सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

दूसरा अध्याय : ग्रह भेद ४९
सूर्य गेहूँ कलिंग माणिक
चन्द्रमा चावल यवन स्वच्छ मोती
मंगल मसूर अवन्ती मूंगा
बुध मूंग मगध पन्ना
बृहस्पति चना सिन्धु पुखराज
शुक्र श्याम मूंग¹ कीकट हीरा
शनि तिल सौराष्ट्र नीलम
राहु उड़द अम्बर गोमेद
केतु कुल्थी पर्वत लहसनिया
भारतवर्ष एक महान् देश है, देश के किस भाग में मनुष्य की उन्नति
होगी ? जो ग्रह कुण्डली में बलवान् हो वह जिस प्रदेश का, अधिष्ठाता है
उसमें विशेष अभ्युदय की आशा है। जो ग्रह कुण्डली में निर्बल या पीड़ित
है, उससे सम्बन्धित देश में मनुष्य का उत्थान नहीं होगा। अन्न विशेष
का फलित में उपयोग यही होता है कि पीड़ा कारक ग्रह की दशा-अन्तर्दशा
या अनिष्ट गोचर काल में उस ग्रह से सम्बन्धित अन्न का दान करना
चाहिये ॥ २८-२९ ॥
ताम्रं कांस्यं धातुताम्रं त्रपु स्यात् स्वर्णं रौप्यं चायसं भास्करादेः ।
वस्त्रं तत्तद्वर्णयुक्तं विशेषाज्जीर्णं मन्दस्याग्निदग्धं कुजस्य ॥३०॥
भानोः कटुर्भूमिसुतस्य तिक्तं लावण्यमिन्दोरथ चन्द्रजस्य ।
मिश्रीकृतं यन्मधुरं गुरोस्तु शुक्रस्य चाम्लं च शनेः कषायः ॥
अब ग्रहों के धातु, वस्त्र विशेष तथा भोजन के किस प्रकार के स्वाद
का कौन-सा ग्रह अधिष्ठाता है, यह बताया जाता है।
१. श्याम मूंग या काले मूंग से किस अन्न से तात्पर्य है यह समझ
में नहीं आता। अन्य ज्योतिष के ग्रंथों में शुक्र का अन्न श्वेत चावल लिखा है।

५० फलदीपिका
ग्रह धातु वस्त्र स्वाद
सूर्य तांबा केसरिया कड़वा
चन्द्रमा कांसा सफेद नमकीन
मंगल तांबा लाल (जला हुआ) तिक्त (तीखा)
बुध सीसा हरा मिला-जुला
बृहस्पति सोना पीला मीठा
शुक्र चाँदी सफेद या धब्बेदार खट्टा
शनि लोहा काला (पुराना) कसैला
विशेष यह है कि मंगल से—अग्नि से जला हुआ कपड़ा तथा शनि से
पुराना जीर्ण वस्त्र समझना चाहिये। सूर्य का स्वाद कड़वा और मंगल का
तिक्त या तीखा बताया गया है। भारतीय पद्धति में मधुर कटु, अम्ल,
तिक्त, कषाय और लवण ये छः रस माने गये हैं सो छः ग्रहों के छः रस
अलग-अलग बताये गये हैं। बुध का मिला जुला।
भास्वग्दीष्पतिचन्द्रजक्षितिभुवां स्याद्दक्षिणे लाञ्छनं
शेषाणामितरत्र तिग्मकिरणात्कट्यां शिरःपृष्ठयोः।
कक्षेंऽसे वदने च सक्थिचरणे चिह्नं वयांस्यर्कतो
नेमे नाथ तटं नखं नग सनि ज्ञानाढ्य नग्नाटनम् ॥३२॥
अब ग्रहों के चिह्न स्थान किस ओर (दाहिनी ओर या बायीं ओर),
तथा ग्रहों की अवस्था (उम्र) बतायी जाती है।
सूर्य दाहिनी ओर कूल्हे पर या कमर पर उम्र ५० वर्ष
चन्द्र बायीं ओर सिर पर ,, ७० ,,
मंगल दाहिनी ओर पीठ पर ,, १६ ,,
बुध दाहिनी ओर १बगल में ,, २० ,,
बृहस्पति दाहिनी ओर कंधे पर ,, ३० ,,
शुक्र बायीं ओर चेहरे पर ,, ७ ,,
शनि बायीं ओर पैर (टांग) में ,, १०० ,,
१. बगल—कांख।

दूसरा अध्याय : ग्रह भेद ५१
राहु की भी अवस्था १०० कही गयी है। जहां सौ वर्ष की संख्या
बतायी गई.है वहां पूरे सौ वर्ष न समझकर अति वृद्ध समझना चाहिये ।
चोरी आदि के प्रश्न के फलादेश में जो चिह्न (लाँछन या लहसन)
शरीर का भाग और अवस्था आदि बतायी गई है उससे सहायता मिल
सकती है ।
नीलद्युतिर्दीर्घतनुः कुवर्णः पामी सपाषण्डमतः सहिक्कः ।
असत्यवादी कपटो च राहुः कुष्ठी परान्निन्दति बुद्धिहीनः ॥३३॥
रक्तोग्रदृष्टिर्विषवागुदग्रदेहः सशस्त्रः पतितश्च केतुः ।
धूम्रद्युतिर्धूमप एव नित्यं व्रणाङ्किताङ्गश्च कृशो नृशंसः ॥३४॥
सीसं च जीर्णवसनं तमसस्तु केतो-
मृद्भाजनं विविधचित्रपटं प्रदिष्टम् ।
मित्राणि विच्छनिसितास्तमसोर्द्वयोस्तु
भौमः समो निगदितो रिपवश्च शेषाः ॥३५॥
अब राहु केतु का कुछ विशेष परिचय देते हैं । राहु का दीर्घ शरीर
है, नीला रंग है, इसकी म्लेच्छ जाति, शरीर में खुजली या चर्म रोग है
यह अधार्मिक, पाखण्डमति है । इसको हिचकियां आती हैं, झूठ बोलता
है । कपटी है, कोढ़ी है, बुद्धिहीन है और दूसरों की निन्दा करता है ।
केतु की आंखें लाल और उग्र हैं, उसकी वाणी में विष है, ऊंचा शरीर,
शस्त्र धारण किये है, धुयें का-सा उसके शरीर का रंग है और सदैव
धूम्रपान, (सिगरेट पीना) आदि करता रहता है । उसके शरीर में व्रणों
(घावों) के निशान हैं। शरीर से कृश है परन्तु स्वभाव से क्रूर और
अत्याचार करने वाला है । यह जाति से भी पतित है । इन लक्षणों का
प्रयोजन क्या ? यदि किसी मनुष्य के द्वितीय स्थान में केतु हो तो वह
कठोर वचन बोलने वाला होगा । यदि राहु की अन्तर्दशा में किसी व्यक्ति

५२ फलदीपिका
का अहित हुआ है तो आप कह सकते हैं कि "दूसरे की निन्दा करने के
कारण" यह अनिष्ट हुआ है। जब अनेक लक्षण बताये जाते हैं तो
परिस्थिति का विचार कर लक्षण विशेष से फलादेश का विचार किया
जाता है यह ज्योतिषियों का सम्प्रदाय है ।
राहु का धातु सीसा है और पुराने (जीर्ण) कपड़ों पर इसका
आधिपत्य है। केतु का मिट्टी का बर्तन और धब्बेदार कपड़ा। केतु, राहु के
मित्र बुध, शुक्र, शनि हैं। मंगल न मित्र है और न शत्रु । सूर्य, चन्द्र,
बृहस्पति इनके शत्रु हैं।
मूढोऽपि नीचरिपुगोऽष्टमषड्व्ययस्थो
दुःस्थः स्मृतो भवति सुस्थ इतीतरः स्यात् ।
यदि कोई ग्रह अस्त हो, नीच राशि में या नीच अंश (नवांश) में हो,
शत्रु राशि में हो या लग्न से छठे, आठवें, बारहवें स्थान में हो तो उसे दुःस्थ
(ख़राब जगह में स्थित) कहते हैं। यदि ऊपर जो स्थान बताये गये हैं
उनके अलावा स्थानों में हो तो उसे सुस्थ (अच्छी जगह वाला) कहते हैं।
चन्द्रे व्ययायतनुषट्सुतकामसंस्थे
तोयाभिवृद्धिमिह शंसति वृद्धिकार्ये॥३६॥
यदि जल¹ के विषय में कोई प्रश्न किया और चन्द्रमा प्रथम, पञ्चम,
छठे, सातवें, ग्यारहवें या बारहवें स्थान में हो तो जल वृद्धि होगी । यह
फलादेश करना चाहिये ।
१. बांध बंधवाना, कुंआ खुदवाना आदि ।
अस्त—जब कोई ग्रह सूर्य के इतने समीप हो कि सूर्य के प्रकाश के कारण
दिखलाई न दे तो उसे अस्त कहते हैं। चन्द्रमा सूर्य से १२ अंश दूर तक (सूर्य
के अंश चन्द्रमा के अंशों से १२ अंश कम हों या अधिक) तक अस्त रहता
है यह अमावस्या तथा शुक्ल पक्ष की पड़वा को होता है । मंगल सूर्य से
१७ अंश की दूरी तक अस्त रहता है। यदि बुध मार्गी हो तो सूर्य से १४

दूसरा अध्याय : ग्रह भेद ५३
अन्तः सारसमुन्नतद्रुररुणो वल्ली सितेन्दू स्मृतौ
गुल्मः केतुरहिश्च कण्टकनगौ भौमार्कजौ कीर्तितौ ।
वागीशः सफलोऽफलः शशिसुतः क्षीरप्रसूनद्रुमौ
शुकेन्दू विधुरोषधिः शनिरसारागश्च सालद्रुमः ॥३७॥
किस ग्रह का किस प्रकार के वृक्षों पर विशेष आधिपत्य है, यह नीचे
बताया जाता है। जो वृक्ष ऊँचे हों और अन्तःसार (जिनके भीतर कठोरता
या दृढ़ता हो) उन पर सूर्य का विशेष अधिकार होता है। लता, वल्ली
आदि पर चन्द्रमा और शुक्र का, गुल्मों और झाड़ियों पर राहु और केतु
का विशेष अधिकार है। कांटेदार वृक्षों पर शनि और मंगल का। फलदार
वृक्ष बृहस्पति के वर्ग में हैं। बिना फल के वृक्षों पर बुध का अधिकार है।
जितने वृक्ष पुष्पों से युक्त हों या जिनमें रस हो (वृक्षों से जो दूध निकलता
है) उनको शुक्र और चन्द्रमा के हिस्से में समझना चाहिये। औषधियों
(जड़ी बूटियों का) का स्वामी चन्द्रमा है। जिन वृक्षों में रस विशेष न
हों और कमजोर हों उन पर शनि का विशेष प्रभाव समझिये। साल के
वृक्षों पर राहु का आधिपत्य है। किसी-किसी का ऐसा भी मत है कि
फल वाले वृक्षों पर बृहस्पति का, पुष्प बहुल वृक्षों पर शुक्र का और
पत्र बहुल वृक्षों पर बुध का आधिपत्य समझना चाहिए। वैसे तो
प्रत्येक वृक्ष में पत्र, पुष्प, फल आदि होते हैं परन्तु उस वृक्ष में प्रधानता
किसकी है यह देखना चाहिये। कटहल में फलों की प्रधानता है, मौलश्री
में पुष्प की प्रधानता है और अशोक में पत्ते की प्रधानता है।
अंश की दूरी तक अस्त रहता है! यदि बुध वक्री हो तो १२ अंश की दूरी
तक अस्त होता है। बृहस्पति सूर्य से ११ अंश दूर तक अस्त होता है। शुक्र
यदि मार्गी हो तो सूर्य से १० अंश तक अस्त; किन्तु यदि शुक्र वक्री हो
तो सूर्य से ८ अंश तक अस्त। सूर्य के जितने अंश हो उनसे १५ अंश पहिले
और १५ अंश बाद तक शनि अस्त होता है।

तीसरा अध्याय
वर्ग-विभाग
क्षेत्रत्रिभागनवभागदशांशहोराँत्रिंशांशसप्तलवषष्टिलवाः कलांशाः।
ते द्वादशांशसहिता दशवर्गसंज्ञा वर्गोत्तमो निजनिजे भवने नवांशः ॥१॥
दशांशषष्ट्यंशकलांशहीनास्ते सप्तवर्गाश्च विसप्तमांशाः ।
षड्वर्गसंज्ञास्त्वथ राशिभावतुल्यं नवांशस्य फलं हि केचित् ॥२॥
क्षेत्रेषु पूर्णमुदितं फलमन्यवर्गे-
ष्वर्द्धं कलादशमषष्टिलवेषु पादम् ।
बालः कुमारतरुणौ प्रवया मृतः षड्
भागः क्रमाद्युजि विपर्ययमित्यवस्थाः ॥३॥
क्षेत्रस्यार्द्धं हि होरा त्वयुजि रविसुधांश्वोः समे व्यस्तमेतद्
द्रेष्काणेशास्त्रिभागैस्तनुसुतशुभपा द्वादशांशस्तु लग्नात् ।
भौमार्कीड्यज्ञशुक्राः शिशुजसमलवा ह्योजभे युग्मभे तद्-
व्यस्तं त्रिंशांशनाथाः क्रियमकरतुलाः कर्कटाद्या नवांशाः ॥४॥
यज्ञं रत्नं जनं धनं नय पटं रूपं शुकं चेटीना
नागं योगं खगं बलं भग शिला धूलिर्नवं प्रस्वनम् ।
लाभं विश्वं दिवं कुशं रम धमं षष्ट्यंशकाश्चौजभे
क्रूराख्याः समभे विपर्ययमिदं शेषास्तु सौम्याह्वयाः ॥ ५ ॥
स्वात् सप्तांशदशांशकौ तु विषमे युग्मे तु कामाच्छुभात्
स्वादीशाश्च कलांशपा विधिहरीशार्काः समर्क्षेऽन्यथा ।

तीसरा अध्याय : वर्ग विभाग ५५
ख्यातैः कोणयुतैस्त्रिकोणभवनस्वर्क्षोच्चकेन्द्रोत्तमै-
र्वर्गाः सप्त दश त्रयोदशमिता वर्गाः प्रदिष्टाः परैः ॥ ६ ॥
प्रथम अध्याय में विविध भावों का परिचय कराया; द्वितीय अध्याय
में ग्रहों का परिचय दिया और अब तृतीय अध्याय में वर्गों का परिचय देते
हैं। वर्ग का अर्थ है हिस्से। यदि सम्पूर्ण राशि को एक माना जाय और उसके
दो हिस्से किये जायें तो प्रत्येक आधा हिस्सा होरा कहलाता है। यदि
राशि के तीन बराबर हिस्से किये जायें तो प्रत्येक भाग द्रेष्काण कहलाता
है। इसी प्रकार पांच हिस्से, सात हिस्से, दस हिस्से, बारह भाग, सोलह
भाग--साठ भाग तक करने से जो विभाग उपस्थित होते हैं उन्हें वर्ग
कहते हैं।
(१) १ भाग—राशि प्रत्येक—३०°
(२) दो भाग—होरा ,, १५ अंश का
(३) तीन भाग—द्रेष्काण—१० अंश का
(४) पाँच भाग—त्रिंशांश* ५, ७, या ८ अंश का
(५) सात भाग—सप्तमांश— ४°—१७'—८" अंश का
(६) नौ भाग—नवांश प्रत्येक ३°—२०' अंश का
(७) दस भाग—दशमांश— ३ अंश का
(८) बारह भाग—द्वादशांश—२°—३०' अंश का
(९) षोडश भाग—षोडशांश— १—१६'—५२" अंश का
(१०) साठ भाग—षष्ट्यंश— ३० कला का
इन दस वर्गों में से जब केवल राशि, होरा, द्रेष्काण, नवांश, द्वादशांश
और त्रिंशांश का विचार किया जाता है तो इसे षड्वर्ग कहते हैं।
यदि षड् वर्ग के साथ सप्तमांश का भी विचार किया जावे तो इसे सप्त
वर्ग विचार कहते हैं। यदि ऊपर जो दस वर्ग दिये गये हैं सब का विचार
१. कोई भाग पाँच अंश का, कोई सात का, कोई आठ का होता है।
सब त्रिंशांश बराबर नहीं होते ।

५६ फलदीपिका
किया जाय तो इसे दश वर्ग विचार कहते हैं। नीचे दसों वर्गों के चक्र
दिये जाते हैं जिससे स्पष्ट होगा कि किस राशि में किस अंश, कला' विकला
तक किस राशि का वर्ग रहता है।

होरा चक्र

मे०बृ०मि०क०सिं०क०तु०बृ०ध०म०कु०मी०रा०
सू०चं०सू०चं०सू०चं०सू०चं०सू०चं०सू०चं०अं०१५
चं०सू०चं०सू०चं०सू०चं०सू०चं०सू०चं०सू०अं०३०

द्रेष्काण चक्र

मे०वृ०मि०क०सिं०क०तु०वृ०ध०म०कुं०मी०रा०
१२३४५६७८९१०१११२१ से १० अंश
५६७८९१०१११२१२३४११ से २० अंश
९१०१११२१२३४५६७८२१ से ३० अंश

सप्तमांश चक्र

भागमे.वृ.मि.क.सिं.क.तु.वृ.ध.म.कुं.मी.अंश
प्रथम भाग१८३१०५१२७२९४११६४-१७-८
द्वितीय ,,२९४११६१८३१०५१२७८-३४-१७
तृतीय ,,३१०५१२७२९४११६१८१२-५१-२५
चतुर्थ ,,४११६१८३१०५१२७२९१७-८-३४
पंचम ,,५१२७२९४११६१८३१०२१-२५-४२
षष्ठ ,,६१८३१०५१२७२९४११२५-४२-५१
सप्तम ,,७२९४११६१८३१०५१२३०-०-०
यदि तीस अंशों को ७ से भाग दिया जावे तो ४ अंश १७ कला ८
विकला ३४ विकला आदि आता है परन्तु व्यावहारिक दृष्टि से ४-१७-८
लिखा है। विकला के भाग छोड़ दिये हैं क्योंकि स्पष्ट ग्रह विकला तक
ही किये जाते हैं।

तीसरा अध्याय : वर्ग विभाग ५७
पराशर होरा में इन सात भागों को क्रमशः (१) क्षार (२) क्षीर,
(३) दधि, (४) आज्य, (५) इक्षुरस, (६) मद्य, (७) शुद्ध जल
कहा गया है।
नवांश चक्र

भागमे.वृ.मि.क.सिं.क.तु.वृ.ध.म.कुं.मी.अंश
प्रथम भाग११०७४११०७४११०७४३-२०
द्वितीय ,,२११८५२११८५२११८५६-४०
तृतीय ,,३१२९६३१२९६३१२९६१०-०
चतुर्थ ,,४११०७४११०७४११०७१३-२०
पंचम ,,५२११८५२११८५२११८१६-४०
षष्ठ ,,६३१२९६३१२९६३१२९२०-०
सप्तम ,,७४११०७४११०७४११०२३-२०
अष्टम ,,८५२११८५२११८५२११२६-४०
नवम ,,९६३१२९६३१२९६३१२३०-०
दशमांश चक्र
मे.वृ.मि.क.सिं.क.तु.वृ.ध.म.कु.मी.अंश
:---:---:---:---:---:---:---:---:---:---:---:---:---
११०३१२५२७४९६११८३
२११४१६३८५१०७१२९६
३१२५२७४९६११८११०९
४१६३८५१०७१२९२१११२
५२७४९६११८११०३१२१५
६३८५१०७१२९२१०४११८
७४९६११८११०३१२५२२१
८५१०७१२९२११४१६३२४
९६११८११०३१२५२७४२७
१०७१२९२११४१६३८५३०

५८ फलदीपिका
द्वादशांश चक्र
राशि
| मे. | वृ. | मि. | क. | सिं. | क. | तु. | वृ. | ध. | म. | कुं. | मी. | अ. क. |
| प्रथम भाग | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | २-३० तक |
| द्वितीय भाग | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १ | ५-० " |
| तृतीय भाग | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १ | २ | ७-३० " |
| चतुर्थ भाग | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १ | २ | ३ | १०-० " |
| पंचम भाग | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १ | २ | ३ | ४ | १२-३० " |
| षष्ठ भाग | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १ | २ | ३ | ४ | ५ | १५-० " |
| सप्तम भाग | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | १७-३० " |
| अष्टम भाग | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | २०-० " |
| नवम भाग | ९ | १० | ११ | १२ | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | २२-३० " |
| दशम भाग | १० | ११ | १२ | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | २५-० " |
| एकादशभाग | ११ | १२ | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | २७-३० " |
| द्वादश भाग | १२ | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | ३०-० " |
षोडशांश चक्र
राशि
| भाग | मे. | वृ. | मि. | क. | सिं. | क. | तु. | वृ. | ध. | म. | कुं. | मी. | अं.क. वि. |
| प्रथम भाग | १ | ५ | ९ | १ | ५ | ९ | १ | ५ | ९ | १ | ५ | ९ | १-५२-३० |
| द्वितीय भाग | २ | ६ | १० | २ | ६ | १० | २ | ६ | १० | २ | ६ | १० | ३-४५- ० |
| तृतीय भाग | ३ | ७ | ११ | ३ | ७ | ११ | ३ | ७ | ११ | ३ | ७ | ११ | ५-३७-३० |
| चतुर्थ भाग | ४ | ८ | १२ | ४ | ८ | १२ | ४ | ८ | १२ | ४ | ८ | १२ | ७-३०- ० |
| पंचम भाग | ५ | ९ | १ | ५ | ९ | १ | ५ | ९ | १ | ५ | ९ | १ | ९-२२-३० |
| षष्ठ भाग | ६ | १० | २ | ६ | १० | २ | ६ | १० | २ | ६ | १० | २ | ११-१५- ० |
| सप्तम भाग | ७ | ११ | ३ | ७ | ११ | ३ | ७ | ११ | ३ | ७ | ११ | ३ | १३- ७-३० |
| अष्टम भाग | ८ | १२ | ४ | ८ | १२ | ४ | ८ | १२ | ४ | ८ | १२ | ४ | १५- ०- ० |
| नवम भाग | ९ | १ | ५ | ९ | १ | ५ | ९ | १ | ५ | ९ | १ | ५ | १६-५२-३० |
| दशम भाग | १० | २ | ६ | १० | २ | ६ | १० | २ | ६ | १० | २ | ६ | १८-४५- ० |
| एकादशभाग | ११ | ३ | ७ | ११ | ३ | ७ | ११ | ३ | ७ | ११ | ३ | ७ | २०-३७-३० |
| द्वादश भाग | १२ | ४ | ८ | १२ | ४ | ८ | १२ | ४ | ८ | १२ | ४ | ८ | २२-३०- ० |
| त्रयोदशभाग | १ | ५ | ९ | १ | ५ | ९ | १ | ५ | ९ | १ | ५ | ९ | २४-२२-३० |
| चतुर्दश भाग | २ | ६ | १० | २ | ६ | १० | २ | ६ | १० | २ | ६ | १० | २६-१५- ० |
| पंचदश भाग | ३ | ७ | ११ | ३ | ७ | ११ | ३ | ७ | ११ | ३ | ७ | ११ | २८- ७-३० |
| षोडश भाग | ४ | ८ | १२ | ४ | ८ | १२ | ४ | ८ | १२ | ४ | ८ | १२ | ३०- ०- ० |

तीसरा अध्याय : वर्ग विभाग ५९
मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु, कुंभ इन छः विषम राशियों में सोलह
भागों के स्वामी (१) ब्रह्मा, (२) विष्णु, (३) हर, (४) सूर्य, (५)
ब्रह्मा, (६) विष्णु, (७) हर, (८) सूर्य, (९) ब्रह्मा, (१०) विष्णु,
(११) हर, (१२) सूर्य, (१३) ब्रह्मा, (१४) विष्णु, (१५) हर,
(१६) सूर्य होते हैं।
वृष, कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर, मीन इन छः सम राशियों में १६
भागों के स्वामी (१) सूर्य, (२) हर, (३) विष्णु, (४) ब्रह्मा, (५)
सूर्य, (६) हर, (७) विष्णु, (८) ब्रह्मा, (९) सूर्य, (१०) हर,
(११) विष्णु, (१२) ब्रह्मा, (१३) सूर्य, (१४) हर, (१५) विष्णु,
(१६) ब्रह्मा होते हैं।
त्रिंशांश का अर्थ है तीस भाग, किन्तु प्रचलित प्रथा यह है कि एक
राशि के पांच हिस्से करते हैं। विषम राशियों में (मे० मि०,सिं०, तु०,ध०,
कुं०) में प्रथम भाग ५ अंश तक, दूसरा १० अंश तक तीसरा १८ अंश तक,
चौथा २५ अंश तक, पांचवां ३० अंश तक होता है। सम (वृ०, क०, क०,
वृ०, म०, मी०) राशियों में प्रथम विभाग ५ अंश तक, दूसरा १२ अंश
तक, तीसरा २० अंश तक, चौथा २५ अंश तक, पांचवां ३० अंश तक
होता है। त्रिंशांश चक्र नीचे दिया जाता है। जिससे यह स्पष्ट होगा
कि किस राशि में कितने अंश तक त्रिंशांश वर्ग कौन-सा होगा।
त्रिंशांश
विषम (मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु, कुंभ) राशियों में प्रथम भाग
५ अंश तक, दूसरा भाग १० अंश तक, तीसरा १८ अंश तक चौथा २५
अंश तक, पांचवां ३० अंश तक होता है।
सम (वृष, कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर, मीन) राशियों में प्रथम भाग
५ अंश तक, दूसरा भाग १२ अंश तक, तीसरा २० अंश तक, चौथा २५
अंश तक, पांचवां ३० अंश तक होता है।

० फलदीपिका
त्रिंशांश कुण्डली चक्र

भागमे.वृ.मि.क.सिं.क.तु.वृ.ध.मं.कुं.मी.
प्रथम भाग१२१२१२१२१२१२
द्वितीय ,,११६११६११६११६११६११६
तृतीय भाग९१२९१२९१२९१२९१२९१२
चतुर्थ ,,३१०३१०३१०३१०३१०३१०
पंचम ,,७८७८७८७८७८७८

षष्ट्यंश
प्रत्येक राशि में तीस अंश होते हैं, प्रत्येक अंश को यदि दो में विभाजित
किया जाय तो आधे-आधे अंश के—६० भाग—प्रत्येक राशि के किये जा
सकते हैं। मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु, और कुम्भ राशियों में १, २, ८,
९, १०, ११, १२, १५, १६, ३०, ३१, ३२, ३३, ३४, ३५, ३९, ४०,
४२, ४३, ४४, ४८, ५१, ५२, और ५९ वें भाग क्रूर हैं। शेष भाग सौम्य
हैं। वृष, कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर और मीन राशियों में ३, ४, ५, ६,
७, १३, १४, १७, १८, १९, २०, २१, २२, २३, २४, २५, २६, २७, २८,
२९, ३६, ३७, ३८, ४१, ४५, ४६, ४७, ४९, ५०, ५३, ५४, ५५, ५६,
५७ और ६० वें भाग क्रूर हैं बाकी सौम्य हैं।
यह दस वर्ग हुए। किसी भी ग्रह की शुभता या क्रूरता का विचार
करना हो तो यह देखिये कि वह अपने उच्च अथवा स्वयं की या मित्र आदि
की राशि होरा द्रेष्काण आदि में है या शत्रु अधिशत्रु के घर और वर्गों
में पड़ा है। परन्तु सब वर्गों का सम्मान महत्त्व नहीं है। यदि राशि को
सोलह आने महत्त्व दिया जावे तो और वर्गों को—होरा, द्रेष्काण, सप्तमांश,
नवांश, द्वादशांश, त्रिंशांश को आठ आना महत्त्व देना चाहिये। किसी-
किसी का मत यह है कि नवांश को भी सोलह आने महत्त्व दिया जाना
चाहिये। बाकी के तीन वर्ग दशमांश, षोडशांश और षष्ट्यंश को रुपये
में चार आना महत्त्व देना चाहिये। हमारा विचार यह है कि राशि और

तीसरा अध्याय : वर्ग विभाग ६१
नवांश को करीब-करीब बराबर सा महत्त्व देना उचित है । यदि राशि
शरीर है तो नवांश दिल है; शरीर कमज़ोर हो, दिल मज़बूत हो तो
मनुष्य दीर्घ आयु तक जिन्दा रहता है किन्तु शरीर बलवान् हो और दिल
कमजोर हो तो हार्ट फेल होने में देर नहीं लगती ।
यदि कोई ग्रह जिस राशि में है उसी नवांश में हो तो उसे वर्गोत्तम
कहते हैं । उदाहरण के लिये चन्द्रमा के मेष राशि में दो अंश हों तो चन्द्रमा।
मेष राशि और मेष ही नवांश में होने के कारण वर्गोत्तम में हुआ । वर्गोत्तम
ग्रह ऐसा ही बलवान् समझा जाता है जैसा स्वराशि में । इसके अतिरिक्त
ग्रहों की एक संज्ञा और बतायी है वह है बाल, कुमार, युवा, प्रौढ़ और
वृद्ध । मेष मिथुन, सिंह, तुला, धनु और कुम्भ राशियों में ६° तक बाल,
१२° तक कुमार १८° तक युवा २४° तक प्रौढ़ और अन्तिम ६° में ग्रह
मृत (मरा हुआ) समझा जाता है । वृष, कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर और
मीन राशियों में उल्टा क्रम है । ६° तक मृत, १२° तक प्रौढ़, १८° तक
युवा, २४° तक कुमार, और अन्तिम ६° तक बाल (बच्चा) समझा जाता है।
किसी ग्रह के बलाबल का विचार करना हो तो देखिये कि वह ग्रह
केन्द्र या त्रिकोण में है अपनी राशि, मूल त्रिकोण राशि, उच्च राशि या
वर्गोत्तम में है क्या ? इसके बाद सप्त वर्ग या दस वर्ग में विचार कीजिये ।
बहुत-से लोग केवल दस वर्गों में देखते हैं और मित्र गृही है, स्वराशि में
है या उच्च राशि में—इन सब बातों के लिये तेरह वर्गों का विचार
करते हैं ।
वर्गान्योजयतु त्रयोदश सुहृत्स्वर्त्तोच्चभेषु क्रमाद्-
द्विस्त्रिः पञ्च चतुर्नवाद्रिवसुषट्संख्यासु वर्गैक्यतः ।
प्राहुश्चोत्तमपारिजात कथितौ सिंहासनं गोपुरं
चेत्यैरावतदेवलोकसुरलोकांशान्श्च पारावतम् ॥ ७ ॥
तेरह वर्गों में यह विचार करना चाहिये कि ग्रह अपनी उच्च राशि
में है, मित्र राशि में या स्वराशि में । यदि दो वर्गों में स्वराशि, स्ववर्ग

न्द्रदयितं भूपालतुल्यं नरम् ॥ ८ ॥`
Wait, "नृपेन्द्रदयितं":
नृ (nri)
पे (pe)
न्द्र (ndra)
द (da)
यि (yi)
तं (tam)
Yes: "नृपेन्द्रदयितं".

Line 18:
श्रेष्ठाश्वद्विपवाहनादि विभवं पारावताधिष्ठितः

Line 19:
सत्कीर्तिं यदि देवलोकसहितो भूमण्डलाधीश्वरम् ।

Line 20:
वन्द्यं भूपतिभिः सुरेन्द्रसदृशं त्वैरावतांशास्थितः
Wait, look at "त्वैरावतांशास्थितः" again.
Is it "त्वैरावतांशस्थितः"?
Let's look at the meter:
वन् (G) द्यं (G) भू (G)
प (L) ति (L) भिः (G)
सु (L) रें (G) द्र (L)
स (L) दृ (L) शं (G)
त्वै (G) रा (G) व (L)
तां (G) श (L) स्थि (L) तः (G) -- wait!
In Shardulavikridita:
Syllable 13: त्वै (G)
Syllable 14: रा

तीसरा अध्याय : वर्ग विभाग ६३
ऊपर कितने स्ववर्ग आदि में ग्रह क्या-क्या कहलाता है यह बतलाने के
बाद अब इसका फल बताते हैं; यदि कोई ग्रह "पारिजातांश" में हो तो
वह जातक को अनेक गुणों से युक्त धनी, सुखी, मान प्रतिष्ठा वाला बनाता
है। यदि कोई ग्रह उत्तमांश में हो तो वह उत्तम आचार वाला (कुलक्रमागत
शिष्ट, जनानुमोदित) रास्ते पर चलने वाला चतुर और विनयी होता
है। यदि किसी जातक का कोई ग्रह गोपुरांश में हो तो उसकी बुद्धि शुभ
होती है और उसको गायों का, धन का, खेत का तथा अपने मकान का
सुख प्राप्त होता है। यदि ग्रह सिंहासनांश में हो तो मनुष्य राजा का
प्यारा हो; या राजा के बराबर हो या राजा ही हो जाय, यह सब परि-
स्थिति देखकर फलादेश कहना चाहिये।
यदि कोई ग्रह पारावतांश में हो तो जातक को श्रेष्ठ, घोड़े, हाथी,
सवारी आदि प्राप्त हों और वैभव से युक्त हो। यदि कोई ग्रह देवलोकांश
में हों तो जातक सत्कीर्ति से युक्त भूमण्डलाधीश (राजा) गवर्नर आदि
हो। ऐरावतांश में ग्रह होने से वह साक्षात् इन्द्र के वैभव से युक्त होगा
और अनेक राजा उसको सलाम करेंगे। सुरलोकांश का फल भी करीब-
करीब ऐसा ही है। धन-धान्य, सौभाग्य, पुत्र सुख से युक्त महाराजा हो।
ऊपर जो अधिकाधिक शुभ वर्गों में उत्तम फल बताये गये हैं; इनका
शब्दार्थ नहीं लेना चाहिये। केवल भावार्थ लेना चाहिये, कि जितना
अधिक कोई ग्रह स्ववर्गों में होगा उतना ही सुख, फल दिखाने में समर्थ
होगा। केवल एक ग्रह अच्छा होने से न कोई राजा बनता है न कोई
एक ग्रह खराब होने से कोई रंक हो जाता है। न सब ग्रह किसी के बनते
हैं न सब ग्रह किसी के बिगड़ते हैं इसीलिये फलादेश करते समय सब ग्रहों
के बलाबल का तारतम्य कर अन्तिम नतीजे पर पहुंचना चाहिये॥ ९॥
ऊपर के श्लोकों में ग्रहों के बलवान् होने का शुभ फल बताया है।
अब ग्रहों के निर्बल होने का फल बताते हैं। दशों वर्गों में बलहीन हो तो
मृत्यु हो जावे। यदि नौ में बलहीन हो तो 'नाश' हो, आठ में
बलहीन हो तो "दुःख" उत्पन्न करे। सात में निर्बलता का फल है

अनर्थ । छः में सुखहीनता । यदि पांच वर्गों में बलवान् हो तो
बन्धुओं का प्यारा । ६ वर्गों में बलवान् होने से बन्धुओं में श्रेष्ठ
हो । ७ वर्गों में बलवान् होने का फल है राजा की कृपा प्राप्त
होना । ८ का फल है धनी होना । ९ का फल है राजा होना और दसों
वर्गों में बलवान् होने से महाराजा होता है । अब राजा महाराजा होते
नहीं इस कारण यह अर्थ समझना चाहिये कि जितने अधिक वर्गों में बलवान्
हो उतना ही शुभ फल अधिक होगा ।
यदि ग्रह बालावस्था में हो तो व्यक्ति वृद्धि को प्राप्त हो, कुमारावस्था
में ग्रह हो तो जातक को सुख प्रदान करे । यदि ग्रह युवावस्था में हो
तो जातक को नृप बना दे । अर्थात् अधिक अभ्युदय करे । यदि ग्रह
प्रौढ़ावस्था में हो तो बीमारी पैदा करता है । और वृद्ध अवस्था में मृत्यु
पैदा करता है। यहां भी शब्दार्थ न लेकर भावार्थ लेना चाहिये कि ग्रह
यदि बाल हो तो क्रमशः उन्नति यदि कुमार हो तो बाल से अधिक अच्छा
फल, युवा हो फल प्रदान करने में पूर्ण शक्तिमान्, प्रौढ़ हो तो भलाई
करने में अशक्त, बुराई के लिये उद्यत और मृत अवस्था में हो तो अत्यन्त
निकृष्ट फल देता है ।। १० ।।
षड् वर्गेषु शुभग्रहाधिकगुणैः* श्रीमांश्चिरं जीवति
क्रूरांशे बहुले विलग्नभवने दीनोऽल्पजीवः शठः ।
तन्नाथा बलिनो नृपोऽस्त्यथ नवांशेशो दृगाणेश्वरो
लग्नेशः क्रमशः सुखी नृपसमः क्षोणीपतिर्भाग्यवान् ।। ११ ।।
यदि शुभ ग्रह षड्वर्गों में बलवान् हो तो मनुष्य धनवान् और दीर्घायु
होता है। जिस प्रकार ग्रहों के षड्वर्ग देखे जाते हैं उसी प्रकार लग्न स्पष्ट
करके यह देखना चाहिये कि जो राशि, अंश कला, विकला उदय हो रही है
*राशि, होरा, द्रेष्काण नवांश, द्वादशांश, और त्रिंशांश यह षड्वर्ग
कहलाते हैं ।

तीसरा अध्याय : वर्ग विभाग ६५
वह लग्नेश की अपनी किंवा शुभ ग्रहों के वर्ग में है या नहीं। यदि लग्न
क्रूर अंशों के षड्वर्गों में हो तो जातक अल्पायु, दरिद्र और दुष्ट प्रकृति
का होता है। किन्तु यदि जिन अंशों में लग्न स्पष्ट है उन अंशों के स्वामी
बलवान् हों तो मनुष्य बहुत उच्च पदवी प्राप्त करेगा।
यदि लग्न के नवांश का स्वामी बलवान् हो तो मनुष्य सुखी होगा;
यदि लग्न द्रेष्काण का स्वामी बलवान् हो तो मनुष्य राजा के समान
पदवी प्राप्त करे। और यदि स्वयं लग्नेश बहुत बलवान् हो तो मनुष्य पृथ्वी
(भूमि) का स्वामी और भाग्यवान् हो ॥ ११ ॥
ओजे क्रूरेऽर्कहोरां गतवति बलवान् क्रूरवृत्तिर्धनाढ्यो
युग्मे चान्द्रीं शुभेषु द्युतिविनयवचोहृद्यसौभाग्ययुक्तः ।
व्यस्तं व्यस्तेऽत्र मिश्रे समफलमुदितं लग्नचन्द्रौ बलिष्ठौ
तन्नाथौ द्वौ च तद्वद्यदि भवति चिरंजीव्यदुःखी यशस्वी ॥१२॥
जिनकी जन्मकुण्डली में क्रूर ग्रह मेष, मिथुन, सिंह, तुला, वृश्चिक और
कुम्भ राशि में स्थित होकर सूर्य की होरा में हों (प्रथम पन्द्रह अंश)
वे व्यक्ति क्रूर वृत्ति वाले, बलवान् और धनाढ्य होते हैं। इसके विपरीत
जिनकी जन्मकुण्डलियों में शुभ ग्रह वृष, कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर,
और मीन राशियों में स्थित होकर चन्द्र होरा में हों (प्रारंभिक पन्द्रह अंशों
में) वे लोग कान्तियुक्त, विनयी, नम्र वचन बोलने वाले, हृद्य (जिनकी
तरफ हृदय का आकर्षण हो) और सौभाग्यशाली होते हैं। ऊपर जो दो
परिस्थितियां बताई गई हैं ग्रह स्थिति उसके विपरीत हों तो विपरीत
फल होता है। यदि मिली-जुली परिस्थिति हो तो परिणाम भी मिला-
जुला होता है। जिसकी जन्म कुण्डली में लग्न और चन्द्रमा दोनों बलवान्
हों तथा लग्न का स्वामी और चन्द्रमा जिस राशि में हो उसका स्वामी ये
दोनों भी पूर्ण बलवान् हों तो वह व्यक्ति दीर्घायु, सुखी और यशस्वी
होता है।

६६ फलदीपिका
सिंहाजाशिवितुलानृयुग्मभवनेष्वन्त्या ह्यजादिमाः
मध्यौ स्त्रीयमयोरिहायुधभृतः पाशोलिमध्यो भवेत् ।
नक्राद्यो निगलो मृगेन्द्रघटयोराद्यो वणिङ्मध्यमो
गृध्रास्यो वृषभांतिमश्च विहगः कर्क्यादि कोलाननम् ॥१३॥
कौर्याद्यः कर्कटान्त्यो झषचरममहिश्वाजगोमध्यसिंहा-
द्यल्यन्त्यं स्याच्चतुष्पादिह फलमधनक्रूरनिन्द्या दरिद्राः ।
द्वन्द्वर्क्षे स्युर्दृगाणैरधमसमशुभान्यस्थिरे चोत्क्रमेण
प्राहुस्तज्ज्ञाः स्थिरक्ष्वशुभशुभसमान्येव लग्न फलानि ॥१४॥
इन द्रेष्काणों का स्वरूप बताते हैं। निम्नलिखित द्रेष्काण हैं ।
' प्रथम द्रेष्काण द्वितीय द्रेष्काण तृतीय द्रेष्काण
मेष आयुध चतुष्पाद आयुध
वृष चतुष्पाद पक्षी
मिथुन आयुध आयुध
कर्क कोलानन सर्प
सिंह गृध्रास्य आयुध
चतुष्पाद
कन्या आयुध
तुला गृध्रास्य आयुध
वृश्चिक सर्प पाश चतुष्पाद
धनु आयुध आयुध
मकर निगड
कुंभ गृध्रास्य
मीन सर्प
फलदीपिका की एक संस्कृत प्रति में द्रेष्काण का स्वरूप वर्णन करने
वाले श्लोक १३ और १४ नहीं हैं। अन्य प्रति में सिंह के आद्य ( प्रथम )

तीसरा अध्याय : वर्ग विभाग ६७
द्रक्काणेशे स्ववर्गे शुभखगसहिते स्वोच्चमित्रर्क्षगे वा
तद्व त्त्रिंशांशनाथे बलवति यदि चेद् द्वादशांशाधिपे वा ।
होरानाथे तथा चेन्निखिलगुणगणो नित्यशुद्धप्रवीणो
दीर्घायुः स्याद्द्यावान् सुतधनसहितः कीर्तिमान्राजभोगः॥१५॥
यदि लग्न द्रेष्काण का स्वामी अपने उच्च वर्ग में स्ववर्ग में या मित्र
के वर्ग में शुभ ग्रह के साथ हो, यदि लग्न होरा, लग्न त्रिंशांश तथा लग्न
द्वादशांश के स्वामी भी अपने-अपने उच्च वर्गों में स्ववर्गों में या
मित्र वर्गों में हों और शुभ ग्रह सहित हों तो उस व्यक्ति में अनेकानेक गुण
द्रेष्काण को श्लोक १३ में 'गृध्रास्य, कहा है (श्लोक १३ पंक्ति ३-४)
और श्लोक १४ में (पंक्ति १-२) इसी सिंह राशि के प्रथम द्रेष्काण को
चतुष्पाद कहा है। प्रतीत होता है मूल संस्कृत में मुद्रण में कुछ अशुद्धि
हैं
आयुध —शस्त्र, या शस्त्र धारण करने वाला
चतुष्पाद —चौपाया-जानवर
कोलानन —सूअर के मुख वाला
गृध्रास्य —गृध्र के मुख वाला
पाश —जाल-जिसमें किसी को बांध लिया जावे
पक्षी —परिन्दा
सर्प —साँप
निगड़ —बेड़ी में जकड़ा हुआ
जब जन्म के समय उपर्युक्त द्रेष्काण उदित हो तो जातक अधन (धन-
रहित), क्रूर, निन्द्य (निन्दा के योग्य उसके कर्म हों) तथा दरिद्र
होता है ।
सामान्यतः चर, स्थिर, द्वि स्वभाव राशियों में प्रथम, द्वितीय, तृतीय
द्रेष्काणों का फल निम्नलिखित है ।

६८ फलदीपिका
होते हैं। वह चतुर दीर्घायु, दयावान्, पवित्र, यशस्वी राजाओं के सदृश
भोग भोगने वाला होता है। उसको पुत्र सुख प्राप्त होता है और वह् धनी
भी होता है ॥ १५ ॥
मान्दिस्थराशिपतिसङ्गतसुत्रिकोणं
तस्यांशराशिपतिसंयुतमंशकोणम् ।
लग्नं वदन्ति गुलिकांशकराशिकोणं
तद्वद्विधौ बलयुते शशिनैव विद्यात् ॥ १६ ॥
यह देखिये कि किस राशि में मान्दि है और मान्दि राशि (जिस राशि
में मान्दि है) का स्वामी कहाँ है। जातक का जन्म लग्न इन दोनों राशियों
से त्रिकोण में (नवम या पञ्चम) होगा अथवा मान्दि जिस नवांश में है
उससे नवम पञ्चम या मान्दि राशि नवांश का जो स्वामी है वह जिस
नवांश में बैठा है उससे नवम या पञ्चम जन्म लग्न होगा। अथवा गुलिक
जिस नवांश में है उससे पञ्चम या नवम। यहां लग्न निश्चय करने के
लिये कुछ हिदायतें दी गई हैं उनको अमल में लाने के पूर्व क्या निश्चय
करना चाहिये यह ऊपर बताया गया है। नवीन ज्योतिषियों के हितार्थ इसे
पुनः समझाया जाता ह।
प्रथम द्वितीय तृतीय
चर राशि
(मेष, कर्क, तुला, मकर) शुभ सम अधम
स्थिर राशि अशुभ शुभ सम
(वृष, सिंह, वृश्चिक, कुंभ)
द्विस्वभाव राशि अधम सम शुभ
(मिथुन, कन्या, धनु, मीन)
उपर्युक्त फल लग्न राशि, चर है, स्थिर या द्विस्वभाव, प्रथम द्रेष्काण
उदय हो रहा है, द्वितीय या तृतीय यह निश्चित कर कहना चाहिये ।