प्रबोधसुधाकर (हिन्दी अनुवाद सहित)
Prabodhasudhakara with Hindi Translation - Gita Press
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 65, कुल 86 में से
संदर्भ में पढ़ेंसगुण-निर्गुणकी एकता
[ अहो ! खेदकी बात है कि ] अत्यन्त पवित्र, अति सुन्दर
रसमयी और मनोहारिणी हरिकथाको छोड़कर ये कर्णयुगल अन्य
ग्राम्य-वार्ताओंके सुननेमें श्रद्धा प्रकट करते हैं ।
दौर्भाग्यमिन्द्रियाणां कृष्णे विषये हि शाश्वतिके ।
क्षणिकेषु पापकरणेष्वपि सज्जन्ते यदन्यविषयेषु ॥
इन्द्रियोंका यह परम दुर्भाग्य ही है कि नित्य विद्यमान श्रीकृष्ण-
रूप विषयके रहते हुए भी वे अन्य क्षणिक और पापमय विषयोंमें
आसक्त हो जाती हैं ।
सगुण-निर्गुणकी एकता
श्रुतिभिर्महापुराणैः सगुणगुणातीतयोरैक्यम् ।
यत्प्रोक्तं गूढतया तदहं वक्ष्येऽतिविशदार्थम् ॥१६४॥
श्रुतियों और महापुराणोंने जो सगुण और निर्गुणकी एकता
गूढ़भावसे कही है, उसीको मैं स्पष्ट करके बतलाता हूँ ।
भूतेष्वन्तर्यामी ज्ञानमयः सच्चिदानन्दः ।
प्रकृतेः परः परात्मा यदुकुलतिलकः स एवायम्॥१६५॥
जो ज्ञानस्वरूप, सच्चिदानन्द, प्रकृतिसे परे परमात्मा सब
भूतोंमें अन्तर्यामीरूपसे स्थित हैं यह यदुकुल-भूषण श्रीकृष्ण
वही तो है ।
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