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सर्वकोश
प्रबोधसुधाकर (हिन्दी अनुवाद सहित)

प्रबोधसुधाकर (हिन्दी अनुवाद सहित)

Prabodhasudhakara with Hindi Translation - Gita Press

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished86 पृष्ठ

पृष्ठ 37, कुल 86 में से

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पृष्ठ 37

मायासिद्धि
आकाश ( आकाशके समान शून्यप्राय पुरुष ) सर्वदा स्त्रीके
द्वारा ही पूर्ण होता है । उस स्त्रीने ईक्षण किया और तब उससे
मनुष्योंकी उत्पत्ति हुई । *
चिरमानन्दानुभवात्सुषुप्तिरिव काप्यवस्थाभूत् ।
परमात्मनस्तु तस्मात्स्वप्नवदेवोत्थिता माया ॥६८॥
चिरकालीन आनन्दका अनुभव करते-करते परमात्माकी
सुषुप्तिके समान कोई अवस्था हो गयी थी । उसीसे स्वप्नके समान
मायाका आविर्भाव हुआ ।
सदसद्विलक्षणासौ परमात्मसदाश्रयानादिः ।
सा च गुणत्रयरूपा सूते सचराचरं विश्वम् ॥६९॥
यह माया सत् और असत्से विलक्षण है, अनादि है और
सदैव परमात्माके आश्रय रहनेवाली है । यह त्रिगुणात्मिका माया
ही चराचर जगत्को उत्पन्न करती है ।

  • इस श्लोकमें भगवान् शङ्कराचार्यने बृहदारण्यक उपनिषद्की
    इस श्रुतिका अभिप्राय ही अभिव्यक्त किया है—
    स वै नैव रेमे तस्मादेकाकी न रमते स द्वितीयमैच्छत् । स हैतावानास
    यथा स्त्रीपुमा ँ सौ संपरिष्वक्तौ स इममेवात्मानं द्वेधापातयत्ततः पतिश्च
    पत्नी चाभवतां तस्मादिदमर्धबृगलमिव स्व इति ह स्माह याज्ञवल्क्य-
    स्तस्मादयमाकाशः स्त्रिया पूर्यत एव ता ँ समभवत्ततो मनुष्या अजायन्त ॥
    ( बृह० १ । ४ । ३ )
    २९