फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
छब्बीसवाँ अध्याय : गोचरफल ६२९
राशि से दूसरी राशि में जावे शुद्ध पंचांग में यह देखिये कि जितने
घंटे, मिनट पर (जितने बजे) या जितने घड़ी पल भर सूर्य पिछली
राशि छोड़ कर आगे की राशि में प्रवेश कर रहे हैं—उस समय
चन्द्रमा, किस नक्षत्र में है। जिस नक्षत्र में चन्द्रमा उस समय हो
उस नक्षत्र से पहले वाला नक्षत्र एक कागज़ पर नोट कर लीजिये।
उदाहरण के लिये जब सूर्य की संक्रान्ति हो रही है उस समय ज्येष्ठा
नक्षत्र है तो ज्येष्ठा से पहला अनुराधा आप कागज़ पर नोट करें।
यदि मान लीजिये सूर्य संक्रान्ति के समय चन्द्रमा पुष्य नक्षत्र में है तो
पुष्य से पहला 'पुनर्वसु' नक्षत्र कागज़ पर नोट कीजिये।
अब इस कागज़ पर नोट किये हुए नक्षत्र से गणना प्रारम्भ
कीजिये और जन्म नक्षत्र तक—(जिस नक्षत्र में—जिस व्यक्ति का
आप विचार कर रहे हैं—उसका जन्म के समय चन्द्रमा था)
गिनिये।
उदाहरण के लिये किसी व्यक्ति के जन्म के समय भरणी नक्षत्र
था (अर्थात् उसके जन्म के समय चन्द्रमा भरणी नक्षत्र में था)
और आपको यह विचार करना है कि इस मास में (सूर्य जिस
राशि में एक मास रहेगा) सूर्य गोचर से कैसा फल करेगा तो उस
सूर्य संक्रान्ति के समय चन्द्रमा मान लीजिये ज्येष्ठा में था तो आपने
ज्येष्ठा से पहला नक्षत्र अनुराधा कागज़ पर नोट किया है तो अनुराधा
से भरणी (जन्म नक्षत्र) तक गिनिये। अनुराधा १, ज्येष्ठा २, मूल,
३, पूर्वाषाढ़ ४, उत्तराषाढ़ ५, श्रवण ६, धनिष्ठा ७, शतभिषा ८,
पूर्वाभाद्र ९, उत्तराभाद्र १०, रेवती ११, अश्विनी १२, भरणी १३,
इस प्रकार १३ संख्या आई। इस संख्या के अनुसार उस मास में
(१५ ता० से १५ तक) निम्नलिखित फल होगा।
(क) यदि संख्या १, २, ३ इनमें से कोई हो तो—यात्रा, सफ़र
या रास्ता चलना पड़े।
६३० फलदीपिका।
(ख) यदि संख्या ४, ५, ६, ७, ८, ९, इनमें से कोई हो तो
भोग ।
(ग) यदि संख्या १०, ११, १२ इनमें से कोई हो तो 'व्यथा'
अर्थात् कष्ट ।
(घ) यदि संख्या १३, १४, १५, १६, १७, १८ इनमें से कोई हो
तो नवीन वस्त्र की प्राप्ति ।
(ङ) यदि संख्या १९, २०, २१ इनमें से कोई हो तो "हानि" ।
(च) यदि संख्या २२, २३, २४, २५, २६, २७ इनमें से कोई
हो तो विपुल धन की प्राप्ति ।
क्रमेण भाग्योदयमर्थहानिं जयं भयं शोकमरोगतां च ।
सुखान्यनिष्टं गदमिष्टसिद्धिं मोदं व्ययं च प्रददाति चन्द्रः ॥१२॥
चन्द्र
जन्मकालीन चन्द्र राशि से जब गोचर से चन्द्रमा विविध
राशियों में आता है तो क्रमशः निम्नलिखित फल होते हैं :—
(१) भाग्योदय (२) धनहानि (३) जय (४) भय (५) शोक
(६) अरोगता (७) सुख (८) अनिष्ट फल (९) रोग (१०) इष्ट-
सिद्धि—कार्य में सफलता (११) प्रसन्नता (१२) व्यय ।
जन्मकालीन चन्द्र राशि में हो तो भाग्योदय । द्वितीय में हो
तो धनहानि, तृतीय में जय, जन्मकालीन चन्द्र राशि से चौथी
राशि में गोचर से चन्द्र आये तब भय—इसी प्रकार सर्वत्र समझना
चाहिये ॥ १२ ॥
अन्तः शोकं स्वजनविरहं रक्तपित्तोष्णरोगं
लग्ने वित्ते भयमपि गिरां दोषमर्थक्षयं च ।
छब्बीसवां अध्याय : गोचरफल ६३१
धैर्ये भौमो जनयति जयं स्वर्णाभूषांप्रमोदं
स्थानभ्रंशं रुजमुदरजां बन्धुदुःखं चतुर्थे ॥१३॥
ज्वरमनुचितचिन्तां पुत्रहेतुव्यथां वा
कलयति कलहं स्वैः पञ्चमे भूमिपुत्रः ।
रिपुकलहनिवृत्तिं रोगशान्तिं च षष्ठे
विजयमथ धनाप्तिं सर्वकार्यानुकूल्यम् ॥१४॥
कलत्रकलहाक्षिरुग्जठररोगकृत्सप्तमे
ज्वरक्षतजरूक्षितो विगतवित्तमानोऽष्टमे ।
कुजे नवमसंस्थिते परिभवोऽर्थनाशादिभि-
र्विलम्बितगतिर्भवत्यबलदेहधातुक्षयैः ॥१५॥
दुश्चेष्टा वा कर्मविघ्नः श्रमः खे
द्रव्यारोग्यक्षेत्रवृद्धिश्च लाभे ।
भौमः खेटो गोचरे द्वादशस्थो
द्रव्यच्छेदस्ताप उष्णमयाद्यैः ॥१६॥
मंगल
अब मंगल का गोचर फल बताते हैं। जन्मकालीन चन्द्र राशि
से गिनने पर जिस राशि में गोचर से मंगल हो उसके अनुसार
निम्नलिखित फल होते हैं।
(१) अन्तःशोक—मन का भीतर ही भीतर किसी कारण से
शोकाकुल या चिन्तायुक्त होना. अपने कुटुम्बियों से वियोग, रक्त सम्बन्धी
रोग या पित्त जनित पीड़ा, ज्वर या अन्य उष्णता पैदा करने वाले
रोग ।
६३२ फलदीपिका
(२) भय, धनहानि वाक् पारुष्य (कठोर वाणी, झगड़ा)।
(३) जय, सफलता, धन प्राप्ति, आनन्द।
(४) स्थान भ्रंशता (जगह या नौकरी छूट जाय), रोग, पेट
की बीमारी, तथा बन्धुओं के कारण दुःख।
(५) ज्वर, बिना कारण चिन्ता, सन्तति कष्ट, उद्वेग, अपने
लोगों से कलह।
(६) शत्रुओं से कलह की निवृत्ति (उन पर विजय हो जाये या
उनसे समझौता हो जाये) रोग शान्ति, विजय, धन प्राप्ति तथा सब
कामों में अनुकूलता (सफलता)।
(७) अपनी स्त्री से कलह, नेत्र रोग, उदर रोग।
(८) ज्वर, चोट या घाव से पीड़ा, धन नाश, मान नाश।
(९) दीनता या पराजय, अर्थनाश, शरीर में निर्बलता, विलम्ब
से चलना आदि अशक्तता के लक्षण, धातु क्षय, आदि।
(१०) कार्य में असफलता या विघ्न, परिश्रम, दुश्चेष्टा (ऐसा
कार्य जो नहीं करना चाहिये अथवा जो कार्य किया जाय उससे हानि)
(११) द्रव्य लाभ, आरोग्य, जमीन जायदाद में लाभ आदि
शुभ फल।
(१२) धन नाश उष्णता या ताप से विविध रोग, चिन्ता,
उद्वेग आदि॥ १३-१६॥
वित्तक्षयं श्रियमरातिभयं धनाप्तिं
भार्यातनूजकलहं विजयं विरोधम् ।
पुत्रार्थलाभमथ विघ्नमशेषसौख्यं
पुष्टिं पराभवभयं प्रकरोति चान्द्रिः ॥१७॥
जन्मकालीन चन्द्र राशि से बुध के गोचर वश बारह राशियों के
भ्रमण का फल क्रमशः निम्नलिखित है।
छब्बीसवां अध्याय : गोचरफल ६३३
(१) धन हानि (२) धन लाभ (३) शत्रुओं से भय (४)
धन प्राप्ति (५) अपने स्त्री पुत्रों से कलह (६) विजय (७)
विरोध, झगड़ा (८) पुत्र से खुशी, धन लाभ (९) विघ्न (१०)
सब प्रकार से सुख (११) धनवृद्धि लाभ (१२) पराजय-
दीनता ॥१७॥
जीवे जन्मनि देशनिर्गमनमप्यर्थच्युतिं शत्रुतां
प्राप्नोति द्रविणं कुटुम्बसुखमप्यर्थे स्ववाचां फलम् ।
दुश्चिक्ये स्थितिनाशमिष्टवियुतिं कार्यान्तरायं रुजं
दुःखैर्बन्धुजनोद्भवैश्च हिबुके दैन्यं चतुष्पाद्भयम् ॥१८॥
पुत्रोत्पत्तिमुपैति सज्जनयुतिं राजानुकूल्यं सुते
षष्ठे मन्त्रिणि पीडयन्ति रिपवः स्वज्ञातयो व्याधयः ।
यात्रां शोभनहेतवे वनितया सौख्यं सुताप्तिं स्मरे
मार्गक्लेशमरिष्टमष्टमगते नष्टं धनैः कष्टताम् ॥१९॥
भाग्ये जीवे सर्वसौभाग्यसिद्धिः
कर्मण्यर्थस्थानपुत्रादिपीडा ।
लाभे पुत्रस्थानमानादिलाभो
रिःफे दुःखं साध्वसं द्रव्यहेतोः ॥२०॥
बृहस्पति
गोचर वश बृहस्पति के बारह राशियों के भ्रमण का फल निम्न-
लिखित है । जन्मकालीन चन्द्र राशि में जब बृहस्पति हो तो प्रथम
६३४ फलदीपिका
राशि और उसके बाद की राशियों को द्वितीय, तृतीय इस प्रकार
गणना करनी चाहिए । (१) देश या अपने स्थान से बाहर जाना, धन का
अत्यन्त व्यय या नाश, शत्रुता आदि अनिष्ट फल । (२) धन प्राप्ति,
कुटुम्ब सुख, अपनी वाणी का इष्टफल, उसकी बात को लोग ध्यान से
सुनें या अपनी वाणी द्वारा धन प्राप्त हो । (३) स्थिति नाश—
जगह छूटे या स्थान छूटे या आर्थिक या सामाजिक स्थिति में
अंतर आये, अपने इष्ट जनों से वियोग, कार्य में विघ्न, रोग आदि
दुष्ट फल (४) बन्धुओं से दुःख दीनता, चौपायों से भय ।
(५) पुत्र की उत्पत्ति, सन्तान सुख, सज्जनों से समागम, राजा की
कृपा आदि शुभ फल । (६) अपने दायादों (चचेरे भाई आदि) तथा
शत्रुओं से पीड़ा, रोग आदि अशुभ फल । (७) किसी शुभ कार्य
से यात्रा, अपनी स्त्री से सुख, पुत्र प्राप्ति आदि शुभ फल । (८) मार्ग
क्लेश—व्यर्थ यात्रा से परिश्रम, अशुभ फल, धन नाश, विविध प्रकार
के कष्ट । (९) सर्वसौभाग्य, सिद्धि—भाग्योदय, कार्य में सफलता
आदि शुभ फल । (१०) धन कष्ट, स्थान कष्ट (नौकरी या
ओहदे में कमी या सम्मान में कोई बट्टा । संतान पीड़ा आदि
अशुभ फल । (११) पुत्र लाभ, स्थान लाभ (नयी जगह या ओहदा
मिले या अपनी जगह में ही इज्जत बढ़े), सम्मान वृद्धि आदि शुभ
फल । (१२) द्रव्य सम्बन्धी दुःख, भय, चिन्ता उद्वेग आदि अशुभ
फल ॥ १८-२० ॥
अखिलविषयभोगं वित्तसिद्धिं विभूतिं
सुखसुहृदभिवृद्धिं पुत्रलब्धिं विपत्तिम् ।
दिशति युवतिपीडां सम्पदं वा सुखाप्तिं
कलहमभयमर्थप्राप्तिमिन्द्रारिमन्त्री ॥ २१ ॥
शुक्र
शुक्र का गोचर फल निम्नलिखित है ।
(१) सब प्रकार का भोग । (२) धनागम । (३) धन वृद्धि—
सुन्दर उपकरण आदि का लाभ । (४) सुख, मित्रों में वृद्धि । (५)
पुत्र प्राप्ति, सन्तान सुख(६) विपत्ति, कष्ट । (७) स्त्री के कारण
पीड़ा । (८) सम्पत्ति । (९) सुख प्राप्ति । (१०) कलह ।(११)
भय । (१२) अर्थप्राप्ति आदि शुभ फल ।
यह सब स्थानों के फल जन्मकालीन चन्द्र राशि से गिनना
चाहिए। उदाहरण के लिए किसी की जन्म कुण्डली में कर्क राशि में
चन्द्रमा है और जिस समय शुभाशुभ विचार किया जा रहा हो गोचर
से शुक्र कुम्भ राशि में हो तो कर्क राशि से कुम्भ अष्टम होने के
कारण उपर्युक्त अष्टम स्थान का फल शुक्र करेगा ॥ २१ ॥
रोगाशौचक्रियाप्तिं धनसुतविहतिं स्थानभृत्यार्थलाभं
स्त्रीबन्ध्वर्थप्रणाशं द्रविणसुतमतिप्रच्युतिं सर्वसौख्यम् ।
स्त्रीरोगाध्वावभोतिं स्वसुतपशुसुहृद्वित्तनाशमयातिं
जन्मादेरष्टमान्तं दिशति पदवशेनार्कसूनुः क्रमेण ॥ २२ ॥
दारिघ्रं धर्मविघ्नं पितृसमविलयं नित्यदुःखं शुभस्थे
दुर्व्यापारप्रवृत्तिं कलयति दशमे मानभङ्गं रुजं वा ।
सौख्यान्येकादशस्थो बहुविधविभवप्राप्तिमुत्कृष्टकीर्तिं
विश्रान्तिं व्यर्थकार्याद्द्विसुहृतिमरभिः स्त्रीसुतव्याधिमन्त्ये ॥२३॥
शनि
जब जन्मकालीन चन्द्र राशि में ही गोचर से शनि भ्रमण कर
रहे हों तो रोग, किसी की मृत्यु के कारण आशौच आदि अशुभ फल
होता है । जन्म राशि से द्वितीय में शनि हो तो संतान कष्ट, धन
नाश आदि अशुभ फल होते हैं। गोचर से तृतीय शनि हो तो स्थान
६३६ फलदीपिका
लाभ (नयी जगह या नौकरी की प्राप्ति) या रोज़गार, अपनी हुकूमत,
बहुत से नौकरों का होना, धन लाभ आदि शुभ फल होते हैं। चौथे
शनि अशुभ फलकारक है—धन नाश, स्त्री नाश (या स्त्री से कलह)
बन्धुओं से या उनके कारण कष्ट आदि। जन्म राशि से पंचम शनि हो
तो धन की कमी हो या घाटा लगे। सन्तान कष्ट; बुद्धिनाश (मन
में शांति न रहे, नाना प्रकार की चिन्ताओं तथा उद्वेगों से अशांति
रहे)। जन्म राशि से गोचर वश शनि छठे हो तो शुभ फल देता है।
सब प्रकार का सुख, शत्रुओं पर विजय आदि—शुभ फल होते हैं।
सप्तम शनि पीड़ाकारक होता है—स्त्री कष्ट (स्त्री को रोग या
उससे कलह) अनेक प्रकार का भय, व्यर्थ की कष्टप्रद यात्राएँ आदि।
जन्मकालीन चन्द्र राशि से गोचरवश शनि अष्टम आवे तो भी पूर्ण
अशुभ फल देता है। संतान नाश या कष्ट, पशु, मित्र, धन, आदि के
कारण घोर पीड़ा। मित्र नष्ट हो जायें, पशु मर जायें, धन की
विशेष हानि हो। मनुष्य को स्वास्थ सम्बन्धी भी चिन्ता उपस्थित
होती है। किसी पीड़ाकारक रोग के कारण विशेष शरीर कष्ट हो।
जब गोचर से नवें शनि हो तो दरिद्रता कारक होता है। धर्म कार्य
में विघ्न उपस्थित होते हैं। पिता के समान किसी श्रेष्ठ व्यक्ति की
(गुरु, चाचा, मामा आदि की मृत्यु होती है और कुछ न कुछ दुःख का
कारण बना रहता है। जन्म राशि से दशम शनि हो तो सम्मान भंग
(इज़्ज़त में बट्टा लगे) कोई विशेष पीड़ा कारक रोग हो और किसी
ऐसे व्यापार (कार्य) में प्रवृत्ति हो जिसमें असफलता हो और घाटा
लगे या ऐसा दुष्ट कर्म बन आवे जिसके कारण अप्रतिष्ठा हो। एकादश
स्थान में (जन्म कालीन चन्द्र राशि से एकादश राशि में) जब शनि
भ्रमण करे तो शुभ फलकारक होता है। सब प्रकार के सुख, बहुत
प्रकार के वैभव, उत्कृष्ट कीर्ति आदि शुभ फल होते हैं। जब बारहवें
शनि हो तो वृथा कार्यों में लगे रहने के कारण व्यर्थ का परिश्रम
छब्बीसवाँ अध्याय : गोचरफल ६३७
होता है अर्थात् उद्योग सिद्धि या सफलता न मिलने के कारण केवल
कष्ट प्राप्ति होती है । शत्रुओं द्वारा धन नाश, स्त्री और पुत्रों को रोग
पीड़ा होती है ॥२२, २३॥
देहक्षयं वित्तविनाशसौख्ये
दुःखार्थनाशौ सुखनाशमृत्यून् ।
हानिं च लाभं सुभगं व्ययं च
कुर्यात्तमो जन्मगृहात्क्रमेण ॥ २४ ॥
राहु
जन्मकालीन चन्द्र राशि से बारह राशियों में राहु का फल निम्न-
लिखित है ।
(१) बीमारी, शारीरक शक्ति का क्षय । (२) धन नाश ।
(३) सुख । (४) दुःख । (५)धन नाश ।(६) सुख । (७) नाश ।
(८) मृत्यु तुल्य कष्ट । (९) हानि । (१०) लाभ । (११)
सौभाग्य । (१२) व्यय । ॥२४॥
क्षितितनयपतङ्गौ राशिपूर्वत्रिभागे
सुरपतिगुरुशुक्रौ राशिमध्यत्रिभागे ।
तुहिनकिरणमन्दौ राशिपाश्चात्यभागे
शशितनयभुजङ्गौ पाकदो सार्वकालम् ॥२५॥
ग्रहों के विशेष प्रभाव का काल
सूर्य और मंगल गोचर वश जब किसी राशि में प्रवेश करते हैं
तब प्रवेश करते ही अपना प्रभाव दिखाते हैं । एक राशि में ३०
अंश होते हैं—राशि के प्रथम तृतीयांश में इनका विशेष ज़ोर रहता
है । बृहस्पति और शुक्र राशि के मध्य भाग में अर्थात् दस अंश
६३८ फलदीपिका
से बीस अंश तक विशेष प्रभाव या फल उत्पन्न करते हैं। चन्द्रमा
और शनि राशि के अन्तिम तृतीयांश अर्थात् २० अंश से ३० अंश तक
विशेष फल दिखाते हैं। बुध और राहु सारी राशि में अर्थात् एक अंश
से तीस अंश तक सर्वत्र एक सा फल दिखाते हैं ॥२५॥
टिप्पणी—मुहूर्त्त चिंतामणि तथा अन्य कई ग्रंथों में शंका
उठाई है कि वेध कारक ग्रह की गणना जन्मकालीन चन्द्र राशि से
करना या गोचर द्वारा जिस ग्रह का विचार किया जा रहा है उससे
करना। विपरीत-वेध का भी विचार किया है। किंतु इस छोटी सी
पुस्तक में नारद कश्यप आदि ऋषि प्रणीत विभिन्न आदेशों
का परस्पर सामंजस्य करना संभव नहीं है। जो शास्त्रार्थ की
जटिलता में विशेष अभिरुचि रखते हों वे संस्कृत की सम्बन्धित पुस्तकों
का अवलोकन कर सकते हैं।
छब्बीसवां अध्याय : गोचरफल ६३९
अथ मतान्तरेण रव्यादिग्रहाणां जन्मभाद्गोचरफलवेधयोर्ज्ञानाय चक्रम् ।
| श्री | सूर्यः | चन्द्रः | भौमः | बुधः | बृहस्पतिः | शुक्रः | शनिः | राहुः | केतुः |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| १ | स्थाननाशः<br>पन्था | पुष्टिः<br>अन्नलाभः | भयम्पी-<br>डाच | बंधनं<br>भयम् | अरिष्टादि<br>भय | सुख<br>शत्रुनाश | सर्वनाश<br>पीडामय | हानि<br>कष्ट | हानि<br>रोगभय |
| २ | हानिः<br>भयम् | धनलाभः<br>सुखम् | धननाशः<br>नेत्रातिः | धनलाभः | धनादि-<br>लाभ | सुखम्<br>अर्थलाभः | शोकः<br>धनहानिः | नैस्वं<br>व्ययञ्च | वैरं<br>वित्तनाशः |
| ३ | सुखं<br>श्रियाप्तिः | द्रव्याप्तिः<br>सुखम् | सुखं<br>श्रीप्राप्तिः | शत्रुतौ<br>भयम् | भय<br>रोगाप्ति | सुखम्<br>अर्थलाभः | सुखार्थलाभः | नैरुज्यं<br>च नृप्रप्तिः | सुखलाभ<br>वृद्धि |
| ४ | रोगभयं<br>माननाशः | रोगदाना-<br>र्थनाशः | कष्टं<br>शत्रुभीतिः | धन सुखा-<br>दिप्राप्तिः | धनहानि<br>व्ययम् | धनागमः | पीडाभयं<br>शत्रुवृद्धिः | वैरं<br>शोकश्चैव | भीति<br>पीड़ा |
| ५ | दैन्यं<br>अर्थनाशः | सुखं<br>कार्यनाशः | दृग्भयं<br>धननाशः | रुक्-<br>शोकश्च | लाभः<br>सुखं च | लाभः<br>पुत्रलाभः | धनपुत्रयो-<br>र्नाशः | हानिः<br>शोकश्च | शोक<br>अर्थनाश |
| ६ | रिपुनाशः<br>सुखं | वित्तलाभः | सुखार्थ-<br>लाभः | अलाभः<br>स्थितिः | रोगः<br>शोकश्च | शत्रुवृद्धिः<br>पीडा च | सुखं<br>वित्तलाभः | सुखं लक्ष्मी<br>प्राप्तिः | सुखम्<br>वित्तद् |
| ७ | गमनं<br>धनहानिः | द्रव्यप्राप्ति<br>सुखम् | कार्यम्<br>धननाशः | पीडामय<br>विग्रहः | सम्मानं<br>सुखं च | शोकः<br>अतिभयम् | दोषः<br>पीडामयम् | हानिः<br>कलहः | दुर्गति<br>पीड़ाच |
६४० फलदीपिका
| श्री | सूर्यः | चन्द्रः | भौमः | बुधः | बृहस्पतिः | शुक्रः | शनिः | राहुः | केतुः |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ८ | रोगाप्तिः भयम् | क्लेशभयं मृत्युः | भयं पाप बुद्धिः | धनावाप्ति हानिः | मृत्युभय पीड़ा च | विपत्तिः धनक्षयः | पीड़ाभयम् शत्रुवृद्धिः | रुग्भयं सुखं च | पीड़ाभयं हानिश्च |
| ९ | कान्तिक्षयः पापबुद्धिः | मानं नृपभयम् | रुग्भयम् | रुग्भयं धननाशः | सुखं सम्मानम् | सुखं लाभः | पापः धननाशः | पापकर्म रतिः | पापं दैन्यञ्च |
| १० | सौख्यं कर्मसिद्धिः | शुभं सुखम् | सुखं शोकश्च | सुखं सुभोगः | अति-दैन्यम् | धर्मनाशः असुखम् | वैमनस्यम् | वैरं सुखम् | भयं शोकश्च |
| ११ | वित्ताप्तिः सुखम् | विविधार्थ लाभः | लाभः सुखाप्तिः | शुभम-र्थागमः | सौख्यं धनप्राप्तिः | दुःखं धनागमः | सुखवित्त-लाभः | सुखं वित्तप्राप्ति | सुयशो-ऽर्थलाभः |
| १२ | द्रव्यनाशः पीड़ाभयं | रोगो धननाशः | रोगश्शो-कश्च | शोकः धननाशः | देहपीडा भय | धनागमः | क्लेश अनर्थश्च | हानिः पीड़ा च | पीड़ा वैरञ्च |
| शु. | ३।११ ६।१०। | ७।६।१०। १।३।११। | ३।६। ११ | २।४। ६।८। १०।११ | ५।२।९ ।७।११ | १।२।३ ४।५।८ ९।१२।११ | ६।११ ।३। | ३।११ ६ | ३।६ ११ |
| वे. | ९।५। १२।४। शनिवर्जितः | २।१२।४ ५।९।८ बुधवर्जितः | १२।९ ।५। | ५।३।९। ४।८।१२ चंद्रवर्जितः | ४।१२ १०।३ ८। | ८।७।१ १०।१२।५ ११।६।३ | ९।५। १२ रविवर्जितः | १२।५ ९ । | १२।९ ।५। |
छब्बीसवां अध्याय : गोचरफल ६४१
गोचरफलचक्रम्
| सूर्य | चन्द्रः | भौमः | बुधः | गुरुः | शुक्रः | श.रा.के. | ग्रहाः |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ३।६। १०।११॥ | १।२।३।५।६। ७।९।१०।११ | ३।६ १०।११ | २।६ १०।११ | २।५।७ १२।११ | १।२।३ १२।११ | ३।६।१० ।११। | उत्तम |
| १।२।५ ७।९ | + + | १।२।५ ७।९ | १।३।५ ७।९ | १।३।६ ११।१०॥ | ५।६। ७।१० | १।२।५ ।७।९। | अरिष्टकारक |
| ४।८।१२ | ४।८।१२ | ४।८।१२ | ४।८।१२ | ४।८।१२ | ४।८।१२ | ४।८।१२ | विशेष अनिष्ट |
| प्रायः गोचर वश जो फल ऊपर दिये गये हैं वही वराहमिहिर आदि अन्य आचार्यों ने दिये हैं। | |||||||
| इस कारण पिष्टपेषण नहीं किया जाता है। विद्वानों ने गोचर-विचार का एक चक्र प्रस्तुत किया है, वह | |||||||
| साथ में दिया गया है। इस प्रसंग में ही मंत्रेश्वर ने नक्षत्र-गोचर का भी विचार किया है और कब ग्रह | |||||||
| गोचर द्वारा फल कम करते हैं—कब अधिक इसका विचार भी किया है। वह आगे दिया जाता है : |
६४२ फलदीपिका
नक्षत्र गोचर
सात रेखायें आडी खींचिये और सात रेखायें इन आड़ी रेखाओं
को काटती हुई खड़ी खींचिए । अब पूर्वोत्तर दिशा से प्रारम्भ कर
जैसा चित्र में दिखाया गया है, क्रमशः कृत्तिका आदि अट्ठाइस
(अभिजित् सहित) नक्षत्रों के नाम लिखिए।
उत्तर
धनिष्ठा शतभिषा पू०भा उ०भा० रेवती अश्विनी भा मी
श्रवण कृत्तिका
अभिजित् रोहिणी
उ०षा मृगशीर
पू०षा० आर्द्र :
मूल पुनर्वसु
ज्येष्ठा पुष्य
अनुराधा आश्लेषा
विशाखा स्वाती चित्रा हस्त उ०फा पू०फा मघा
दक्षिण
छब्बीसवां अध्याय : गोचरफल ६४३
रेखाः सप्तसमालिखेदुपरीगास्तिर्यक्तथैव क्रमा-
द्दीशादग्निभमादितोऽपि गणयेदादित्यभस्यावधि ।
वेधा जन्मदिने मृतिर्भयमथाधानाख्यनक्षत्रे
कर्मण्यर्थविनाशनं खलु रविर्दद्यात्सपापो मृतिम् ॥२६॥
सूर्य जिस नक्षत्र में गोचर से हो उसका यदि जन्मकालीन चन्द्र
नक्षत्र से वेध होता हो तो प्राण भय होता है । यदि आधान नक्षत्र
(जन्म नक्षत्र से उन्नीसवाँ नक्षत्र) का वेध होता हो तो भय और
चिंता होगी । यदि कर्म नक्षत्र (जन्म नक्षत्र से दसवां नक्षत्र) का वेध
होता हो तो धन नाश होगा । यदि सूर्य के साथ-साथ कोई क्रूर ग्रह
भी हो तो विशेष अनिष्ट परिणाम होता है ।
एवं विद्धे खचरैः क्रूरैरन्यैर्मरणम् ।
सौम्यैर्विद्धे न मृतिर्विद्यादेवं सकलम् ॥२७॥
ऊपर जो तीन नक्षत्र बताये गये हैं,उनका यदि अन्य क्रूर ग्रहों से
वेध हो रहा हो तो मृत्यु होती है । यदि शुभ ग्रहों से भी वेध हो
तो मृत्यु नहीं होती, इसी प्रकार जैसे सूर्य का नक्षत्र गोचर ऊपर
बताया गया है, अन्य ग्रहों के नक्षत्र गोचर का भी विचार करना
चाहिए ॥२७॥
आधानकर्मर्क्षविपन्निजर्क्षे
वैनाशिके प्रत्यरभे वधाख्ये ।
पापग्रहो मृत्युभयं विदध्या
द्वेधेतथा कार्यहरः शुभाख्ये ॥२८॥
जन्मकालीन चन्द्र नक्षत्र से (क) उन्नीसवाँ नक्षत्र आधान नक्षत्र
कहलाता है, (ख) दसवाँ नक्षत्र कर्म नक्षत्र । (ग) तीसरा नक्षत्र
६४४ फलदीपिका
विपत् । (घ) बाईसवां नक्षत्र वैनाशिक । (ङ) पाँचवां नक्षत्र प्रत्यरि,
(च) और सातवां नक्षत्र वध कहलाता है । ऊपर लिखे हुए छः नक्षत्र
तथा जन्म नक्षत्र इन सातों का यदि पाप ग्रहों द्वारा वेध होता हो तो
मृत्यु का भय होता है । यदि साथ ही शुभ ग्रहों से भी वेधू हो तो
केवल कार्य हानि (भाग्य हानि, घाटा) आदि अशुभ फल होकर रह
जाते हैं ।।२८।।
आदित्यसङ्क्रान्तिदिने ग्रहाणां
प्रवेशने वा ग्रहणे च युद्धे ।
उल्कानिपाते च तथाऽद्भुते च
जन्मत्रयं स्यान्मरणादिदुःखम् ॥२९॥
(१) जिस दिन सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में संक्रमण
हो । (२) या अन्य ग्रह का किसी राशि में संक्रमण हो । (३) ग्रहण
हो । (४) ग्रह युद्ध हो । (५) उल्का निपात हो । (६) या कोई
अद्भुत “आकाशी चमत्कार” हो । उस दिन यदि जन्म नक्षत्र, अनुजन्म
(जन्म नक्षत्र से दसवां नक्षत्र) तथा त्रिजन्म (जन्म नक्षत्र से उन्नीसवां)
नक्षत्र हो तो मृत्यु आदि दुःखदायक फल होता है ॥२९॥
असत्फलः सौम्यनिरीक्षितो यः
शुभप्रदश्चाप्यशुभेक्षितश्च ।
द्वौ निष्फलौ द्वावपि खेचरेन्द्रौ
यः शत्रुुणा स्वेन विलोकितश्च ॥३०॥
तीन परिस्थितियों में ग्रह गोचर द्वारा अपना पूर्ण प्रभाव दिखाने
में निष्फल हो जाते हैं : (१) यदि कोई अशुभ फल देने वाला ग्रह
छब्बीसवां अध्याय : गोचरफल ६४५
हो और सौम्य ग्रह द्वारा गोचर काल में निरीक्षित हो तो उसकी
अशुभता नष्ट हो जाती है। (२) यदि कोई शुभप्रद ग्रह हो और
गोचर के समय अशुभ ग्रह से दृष्ट हो तो उसकी शुभता नष्ट हो जाती
है। (३) यदि कोई ग्रह अपने शत्रु से दृष्ट हो तो उसकी शक्ति भी
कम हो जाती है और शुभ फल देने में असमर्थ हो जाता है ॥३०॥
अनिष्टभावस्थितखेचरेन्द्रः
स्वोच्चस्वगेहोपगतो यदि स्यात् ।
न दोषकृच्चोत्तमभावगश्चेत्
पूर्णं फलं यच्छति गोचरेषु ॥ ३१ ॥
यदि कोई ग्रह गोचर द्वारा अनिष्ट भाव में हो किन्तु अपनी
स्वराशि या उच्च राशि में हो तो दोष नही करता (अर्थात् हानि नहीं
पहुँचाता)। यदि गोचर द्वारा शुभ भाव में हो और स्वराशि या उच्च
राशि का भी हो तो पूर्ण शुभ फल करता है ।३१॥
ग्रहेश्वरास्ते शुभगोचरस्था
नीचारिमौढ्यं समुपाश्रिताश्चेत् ।
ते निष्फलाः किन्त्वशुभाङ्कसंस्थाः
कष्टं फलं संविदधत्यनल्पम् ॥३२॥
जो ग्रह गोचर में शुभ हों किन्तु नीच राशि, या शत्रु राशि के
हों, या सूर्य के अत्यन्त सानिध्य के कारण मूढ़ावस्था को प्राप्त हों
तो वह अपना शुभ प्रभाव दिखाने में निष्फल हो जाते हैं। यदि ऐसी
अवस्था में (नीच या शत्रु राशि या मूढ़ावस्था) कोई ग्रह अशुभ भाव
में हो तो अत्यन्त अशुभ फल दिखाते हैं ॥३२॥
६४६ फलदीपिका
द्वादशाष्टमजन्मस्थाः शन्यर्काङ्गारका गुरुः ।
कुर्वन्ति प्राणसन्देहं स्थानभ्रंशं धनक्षयम् ॥३३॥
जन्मकालीन चन्द्रराशि से प्रथम, अष्टम और द्वादश राशियों में
जब सूर्य, मंगल, बृहस्पति और शनि गोचरवश होते हैं तो धनहानि,
स्थानभ्रंशता (जगह छूटे, सम्मान में कमी आदि) अत्यन्त अशुभ
फल दिखाते हैं। यहाँ तक कि प्राणों में भी सन्देह हो जाता है।
॥ ३३ ॥
चन्द्राष्टमे च धरणीतनयः कलत्रे
राहुः शुभे कविररौ च गुरुस्तृतीये ।
अर्कः सुतेऽर्किरुदये च बुधश्चतुर्थे
मानार्थहानिमरणानि वदेद्विशेषात् ॥३४॥
जन्मकालीन चन्द्रराशि से अष्टम राशि में चन्द्रमा, सप्तम में मंगल,
नवम् में राहु, चौथे बुध, तीसरे बृहस्पति, छठे शुक्र, प्रथम में शनि
और पंचम में सूर्य गोचर द्वारा अत्यन्त अनिष्ट फल देते हैं ।— धन-
हानि, मान-हानि, मृत्यु या मृत्यु तुल्य कष्ट होता है ॥३४॥
अब नक्षत्र गोचर का अन्य प्रकार बतलाते हैं :
जन्मकालीन चन्द्र नक्षत्र से गिनने पर गोचर द्वारा भिन्न-भिन्न
नक्षत्रों में सूर्य के भ्रमण को काल पुरुष के भिन्न-भिन्न अंगों में भ्रमण
माना गया है। इसका विवरण निम्नलिखित है । (क) प्रथम नक्षत्र
में चेहरे पर । (ख) २, ३, ४ और ५वें नक्षत्र में सिर में, (ग)
६, ७, ८, ९ में छाती। (घ) १०, ११, १२, १३ दाहिनी
बाहु ।
छब्बीसवाँ अध्याय : गोचरफल ६४७
वक्त्रे क्ष्मा मूर्ध्नि चत्वार्यु रसि च चतुरः सव्यहस्ते चतुष्कं
पादे षड्वामहस्ते चतुरथ नयने द्वौ च गुह्ये द्वयं च ।
भानुर्नाशं विभूति विजयमथ धनं निर्धनं देहपीडां
लाभं मृत्युं च चक्रे जनयति विविधान् जन्मभाद्देहसंस्थः ॥३५॥
(ङ) १४, १५, १६, १७, १८ तथा १९वें नक्षत्र में दोनों पैर । (च)
२०, २१, २२, २३वें नक्षत्र ने बाँयी बाँह में । (छ) २४ तथा २५वें
नक्षत्र में दोनों नेत्रों में । (ज) २६ तथा २७वें नक्षत्र में गुह्य अंग में
भ्रमण करता है। इनका प्रभाव क्रमशः निम्नलिखित है। (क) नाश,
(ख) विभूति, (ग) विजय, (घ) धन, (ङ) निर्धनता, (च) देहपीड़ा,
(छ) लाभ और (ज) मृत्यु ॥ ३५ ॥
शीतांशोर्वदने द्वयोरतिभयं क्षेमं शिरस्यम्बुधौ
पृष्ठे शत्रुजयं द्वयोर्नयनयोर्नेत्रे धनं जन्मभात् ।
पञ्चस्वात्मसुखं हृदि त्रिषु करे वामे विरोधं क्रमात्
पादौ षट्सु विदेशतां जनयति त्रिष्वर्थलाभं करे ॥३६॥
जिस प्रकार विविध नक्षत्रों में सूर्य के भ्रमण का फल ऊपर बताया
गया है । उसी प्रकार चन्द्रमा का २७ नक्षत्र में गोचर फल बताया
जाता है ।
जन्मकालीन चन्द्र नक्षत्र से गिनने पर
(क) १ और २ में—चेहरे में—इसका फल अत्यन्त भय ।
(ख) ३, ४, ५ और ६ नक्षत्र में—सिर में—फल क्षेम ।
(ग) ७ और ८ में—पीठ में—फल शत्रुओं पर जय ।
(घ) ९ और १० में—दोनों नेत्रों में—धनागम होता है ।
(ङ) ११, १२, १३, १४, १५—हृदय में—फल आत्मसुख ।
६४८ फलदीपिका।
(च) १६, १७, १८ में—बायें हाथ में—झगड़ा।
(छ) १९, २०, २१, २२, २३ और २४ में—दोनों पैरों में—यात्रा।
(ज) २५, २६, २७वें में—दाहिने हाथ में—इसका फल अर्थ
लाभ है ॥३६॥
वक्त्रे द्वे मरणं करोत्यवनिर्जः षट् पादयोर्विग्रहं
क्रोडे त्रीणि जयं चतुर्विधनतां वामे करे मस्तके।
द्वे लाभं चतुराननेऽधिकभयं क्षेमंकरे दक्षिणे
वार्द्धिर्द्वे नयने विदेशगमनं चक्रे स्वजन्मर्क्षतः ॥३७॥
अब मंगल का नक्षत्र पुरुष के किस अंग में कब भ्रमण समझना
चाहिए यह बताया जाता है। जन्मकालीन चन्द्र नक्षत्र से गिनने पर
(क) १ और २ नक्षत्र में—चेहरे में—इसका फल मृत्यु।
(ख) ३, ४, ५, ६, ७, ८ में दोनों पैरों में—फल झगड़ा।
(ग) ९, १०, ११ में—गोद में—इसका फल जय।
(घ) १२, १३, १४, १५—बायें हाथ में—फल निर्धनता।
(ङ) १६, १७—सिर में—फल लाभ।
(च) १८, १९, २०, २१—चेहरे में—फल अत्यन्त भय।
(छ) २२, २३, २४, २५ दाहिने हाथ में—फल क्षेम।
(ज) २६, २७ नक्षत्रों में—विदेश गमन ॥३७॥
मूर्ध्नि त्रीणि मुखे त्रयं च करयोः षट् पञ्च कुक्षौ तथा
लिङ्गे द्वे द्विचतुष्टयं चरणयोः प्राप्तेऽमरेन्द्रार्चितः।
शोकं लाभमनर्थमर्थनिचयं नाशं प्रतिष्ठां तथा
दद्यादात्मदिनात्तथैव भृगुजस्तद्वद्बुधोऽपि क्रमात् ॥३८॥
अब बुध, बृहस्पति और शुक्र का नक्षत्र पुरुष के विविध अंगों
में भ्रमण का विवरण और फल बताया जाता है। बुध, बृहस्पति और