्ता ॥ ५ ॥
वैराग्य, आत्मज्ञान और भक्ति—मुक्तिके ये तीन साधन
बतलाये गये हैं, इनमें तृष्णाहीनतारूप वैराग्य ही प्रथम है।
सा चाहंममताभ्यां प्रच्छन्ना सर्वदेहेषु ।
तत्राहंता देहे ममता भार्यादिविषयेषु ॥ ६ ॥
वह वितृष्णता समस्त देहधारियोंके भीतर अहंता और
ममतासे छिपी हुई है। उनमेंसे अहंता देहमें होती है और ममता
स्त्री-धन आदि विषयोंमें हुआ करती है।
देहः किमात्मकोऽयं कः सम्बन्धोऽस्य वा विषयैः।
एवं विचार्यमाणेऽहंताममते निवर्तेते ॥ ७ ॥
'यह देह किससे बना है और इसका विषयोंसे क्या सम्बन्ध
२

देह-निन्दा
है ?' ऐसा विचार करते रहनेसे अहंता और ममता निवृत्त हो
जाती हैं ।
स्त्रीपुंसोः संयोगात्सम्पाते शुक्रशोणितयोः ।
प्रविशञ्जीवः शनकैः स्वकर्मणा देहमाधत्ते ॥ ८ ॥
स्त्री और पुरुषके संयोगसे रज और वीर्यका मेल होनेपर
जीव अपने कर्मानुसार गर्भमें प्रवेश करके धीरे-धीरे देह धारण
करता है ।
मातृगुरूदरदर्यां कफमूत्रपुरीषपूर्णायाम् ।
जठराग्निज्वालाभिर्नवमासं पच्यते जन्तुः ॥ ९ ॥
फिर नौ मासतक मल-मूत्र और कफादिसे पूर्ण माताकी
कोखरूप बड़ी भारी कन्दरामें पड़ा हुआ यह जीव जठरानलकी
ज्वालाओंसे जला करता है ।
दैवात्प्रसूतिसमये शिशुस्तिरश्चीनतां यदा याति ।
शस्त्रैर्विखण्ड्य स तदा बहिरिहनिष्कास्यतेऽतिबलात् ॥
प्रसवके समय यदि दैववश बालक टेढ़ा हो जाता है तो
उसे शस्त्रोंसे काट-काटकर अति बलपूर्वक बाहर निकाला जाता है ।
अथवा यन्त्रच्छिद्रायदा तु निःसार्यते प्रबलैः ।
प्रसवसमीरैश्च तदा यः क्लेशः सोऽप्यनिर्वाच्यः॥११॥
अथवा यदि ठीक-ठीक प्रसव भी हुआ तो जिस समय वह
३

प्रबोधसुधाकर
प्रबल प्रसूतिवायुके द्वारा संकुचित योनिछिद्रसे बाहर निकाला
जाता है उस समयका क्लेश भी अकथनीय होता है।
आधिव्याधिवियोगात्मीयविपत्कलहदीर्घदारिद्र्यैः ।
जन्मानन्तरमपि यः क्लेशः किं शक्यते वक्तुम् ॥१२॥
जन्मके अनन्तर भी आधि, व्याधि, वियोग, स्वजनोंकी
विपत्ति, कलह और बहुत समयतक रहनेवाली दरिद्रता आदिसे
जितना दुःख उठाना पड़ता है क्या उसका वर्णन किया जा
सकता है ?
नरपशुविहङ्गतिर्यग्योनीनां चतुरशीतिलक्षाणाम्।
कर्मनिबद्धो जीवः परिभ्रमन्यातना भुङ्क्ते ॥१३॥
कर्मबन्धनसे बँधा हुआ जीव मनुष्य, पशु, पक्षी और
तिर्यगादि चौरासी लाख योनियोंमें भ्रमता हुआ नाना प्रकारकी
विपत्तियाँ झेलता है।
चरमस्तत्र नृदेहस्तत्रोन्मान्वयोत्पत्तिः ।
स्वकुलाचारविचारः श्रुतिप्रचारश्च तत्रापि ॥१४॥
आत्मानात्मविवेको नो देहस्य च विनाशिताज्ञानम् ।
एवं सति स्वमायुः प्राज्ञैरपि नीयते मिथ्या ॥१५॥
उन सब योनियोंमें मनुष्य-देह सर्वश्रेष्ठ है; उस नरदेहमें भी
उच्च कुलमें जन्म, अपने कुटुम्बके आचार-विचार तथा श्रुतिज्ञानको
४

देह-निन्दा
पाकर भी जिनको आत्मा और अनात्माका विवेक तथा देहकी
विनाशशीलताका ज्ञान नहीं हुआ वे भले ही बड़े बुद्धिमान् हों,
ऐसी स्थितिमें उनकी आयु व्यर्थ ही जाती है ।
आयुः क्षणलवमात्रं न लभ्यते हेमकोटिभिः क्वापि ।
तच्चेद्गच्छति सर्वं मृषा ततः काधिका हानिः ॥१६॥
क्षण और पलभरकी आयु भी करोड़ों सुवर्ण-मुद्राओंके
बदलेमें कभी नहीं मिल सकती । यदि ऐसी अमूल्य आयु व्यर्थ ही
चली गयी तो इससे बढ़कर और क्या हानि होगी ?
नरदेहातिक्रमणात्प्राप्तौ पश्चादिदेहानाम् ।
स्वतनोरप्यज्ञाने परमार्थस्यात्र का वार्ता ॥१७॥
नर-देहके नष्ट हो जानेपर यदि पशु आदिकी योनि मिली
तो उसमें तो भलीभाँति अपने शरीरकी भी सुधि नहीं रहती,
परमार्थकी तो बात ही क्या है ?
सततं प्रवाह्यमानैर्वृषभैरश्वैः खरैर्गजैर्महिषैः ।
हा कष्टं क्षुत्क्षामैः श्रान्तैर्नो शक्यते वक्तुम् ॥१८॥
हा ! वे क्षुधाक्षीण और थके होनेपर भी निरन्तर बोझा
ढोनेवाले बैल, घोड़े, गधे, हाथी और भैंसे अपना कष्ट कुछ भी
नहीं कह सकते ।
५

प्रबोधसुधाकर
रुधिरत्रिधातुमज्जामेदोमांसास्थिसंहतिर्देहः ।
स बहिस्त्वचा पिनद्धस्तस्मान्नो भक्ष्यते काकैः ॥१९॥
यह शरीर रुधिर, त्रिधातु (वात, पित्त, कफ), मज्जा, मेद,
मांस और हड्डियोंका समूह है; बाहरसे यह त्वचासे मँढा हुआ है
इसलिये इसे कौए भी नहीं खाते।
नासाग्राद्वदनाद्वा कफं मलं पायुतो विसृजन् ।
स्वयमेवैति जुगुप्सामन्तः प्रसृतं च नो वेत्ति ॥२०॥
नासिकासे अथवा मुखसे कफको और गुदासे मलको त्याग
करते समय मनुष्य स्वयं भी घृणा करता है तथापि इन्हें अपने
शरीरके भीतर भरे हुए नहीं जानता।
पथि पतितमस्थि दृष्ट्वा स्पर्शभयादन्यमार्गतो याति ।
नो पश्यति निजदेहं चास्थिसहस्रावृतं परितः ॥२१॥
मार्गमें पड़ी हुई हड्डीको देखकर वह उससे छू जानेके डरसे दूसरे
मार्गसे निकल जाता है, परन्तु सब ओर हजारों हड्डियोंसे भरे हुए
अपने शरीरको नहीं देखता !
केशावधि नखराग्रादिदमन्तः पूतिगन्धसम्पूर्णम् ।
बहिरपि चागरुचन्दनकर्पूराद्यैर्विलेपयति ॥२२॥
नखसे लेकर शिखापर्यन्त यह सारा शरीर दुर्गन्धसे भरा
६

देह-निन्दा
हुआ है, फिर भी मनुष्य बाहरसे इसपर अगरु, चन्दन और कर्पूर
आदिका लेप करता है !
यत्नादस्य पिधत्ते स्वाभाविकदोषसङ्घातम् ।
औपाधिकगुणनिवहं प्रकाशयञ्छ्लाघते मूढः ॥२३॥
मूढ पुरुष इसके स्वाभाविक दोषोंको यत्नपूर्वक छिपाता है,
और औपाधिक ( ऊपरी ) गुणोंको प्रकट करता हुआ इसकी
प्रशंसा करता है ।
क्षतमुत्पन्नं देहे यदि न प्रक्षाल्यते त्रिदिनम् ।
तत्रोत्पतन्ति बहवः कृमयो दुर्गन्धसङ्कीर्णाः ॥२४॥
शरीरमें यदि थोड़ा-सा घाव हो जाय और उसको तीन
दिन भी न धोया जाय तो दुर्गन्धके कारण उसमें बहुत-से कीड़े
पड़ जाते हैं ।
यो देहः सुप्तोऽभूत्सुपुष्पशय्योपशोभिते तल्पे ।
सम्प्रति स रज्जुकाष्ठैर्नियन्त्रितः क्षिप्यते वह्नौ ॥२५॥
देखो, जो शरीर अति सुशोभित फूलोंकी सेजपर सुखपूर्वक
सोया हुआ था वह अब रस्सी और काठसे जकड़ा जाकर अग्निमें
फेंका जा रहा है !
सिंहासनोपविष्टं दृष्ट्वा यं मुदमवाप लोकोऽयम् ।
तं कालाकृष्टतनुं विलोक्य नेत्रे निमीलयति ॥२६॥
७