प्रबोधसुधाकर (हिन्दी अनुवाद सहित)
Prabodhasudhakara with Hindi Translation - Gita Press
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 15, कुल 86 में से
संदर्भ में पढ़ेंदेह-निन्दा
हुआ है, फिर भी मनुष्य बाहरसे इसपर अगरु, चन्दन और कर्पूर
आदिका लेप करता है !
यत्नादस्य पिधत्ते स्वाभाविकदोषसङ्घातम् ।
औपाधिकगुणनिवहं प्रकाशयञ्छ्लाघते मूढः ॥२३॥
मूढ पुरुष इसके स्वाभाविक दोषोंको यत्नपूर्वक छिपाता है,
और औपाधिक ( ऊपरी ) गुणोंको प्रकट करता हुआ इसकी
प्रशंसा करता है ।
क्षतमुत्पन्नं देहे यदि न प्रक्षाल्यते त्रिदिनम् ।
तत्रोत्पतन्ति बहवः कृमयो दुर्गन्धसङ्कीर्णाः ॥२४॥
शरीरमें यदि थोड़ा-सा घाव हो जाय और उसको तीन
दिन भी न धोया जाय तो दुर्गन्धके कारण उसमें बहुत-से कीड़े
पड़ जाते हैं ।
यो देहः सुप्तोऽभूत्सुपुष्पशय्योपशोभिते तल्पे ।
सम्प्रति स रज्जुकाष्ठैर्नियन्त्रितः क्षिप्यते वह्नौ ॥२५॥
देखो, जो शरीर अति सुशोभित फूलोंकी सेजपर सुखपूर्वक
सोया हुआ था वह अब रस्सी और काठसे जकड़ा जाकर अग्निमें
फेंका जा रहा है !
सिंहासनोपविष्टं दृष्ट्वा यं मुदमवाप लोकोऽयम् ।
तं कालाकृष्टतनुं विलोक्य नेत्रे निमीलयति ॥२६॥
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