फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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विपत् । (घ) बाईसवां नक्षत्र वैनाशिक । (ङ) पाँचवां नक्षत्र प्रत्यरि,
(च) और सातवां नक्षत्र वध कहलाता है । ऊपर लिखे हुए छः नक्षत्र
तथा जन्म नक्षत्र इन सातों का यदि पाप ग्रहों द्वारा वेध होता हो तो
मृत्यु का भय होता है । यदि साथ ही शुभ ग्रहों से भी वेधू हो तो
केवल कार्य हानि (भाग्य हानि, घाटा) आदि अशुभ फल होकर रह
जाते हैं ।।२८।।
आदित्यसङ्क्रान्तिदिने ग्रहाणां
प्रवेशने वा ग्रहणे च युद्धे ।
उल्कानिपाते च तथाऽद्भुते च
जन्मत्रयं स्यान्मरणादिदुःखम् ॥२९॥
(१) जिस दिन सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में संक्रमण
हो । (२) या अन्य ग्रह का किसी राशि में संक्रमण हो । (३) ग्रहण
हो । (४) ग्रह युद्ध हो । (५) उल्का निपात हो । (६) या कोई
अद्भुत “आकाशी चमत्कार” हो । उस दिन यदि जन्म नक्षत्र, अनुजन्म
(जन्म नक्षत्र से दसवां नक्षत्र) तथा त्रिजन्म (जन्म नक्षत्र से उन्नीसवां)
नक्षत्र हो तो मृत्यु आदि दुःखदायक फल होता है ॥२९॥
असत्फलः सौम्यनिरीक्षितो यः
शुभप्रदश्चाप्यशुभेक्षितश्च ।
द्वौ निष्फलौ द्वावपि खेचरेन्द्रौ
यः शत्रुुणा स्वेन विलोकितश्च ॥३०॥
तीन परिस्थितियों में ग्रह गोचर द्वारा अपना पूर्ण प्रभाव दिखाने
में निष्फल हो जाते हैं : (१) यदि कोई अशुभ फल देने वाला ग्रह