प्रबोधसुधाकर (हिन्दी अनुवाद सहित)
Prabodhasudhakara with Hindi Translation - Gita Press
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 38, कुल 86 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रबोधसुधाकर
माया तावददृश्या दृश्यं कार्यं कथं जनयेत् ।
तन्तुभिरदृश्यरूपैः पटोऽत्र दृश्यः कथं भवति ॥१००॥
यदि कहें कि माया तो अव्यक्त है वह इस व्यक्त प्रपञ्चको
कैसे उत्पन्न कर सकती है ? तो यह बताओ कि अदृश्यरूप सूक्ष्म
तन्तुओंसे दृश्य ( स्थूल ) पट कैसे उत्पन्न हो जाता है ?
स्वप्ने सुरतानुभवाच्छुक्रद्रावो यथा शुभे वसने ।
अनृतं रतं प्रबोधे वसनोपहतिर्भवेत्सत्या ॥१०१॥
स्वप्ने पुरुषः सत्यो योषिदसत्या तयोर्युतिश्च मृषा ।
शुक्रद्रावः सत्यस्तद्वत्प्रकृतेऽपि सम्भवति ॥१०२॥
स्वप्नमें स्त्री-सम्भोगका अनुभव होनेसे जिस प्रकार शुद्ध वस्त्रमें ही
वीर्यपात हो जाता है [ उसी प्रकार अव्यक्त प्रकृतिसे व्यक्त जगत्
हो जाता है ] जग जानेपर स्वप्नका रमण तो मिथ्या हो जाता है,
किन्तु उससे वस्त्र सचमुच बिगड़ जाता है; स्वप्नावस्थामें भी पुरुष तो
सत्य ही होता है किन्तु स्त्री असत्य और उन दोनोंका संयोग
भी मिथ्या ही होता है, फिर भी वीर्यपात सत्य ही हो जाता है ।
इसी प्रकार प्रस्तुत विषय ( अदृश्य मायासे दृश्य प्रपञ्चके उत्पन्न
होने ) में भी हो सकता है ।
एवमदृश्या माया तत्कार्यं जगदिदं दृश्यम् ।
माया तावदियं स्याद्या स्वविनाशेन हर्षदा भवति॥१०३॥
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