परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
षष्ठ एवं सप्तम खण्ड: श्रीचक्र नवावरण पूजा एवं चक्र-विधान
१५४ परशुरामकल्पसूत्रम्
प्रविष्टपञ्चदशवर्णात्मककूटत्रये एकैककूटस्थैकैकवर्णत्ववत् षण्णां
वर्णानामेकवर्णत्वम्। इत्थं चाष्टाविंशतिसङ्ख्योपपन्ना॥२०॥
सूत्र में चक्रमध्य में जो उक्ति है, उसका अन्वय आवाह्य शब्द से करना
चाहिये। इसी तरह 'उक्त्वा' शब्द को हटाकर 'श्रीमातङ्गीश्वरीमूर्त्तये नमः' इस
मन्त्रात्मक शब्द का आन्तरिक भावन करने से देवी शक्ति की मूर्त्ति का भावन
हो जाता है। दूसरी बार सूत्र में पुनः श्रीं का उल्लेख है। इस मन्त्र के बीच
में 'श्रीं उक्त्वा' शब्द आया है। उसे हटाकर एक साथ 'श्रीमातङ्गीश्वर्यमृतचैतन्य-
मावाहयामि' बोलने पर एक मन्त्र बनता है। यह देवी के आवाहन का मन्त्र
माना जाता है।
आवाहन के बाद सोलह उपचारों से देवी का पूजन होना चाहिये। सोलह
उपचारों का वर्णन द्वितीय खण्ड के नवें सूत्र में किया गया है। वहाँ से देखना
चाहिये। आशुशुक्षणि अग्नि का पर्यायवाची शब्द है। अग्निकोण के लिये इसका
प्रयोग किया गया है। त्र्यक्ष का अर्थ त्रिनेत्र या त्रिलोचन होता है। ईशानकोण
के लिये इस शब्द का प्रयोग है। रक्षः राक्षस अर्थ वाचक शब्द है। यह निर्ऋति-
कोण के लिये प्रयुक्त है, निर्ऋति राक्षस ही है। वह दक्षिण-पश्चिम के मध्य कोण
में रहता है। इस कोण को नैऋत्यकोण कहते हैं। प्रभञ्जन वायु का पर्याय
शब्द है। वायु का कोण वायव्य कहलाता है। इन दिशाओं और विदिशाओं
में सर्वत्र व्याप्त देवी के मौलि भाग, मध्य भाग और चारों ओर अङ्गमय देवियों
की पूजा करने का विधान है।
साधक अपनी उपासना शक्ति से मातृशक्ति श्रीमातङ्गीश्वरी की मूर्त्ति की
कल्पना कैसे करता है? अपने औन्मनस और सामनस स्तर से माँ को कैसे
आवाहित करता है, यह सब अन्तर्याग के क्रम में सिद्ध गुरु ही जानता है,
दिशाओं-विदिशाओं में व्याप्त अङ्गशक्तियों की समन्त्रक पूजा का इस सूत्र में
सङ्केत मात्र है। यह सब गुरुगम्य औपासनिक रहस्य रूप ही है।
षडङ्गदेवियों की पूजा के मन्त्रों का उल्लेख संस्कृत व्याख्या में किया
जा चुका है। वहीं से उसका प्रयोग करने के लिये याद कर लेना चाहिये। पूरे
मन्त्र का उल्लेख भी इसी के साथ हो गया है।
जहाँ तक मन्त्र की वर्ण-संख्या का प्रश्न है, उसमें ३३ वर्ण दृष्टिगोचर
हो रहे हैं। सूत्र में अट्ठाइस सङ्ख्याओं का उल्लेख है। यह विरोध षोडशाक्षरी
श्यामाक्रमः १५५
में अन्तर्भूत पञ्चदशी के तीनों कूटों के एक वर्ण की तरह छः आदिवर्णों को
एक वर्ण और स्वाहान्त २७ वर्णों को मिलाकर अष्टाविंशत्यक्षर मानने पर मिट
जाता है॥२०॥
आवरणपूजा
पश्चादावरणपूजां कुर्यात् ।।२१।।
पश्चादितीदं सूत्रं व्यर्थमिव दृश्यते, तथापि तथा न मन्तव्यम्। तथा
हि— इदमावरणपूजोत्पत्तिवाक्यम्। अग्रिमवाक्यानि तदितिकर्तव्यता-
प्रपञ्चरूपाणि ।।२१।।
यह शङ्का नहीं करनी चाहिये कि, यह सूत्र अनावश्यक है। वस्तुतः यह
महत्त्वपूर्ण सूत्र आवरण-पूजा का मानो प्रवर्त्तन-सा करता हुआ प्रतीत हो रहा
है। यह तो एक प्रकार का 'उत्पत्तिवाक्य' ही है। आगे के एतद्विषयक सूत्र तो
मात्र इतिकर्त्तव्यता के प्रपञ्च मात्र हैं॥२१॥
अथ सर्वोपयोगिनीं काञ्चित् परिभाषामाह
सर्वचक्रदेवताऽर्चनानि वामकराङ्गुष्ठानामिकासन्दष्टद्वितीय-
शकलगृहीतश्रीपात्रप्रथमबिन्दुसहपतितैः दक्षकराक्षतपुष्पक्षेपैः
कुर्यात् ।।२२।।
सर्वचक्रदेवता गणपत्यादिपरान्ताः सामान्यपद्धत्या यक्ष्यमाणा अन्याश्च।
श्रीपात्रं विशेषार्घ्यपात्रम्। सहपतितैरित्यनेन बिन्दुपुष्पाक्षतयोः पतनम् एककाले,
इति सूचितम् ।।२२।।
‘गणपति’ से प्रारम्भ कर ‘परा’ पर्यन्त समस्त चक्र-देवता वर्ग का अर्चन
बाँयें हाथ के अँगूठे और अनामिका से दृढ़तापूर्वक गृहीत विशेषार्घ्य-पात्र से करे।
दक्ष हस्त के सहयोग से एक साथ जल-बिन्दुवों, फूलों और अक्षतों को नीचे
छोड़ने की विधि अपनाये॥२२॥
प्रथमावरणदेवतास्तत्स्थानं चाह
त्रिकोणे रतिप्रीतिमनोभवान् ।।२३।।
१५६ परशुरामकल्पसूत्रम्
अनुक्तत्वात् स्वाग्रादिप्रादक्षिण्यक्रमः। यद्वा आग्नेयकोणे, ततः
पश्चिमकोणे, तत ऐशाने तेनोदगपवर्गलाभः। इति प्रथमावरणम्॥२३॥
अर्चन क्रम में मन्त्र प्रयोग से सम्बन्धित नियम ध्यान में रखना चाहिये।
जब भी त्रिकोण में पूजन करना हो, तो देवता नाम के पहले त्रितारी का प्रयोग
अवश्य करें। दूसरी बात यह ध्यान देने की है कि, किस कोण से अर्चन आरम्भ
करना उचित है? सूत्र में उसका उल्लेख नहीं है। इसलिये गुरुदेव की आज्ञा
से, परम्परा से प्राप्त विधि के अनुसार ही पूजा प्रारम्भ करनी चाहिये। इसमें
व्याख्याकार दो बातें सामने रखते हैं—१. स्वाग्रप्रादक्षिण्य और २. अग्नि, पश्चिम
और ईशानकोण का क्रम। मन्त्र—
१. 'ऐं क्लीं सौः रतिश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः' इति अग्निकोणे।
२. 'ऐं क्लीं सौः प्रीतिश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः' इस मन्त्र से त्रिकोण
के अधःकोण में प्रीति देवी की पूजा करनी चाहिये।
३. 'ऐं क्लीं सौः मनोभवश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः' ईशानकोण में
मनोभव की पूजा करनी चाहिये। इस प्रकार प्रथमावरण पूजन पूरा
होता है॥२३॥
द्वितीयावरणपूजास्थानादिकं दर्शयति
पञ्चारमूले पुर आदिक्रमेण द्रां द्रावणबाणाय द्रीं शोषणबाणाय
क्लीं बन्धनबाणाय, ब्लूं मोहनबाणाय सः उन्मादनबाणाय नम इति
तदग्रे मायाकामवाग्ब्लूं स्त्रीमुपजुष्टाः काममन्मथकन्दर्पमकरकेतन-
मनोभवाः॥२४॥
'नमः' इति सर्वमन्त्रेष्वनुसज्जते। पुरः प्राची। मूले पञ्चारकोणमूले।
तदग्रे इति, पञ्चारकोणाग्रेष्वित्यर्थः। मायादिपञ्चकैः क्रमेण युक्ताः। कामादयः
पूज्या इत्यर्थः। मन्त्रस्वरूपं तु—ह्रीं कामश्रीपादुकां पूजयामि। एवमग्रेऽपि।
पूर्ववत् चतुर्थ्यन्तनमोऽन्तरहितं ज्ञेयम्। इति द्वितीयावरणम्॥२४॥
पाँच अरों से सम्पन्न पञ्च अरों के मूल अर्थात् अग्रभाग पर पाँच बाणों
की पूजा का निर्देश इस सूत्र में दिया गया है।
श्यामाक्रमः १५७
१. द्रां बीज के द्रावणबाण का चतुर्थीरूप द्रावणबाणाय शब्द लगाकर नमः
जोड़ना चाहिये। जैसे 'द्रां द्रावणबाणाय नमः' यह इसका मूलमन्त्र होता है।
इसमें आदि में 'ऐं क्लीं सौः' और चतुर्थ्यन्त और 'नमः' बीच में 'श्रीपादुकां
पूजयामि तर्पयामि नमः' भी लगाते हैं। यह परम्परा है। यह पूर्वकोण की
पूजा है।
२. 'ऐं क्लीं सौः द्रीं शोषणबाणाय श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः' यह मन्त्र
बनता है।
३. इसी तरह क्लीं बन्धनबाणाय नमः, ४. ब्लूं मोहनबाणाय नमः और
५. सः उन्मादनबाणाय नमः से ही पूजा करने पर पाँचों कोणों पर पञ्च
बाणों की पूजा सम्पन्न होती है। इसके बाद माया (ह्रीं) काम (क्लीं) वाग्
(ऐं) (ब्लूं) (स्त्रीं) से युक्त काम, मन्मथ, कन्दर्प, मकरकेतन, मनोभव इन
पाँच नामों के साथ त्रितारीयुक्त मन्त्र बनाकर पूजा करनी चाहिये।
उदाहरणरूप प्रथम मन्त्र जैसे—'ऐं क्लीं सौः ह्रीं कामश्रीपादुकां पूजयामि
तर्पयामि नमः'। इसी तरह 'क्लीं' से मन्मथ, ऐं से कन्दर्प, ब्लूं से
मकरकेतन, स्त्रीं से मनोभव के मन्त्र ऊहनपूर्वक बनाकर पूजा करनी चाहिये।
यह द्वितीय आवरण की पूजा मानी जाती है॥२४॥
तृतीयावरणपूजादेशादीनाह
अष्टदलमूले ब्राह्मी-माहेश्वरी-कौमारी-वैष्णवी-वाराही-
माहेन्द्री-चामुण्डा-चण्डिकाः सेन्दुस्वरयुग्मान्त्यादयः पूज्याः। तदग्रे
लक्ष्मी-सरस्वती-रति-प्रीति-कीर्त्ति-शान्ति-पुष्टि-तुष्टयः ॥२५॥
इन्दुना अनुस्वारेण, सहिता ये स्वरयुग्मेषु अं आं, इं ईं, उं ऊं, ऋं
ॠं, लं लूं, एं ऐं, ओं औं, अं अः, इत्यष्टसु अन्त्याः आं ईं ऊं ॠं लूं
ऐं औं अः इत्यष्टौ वर्णा आदौ एभिः क्रमेण युक्ता ब्राह्म्यादयः पूज्याः।
मन्त्रस्वरूपं यथा—आं ब्राह्मीश्रीपादुकां पूजयामि इति। तदग्रे इति अष्टदलाग्रे
इत्यर्थः। इति तृतीयावरणम् ॥२५॥
अष्टदल कमल के पूर्व दल के अग्रभाग से ब्राह्मी के क्रम से आठों दलों
पर आठ देवशक्तियों की पूजा की जाती है। सेन्दु का अर्थ अनुस्वारयुक्त होता
१५८ परशुरामकल्पसूत्रम्
है। सोलह स्वरों में आठ स्वर युग्म (अर्थात् युगल या जोड़ा) होते हैं। इन
स्वरयुगलों के अन्त आठ 'आ' 'ई' 'ऊ' 'ॠ' 'लॄ' 'ऐ' 'औ' और 'अः' यदि
अनुस्वारयुक्त हो जाँय, तो 'आं' 'ईं' 'ऊं' 'ॠं' लॄं' 'ऐं' 'औं' और 'अंः' ये
आठ दीर्घ सेन्दु स्वर होते हैं। एक-एक शक्तियों के साथ लगाकर मन्त्र बनाने
का निर्देश सूत्रकार देते हैं। इसी क्रम में सूत्रनिर्दिष्ट आठों देवियों की पूजा भी
करनी चाहिये। उदाहरणरूप एक ब्राह्मी देवी का मन्त्र इस प्रकार बनाना
चाहिये—
१. 'ऐं क्लीं सौः 'आं' ब्राह्मीश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः'। इसी तरह अन्य
सात देवियों के क्रमिक मन्त्र बनते हैं।
२. लक्ष्मी आदि उपदेवियों के लिये उदाहरणरूप एक मन्त्र इस प्रकार बनता
है—'ऐं क्लीं सौः लक्ष्मीश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः'। गुह्य मन्त्र से
लक्ष्मी की पूजा होती है। इसी तरह क्रमशः सातों की पूजा सम्पन्न होती
है। यह तृतीयावरण पूजा है॥२५॥
चतुर्थावरणपूजास्थानान्याह
षोडशदले वामा-ज्येष्ठा-रौद्री-शान्ति-श्रद्धा-सरस्वती-क्रिया-
शक्ति-लक्ष्मी-सृष्टि-मोहिनी-प्रमथिनी-आश्वासिनी-वीची-विद्युन्-
मालिनी-सुरानन्दा-नागबुद्धिकाः ॥२६॥
अत्र क्रियाशक्तिः, विद्युन्मालिनी, सुरानन्दा इत्येकैका देवताः। शेषा
देवताः स्पष्टाः। क्रमस्यानुक्तत्वाद् देव्यग्रदलमारभ्य प्रादक्षिण्येन। इति
चतुर्थावरणम् ॥२६॥
सोलह दल वाले कमलों के दलों पर यह पूजा की जाती है। क्रम अनुक्त
होने के कारण देवी के अग्रदल से दक्षक्रम से पूजा प्रारम्भ की जाती है।
क्रियाशक्ति, विद्युन्मालिनी और सुरानन्दा एक-एक देवी के ही नाम हैं। इनकी
पूजा के लिये उदाहरणरूप एक मन्त्र इस प्रकार है—'ऐं क्लीं सौः वामा
श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः'। इसी तरह १६ देवियों के सोलह मन्त्रों से
चौथे आवरण की पूजा पूरी होती है॥२६॥
श्यामाक्रमः १५९
पञ्चमावरणदेशादीनाह
अष्टदले असिताङ्ग-रुरु-चण्ड-क्रोधन-उन्मत्त- कलाप-भीषण-
संहाराः सदण्डिस्वरयुग्मादिसंयुक्ता भैरवान्ताश्च भावनीयाः ॥२७॥
सदण्डीत्यत्र दण्डी अनुस्वारः 'दण्डी पञ्चदशः शून्यः' इति मेदिनी-
कोशात्। अनुस्वारेण सहिता ये पूर्वोक्तस्वरयुग्मादय आदौ तैर्युक्त्वा भैरवान्ताश्च
ये मन्त्रास्तैः पूज्या इत्यर्थः। यथा अं असिताङ्गभैरवश्रीपादुकां पूजयामि।
एवमेवाग्रिमसप्तमन्त्रा ऊह्याः। इति पञ्चमावरणम् ॥२७॥
दूसरे अष्टदल कमल के दलों पर सदण्डि अर्थात् अनुस्वारयुक्त षोडश
स्वरों के युग्म-युग्म भाग के आदि अक्षरों के साथ भैरवदेवों की पूजा का विधान
है। उदाहरण रूप प्रथम मन्त्र—'ऐं क्लीं सौः अं असिताङ्ग'भैरवश्रीपादुकां
पूजयामि तर्पयामि नमः' इस प्रकार का बनेगा। इसी प्रकार इं रुरु, उं चण्ड,
ऋं क्रोध, लूं उन्मत्त, एं कपाल, ओं भीषण, अं संहार भैरव के मन्त्रों का भी
ऊहन करना चाहिये ॥२७॥
षष्ठावरणदेवतामन्त्रादीनाह
चतुर्दलं मायूक्ततङ्गी सिद्धलक्ष्मीश्च महामायुक्ततङ्गी महासिद्ध-
लक्ष्मीश्च ॥२८॥
उभयत्रयुक्तेति ज्ञेयम्। तथा च मातङ्गी महामातङ्गीति सिद्धम्। शेषं
स्पष्टम्। मातङ्गी सिद्धलक्ष्मी, महामातङ्गी महासिद्धलक्ष्म्यश्चतस्रः पूज्या इति
विवेकः। इति षष्ठावरणम् ॥२८॥
इस आवरण-पूजन में केवल चार देवियों की पूजा त्रितारी के साथ की
जाती है। चार दलों पर चार देवियों की पूजा करनी चाहिये। उदाहरणस्वरूप
मन्त्र 'ऐं क्लीं सौः मातङ्गीश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः' बनता है। इसी तरह
सिद्धलक्ष्मी, महामातङ्गी, और महासिद्धलक्ष्मी पूजन का भी विधान है। यह छठें
आवरण की पूजा है। ॥२८॥
सप्तमावरणपूजामाह
गंगणपति, दुंदुर्गा, बंबटुक, क्षंक्षेत्रपालाः चतुरस्रे
सम्पूज्याः ॥२९॥
१६० परशुरामकल्पसूत्रम्
क्रमस्तु आग्नेयकोणमारभ्यैशानान्तकोणे इति सप्तमावरणम् ॥२९॥
सातवें आवरण में चतुरस्र के अग्निकोण से 'ऐं क्लीं सौः गं गणपति-
श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः' ऐसे गणपति मन्त्र से गणपति की पूजा करनी
चाहिये। इसी तरह निऋति में 'दुं' बीज सहित दुर्गा की, वायव्य में बं बीज
सहित बटुक की और ईशान में 'क्षं' बीज सहित क्षेत्रपाल की पूजा करनी
चाहिये। यह सप्तमावरण की पूजा मानी जाती है॥२९॥
श्रीक्रमे तत्रान्तरे आम्नायादिदेवतावद् आवरणबहिर्भूतदेवतायजनमाह
'सां सरस्वत्यै नमः' इति प्रभृति 'वास्तुपतये ब्रह्मणे नमः'
इति-पर्यन्तं पुनस्तत्रैवाभ्यर्च्य ॥३०॥
तत्रैवेति पूर्वं यत्र न्यासोत्तरं पूजितास्तत्र तैरेव मन्त्रैः श्रीपादुकां पूजयामि
नमःसहितैः, यथा—सां सरस्वत्यै नमः सरस्वतीश्रीपादुकां पूजयामि नम इति।
एवमग्रेऽपि नमःपदान्ते श्रीपादुकामिति योगस्तु सूत्रे नमोऽन्तानुकरणेन
सूचितः ॥३०॥
इसी क्रम के सूत्र १४ में पहले सरस्वती, लक्ष्मी, शङ्खनिधि, पद्मानिधि,
इन्द्र, अग्नि, यम, निऋति, वरुण, वायु, सोम, ईशान, ब्रह्मा, विष्णु और
वास्तुपति की एकादश दिशाओं की पूजा का उल्लेख है। उसी क्रम को यहाँ
भी अपनाना चाहिये॥३०॥
श्रीश्यामाविद्याप्रवर्त्तकाचार्यपूजां तेषां स्थानान्याह
हंसमूर्त्तिपरप्रकाशपूर्णनित्यकरुणसम्प्रदायगुरूँश्चतुरस्रपूर्वरिखा-
यामभ्यर्च्य ॥३१॥
हंसमूर्त्तिश्च, परप्रकाशश्च, पूर्णश्च, नित्यश्च, करुणश्च ये ते
सम्प्रदायगुरुवस्तान् चतुरस्रपूर्वरिखायाम्। उदगपवर्गं पूजयेद् इति तदर्थः।
मन्त्रस्वरूपञ्च 'हंसमूर्त्तिसम्प्रदायगुरुश्रीपादुकां पूजयामि। एवमग्रिममन्त्रेष्वपि
सम्प्रदायगुरु इति योज्यम्, द्वन्द्वान्ते श्रूयमाणं प्रत्येकं सर्वत्र सम्बन्ध्यत इति
न्यायात् ॥३१॥
श्यामाक्रमः १६१
हंसमूर्त्ति, परप्रकाश, पूर्ण, नित्य और करुण गुरु सम्प्रदाय प्रवर्त्तक गुरु
हैं। द्वन्द्व समास के अन्त में सम्प्रदाय गुरु शब्द का प्रयोग सभी के साथ लगाने
का नियम है। मन्त्र का उदाहरण सूत्रानुसार 'हंसमूर्त्ति-सम्प्रदाय-गुरुश्रीपादुकां
पूजयामि नमः' इस प्रकार का होगा। इसमें भी त्रितारी और कुमारी प्रयोग किया
जा सकता है। तर्पयामि शब्द का प्रयोग भी परम्परा में है।।३१।।
एवं चक्रपूजां समाप्य गुरुपादुकापूजामाह
स्वशिरसि सामान्यविशेषपादुके अभ्यर्चयेत् ।।३२।।
सामान्यगुरुपादुकामन्त्रो दीक्षाखण्डे प्रतिपादितः। विशेषगुरुपादुकामन्त्रः
चरमखण्डे श्यामागुरुपादुके(सू.४४)त्युद्धृतः। ताभ्यां मन्त्राभ्यां स्वशिरसि
पादुकाद्वयं पूजयेत् ।।३२।।
गुरुदेव की चरणपादुकायें अभिव्यक्त रहस्यमयी शक्तियाँ मानी जाती हैं।
इन्हें अपने शिर पर रखने से और सामान्य-विशेष मन्त्रमय पूजन से शिष्य के
शरीर में दिव्यता का सञ्चार होता है। सामान्य मन्त्र का उल्लेख दीक्षा-खण्ड
के सूत्र ४१ में वर्णित है।
सामान्य पादुका मन्त्र में त्रितारी कुमारी और ऐं ग्लौं इतना जोड़कर
'हस्खफ्रें हसक्षमलवरयूं सहक्षमलवरयीं हसौः सहौः, मन्त्र बोलते हैं। विशेष पूजा
में त्रितारी 'ऐं ग्लौं' नहीं लगाते हैं। इस पर ध्यान देना चाहिये ।।३२।।
एवं गुरुपादुकार्चना-आवरणपूजामुक्तवा प्रधानदेवतापूजापुरःसरं बलिदानं
विवृणोति
पुनर्देवीमभ्यर्च्य बालया षोडशोपचारान् विधाय ।।३३।।
मूलेनेति शेषः। पुनरित्यनेन षडङ्गदेवताभ्यः प्राक् प्रधानदेव्यर्चनं
ज्ञापितम्। बालयेति स्पष्टम् ।।३३।।
आवरणपूजा और गुरुपादुका-पूजा के बाद पुनः देवी श्यामा की पूजा
करनी चाहिये। बाला मन्त्र से षोडशोपचार पूजन का क्रम अपनाना विधिविहित
है। षोडशोपचार में पाद्यार्घ्याचमनीय, स्नान, वस्त्र, गन्ध, पुष्प, धूप, दीप,
नैवेद्य, ताम्बूल, नीराजन, छत्र, चामर, दर्पण, आभूषण गृहीत हैं।।३३।।
१६२ परशुरामकल्पसूत्रम्
बलिदानप्रकारं दर्शयति
शुद्धजलेन त्रिकोणवृत्तचतुरस्रं विधायार्धान्नपूर्णसलिलसादि-
मोपादिममध्यमं सु(स)गन्धपुष्पं साधारं पात्रं निधाय ।।३४।।
शुद्धजलेन कलशस्थेन। अर्धान्नपूर्णं सलिलं यस्मिंस्तत्। आदिमं
प्रथमम्। उपादिमं द्वितीयं, मध्यमं तृतीयम्, एभिः सहितं सुगन्धपुष्पं यत्र,
ईदृशम् आधारसहितं बलिपात्रं निधाय स्थापयित्वा ।।३४।।
यहाँ शुद्ध जल से ही मण्डल-प्रकल्पन कर लेना चाहिये। कलशस्थित
जल ही शुद्ध जल माना जाता है। इसकी सामान्य पुष्पविकीर्णन से अर्चना करने
के उपरान्त साधार पात्र की स्थापना करे। उस पात्र को आधा अन्न और आधा
जल से आपूरित कर उस पात्र में गन्ध, पुष्प आदि का प्रक्षेप करे, जिससे
वहाँ का वातावरण आकर्षक और मनोहारी प्रतीत हो। जहाँ तक पात्र का प्रश्न
है, उसके सम्बन्ध में आदिम, उपादिम और मध्य शब्दों का पात्र के विशेषण
रूप में प्रयोग सूत्र में दिया गया है। अर्थात् तीन बलिपात्र अपेक्षित हैं।।३४।।
बलिदानमन्त्रान् तदितिकर्त्तव्यतां च दर्शयति
श्रीमातमुक्त्वा गीश्वरीमं बलिं गृह गृह हुं फट् स्वाहा।
श्रीमातमुक्त्वा गीश्वरि शरणागतं मां त्राहि त्राहि हुं फट् स्वाहा।
क्षेत्रपालनाथेमं बलिं गृह गृह फट् स्वाहा। इति मन्त्रत्रयेण
वामपाष्णिघातकरास्फोटसमुदञ्चित-वक्त्रनाराच-मुद्राभिः बलिं
प्रदाय ।।३५।।
श्रीमातमिति हुंफट् स्वाहेत्यन्तं मन्त्रत्रयम्। नाराचमुद्रा प्रसिद्धा ।।३५।।
१. प्रथम मन्त्र—ऐं क्लीं सौः श्रीमातङ्गीश्वरि इमं बलिं गृह गृह हुं फट् स्वाहा।
२. दूसरा मन्त्र—ऐं क्लीं सौः श्रीमातङ्गीश्वरि शरणागतं मां त्राहि त्राहि हुं फट्
स्वाहा।
३. तीसरा मन्त्र—ऐं क्लीं सौः क्षेत्रपाल नाथ इमं बलिं गृह गृह हुँ फट् स्वाहा।
इन मन्त्रों का क्रमशः पाठ करते हुए देवी के दक्षिण भाग में इन तीन
बलियों को अर्पित करना चाहिये। फिर बलि को दूध से नहलाना चाहिये। फिर
श्यामाक्रमः १६३
बायीं एड़ी के घात के साथ करास्फोट करते उत्तर ओर मुँह करके नाराच मुद्रा
से बलि अर्पित कर देना चाहिये।
इसके बाद में हाथ-मुँह धोकर माँ को प्रणाम करने के बाद अन्य कार्यों
में प्रवृत्त होना चाहिये॥३५॥
एवं बलिप्रदानक्रममुक्त्वा सुवासिनीपूजादिकमुपदिशति
श्यामलां शक्तिमाहूय बालया तामभ्यर्च्य तस्या हस्त
आदिमोपादिमौ दत्त्वा तत्त्वं शोधयित्वा तच्छेषमुररीकृत्य योग्यैः सह
हविःशेषं स्वीकुर्यात्।।३६।।
अभ्यर्च्येति विशेषानुक्तेः, यथाविभवम्। तत्त्वं शोधयित्वा इत्यनेन
तत्त्वशोधनमन्त्रा अपि प्राप्ताः। ते च मन्त्राश्चत्वारः प्रसिद्धाः। तैः पात्रचतुष्टयं
ग्राहयित्वा चतुर्थपात्रं सशेषं ग्राहयित्वा तच्छेषं स्वयम् उररीकुर्यात्।
हविश्शेषप्रतिपत्तिमाह—योग्यैरिति। योग्यपदार्थः श्रीक्रमोक्तशिष्टपदेन
व्याख्यातः। इत्थं च तस्य प्रयोजनं तदितिकर्तव्यता, तत् सर्वमपि श्रीक्रमोक्त-
प्रकारेणावगन्तव्यं भवति ।।३६।।
बलिक्रिया के अनन्तर श्यामला शक्ति का आवाहन कर बाला मन्त्र से
उसकी पूजा होनी चाहिये। पूजा के लिये सूत्रकार का स्पष्ट निर्देश है कि,
बाला से पूजा की जानी चाहिये। तत्त्वशोधन मन्त्र प्रसिद्ध है। दीक्षा प्रकरण
के सूत्र ३९ में इसकी चर्चा की गयी है। उन शक्तियों को सभी पात्र समर्पित
कर चतुर्थ पात्र का शेष अंश स्वयं ग्रहण करना चाहिये। खण्ड ५।२२ सूत्र
की व्याख्या में शिष्टशब्द की व्याख्या है। श्रीक्रम के अनुसार सारा समायोजन
उचित है ।।३६।।
एवं सङ्गीतमातृकापूजा कियत्कालं कर्त्तव्या, इत्याकाङ्क्षायां तदवधिमाह
एवं नित्यसपर्यां कुर्वन् लक्षजपं जप्त्वा तद्दशांशक्रमेण होम-
तर्पण-ब्राह्मणभोजनानि विदध्यात् ।।३७।।
एवमुक्तप्रकारेण नित्यसपर्यां नित्यपूजाम्, अत्र कुर्वन्नित्यनेन पूजनस्य
जपाङ्गत्वं गमयति। अतः जपः प्रधानं, तदवधित्वस्य पूजायां कथनात्। अत
१६४ परशुरामकल्पसूत्रम्
एव जपसमाप्तौ पूजानिवृत्तिः। लक्षजपं जप्त्वेति लक्षसंख्याविशिष्टजपोऽनेन
विधीयते। तद्दशांशक्रमेण होमो जपदशांशं, तद्दशांशं तर्पणम्, तद्दशांशं
ब्राह्मणभोजनम् ।।३७।।
सूत्रकार का यह निर्देश है कि, सपर्या नित्य करनी चाहिये। तदनन्तर
जप का विधान है। जप की संख्या भी एक लाख होनी चाहिये। ऐसा निर्देश
है। इस सन्दर्भ में यह ध्यान देना आवश्यक है कि, पूजा प्रधान नहीं होती।
प्रधान जप होता है और पूजा उसकी अङ्ग होती है। एक लाख जप, दश हजार
होम, १ हजार तर्पण और सौ ब्राह्मण भोजन का क्रम अपनाना चाहिये। श्यामा
मन्त्र जप करने वाले के लिये विशेष आचार पालन की भी पद्धति अपनानी
चाहिये ।।३७।।
अथैतन्मनुजापिधर्मानाह
एतन्मनुजापी न कदम्बं छिन्द्यात्, गिरा कालीति न वदेत्।
वीणावेणुनर्त्तन-गायन-गाथा-गोष्ठीषु च न पराङ्मुखो गच्छेत्।
गायकं न निन्द्यात् ।।३८।।
एते धर्मा न जपसमकालिकाः किन्तु जपमारभ्य यावज्जीवम् ।।३८।।
श्यामा मन्त्र जपकर्त्ता आरम्भ काल से जीवनपर्यन्त करे। वह कदम्ब वृक्ष
न काटे। 'काली' शब्द का उच्चारण मुख से न करे। वीणा, वंशा, मूर्च्छना,
नृत्य, संगीत, गाथा, गोष्ठी में रुचि ले। गायक और गायन की कभी निन्दा
न करे।।३८।।
एवं श्यामोपासकानां धर्मानुक्त्वा प्रसङ्गात् ललितोपासकधर्मानप्याह
ललितोपासको नेक्षुखण्डं भक्षयेत्, न दिवा स्मरेद् वार्त्तालीं,
न जुगुप्सेत सिद्धद्रव्याणि, न कुर्यात् स्त्रीषु निष्ठुरतां, वीरस्त्रियं न
गच्छेत्। न तां हन्यात्, न तद्द्रव्यमपहरेत्। नात्मेच्छया मपञ्चक-
मुररीकुर्यात्, कुलभ्रष्टैः सह नासीत, न बहु प्रलपेत्, योषितं
सम्भाषमाणामप्रतिसम्भाषमाणो न गच्छेत्, कुलपुस्तकानि गोपायेत्।
इति शिवम् ।।३९।।
श्यामाक्रमः १६५
इक्षुखण्डमित्यनेन तद्विकाराणाम् गुडशर्करादीनाम् अदोषः सूचितः।
वार्त्तालीं वाराहीम्। सिद्धद्रव्याणि मपञ्चकरूपाणि न जुगुप्सेत। स्वमनसाऽपि न
निन्द्याद् निष्ठुरतां नासिकाच्छेदनादि। वीरस्त्रियमिति षष्ठीतत्पुरुषः, न
कर्मधारयः। न तं हन्याद् इत्यत्र पुंस्त्वस्यानन्वयानुपपत्तेः। तं वीरं। तद्द्रव्यं
वीरद्रव्यम्। आत्मेच्छया स्वेन्द्रियतृप्तये। उररीकुर्यात् स्वीकुर्यात्। अप्रति-
सम्भाषमाणः प्रत्युत्तरमदत्त्वा कुलपुस्तकानि कुलशास्त्रपुस्तकानि।।३९।।
।। इति श्रीपरशुरामकल्पसूत्रे श्रीरामेश्वरनिर्मितायां सौभाग्योदयनाम्न्यां
श्रीपरशुरामकल्पसूत्रवृत्तौ (मुख्यांशमात्रायां) श्यामाक्रमो
नाम षष्ठः खण्डः सम्पूर्णः ।।६।।
ललितोपासक के आचार—
१. ऊख (गन्ना) न चूसे। २. दिन में वाराही का स्मरण न करे। ३.
मपञ्चक द्रव्यों की निन्दा न करे। ४. स्त्रियों के प्रति निष्ठुर न बने। नाक, कान
आदि का छेदन न करे। ५. वीरों की स्त्रियों को सहतल्पभागी न बनाये। वीर-
वध न करे। वीर द्रव्यों का अपहरण न करे। ६. अपनी इन्द्रियतृप्ति के लिये
मपञ्चक का उपयोग न करे। ७. कुलाचारहीन व्यक्ति के साथ कभी न रहे। ८.
बक बक न करे। ९. एक स्त्री बात करना चाहे या कर रही हो, तो उससे
स्वयं भी बातें करें। १०. कुल-पुस्तकों की रक्षा करे। ये आचार अत्यन्त
आवश्यक और अनिवार्य हैं। ललितोपासक को इन नियमों को मनोयोगपूर्वक
निभाना चाहिये।।३९।। इति शिवम् ।।
।। श्रीरामेश्वरकृत मुख्यांश-सौभाग्योदयवृत्तिसहित
डॉ. परमहंसमिश्रकृत नीर-क्षीर-विवेक भाषा-भाष्य-समन्वित
श्रीपरशुरामकल्पसूत्र का श्यामाक्रम नामक षष्ठ खण्ड परिपूर्ण ।।६।।
।। शुभं भूयात् ।।
वाराहीक्रमः
[ सप्तमः खण्डः ]
अथ वाराह्युपासनां वक्तुं प्रक्रमते
इत्थं साङ्गां सङ्गीतमातृकामिष्ट्वा संवित्साम्राज्ञी सिंहासना-
धिरूढाया ललिताया महाराज्ञा दण्डनायिकास्थानीयां दुष्टनिग्रह-
शिष्टानुग्रहनिर्गलाज्ञाचक्रां समयसङ्केतां कोलमुखीं विधि-
वद्वरिवस्येत् ।। १ ।।
इत्थं पूर्वोक्तप्रकारेण साङ्गां सावरणां सङ्गीतमातृकां मातङ्गीमिष्ट्वा
सम्पूज्य समुपास्य। अनेन सङ्गीतमातृकायागोत्तरकालस्य श्रीवाराह्युपासनाङ्गत्त्व-
मात्रं विधीयते। संविदः परशिवस्य वा साम्राज्ञी पट्टमहिषी तद्रूपायाः सिंहासनं
राज्ञः सदसि सर्वोत्तमत्वेनावस्थितमासनं तदधिरूढाया ललिताया महाराज्ञा
दण्डनायिकाया यत् स्थानं, तदीया स्वामिनी दुष्टनिग्रहाधिकारवती या ताम्।
दुष्टनिग्रहादौ निरर्गलम् अन्यानपेक्षं यदाज्ञाचक्रं तद्वतीम्। समयो गुप्तः सङ्केतः
शास्त्रपद्धतिर्यस्यास्तां 'समयो रहसि प्रोक्तः काले कार्यक्षमेऽपि वा' इति
त्र्यक्षरकोशः (विश्वकोषः)। कोलो वराहस्तस्य मुखमिव मुखं यस्यास्तां विधिवद्
वरिवस्येत् पूजयेत् ।।१।।
छठें खण्ड में सङ्गीतमातृका माता मातङ्गी की पूजा की चर्चा है। उस
विधान को पूरा करने के बाद ही वाराही उपासना की विधि अपनायी जानी
चाहिये। यहाँ इष्ट्वा में पूर्वकालिकक्रिया का प्रयोग है। अतः पूर्वकाल में
सङ्गीतमातृका मातङ्गी की उपासना प्रधान उपासना के रूप में पूरी कर लेने के
बाद ही अङ्गपूजा के रूप में वाराही माँ की पूजा करनी चाहिये। संवित् साम्राज्ञी
वाराहीक्रमः १६७
परशिवशक्तिमयी संविन्मयी पट्टमहिषी सिंहासनासीन राजराजेश्वरी ललिताम्बा की
दण्डनायिका माँ वाराही सर्वथा प्रणम्य और पूज्य हैं। दुष्टों को नियन्त्रित करने
और शिष्टों पर अनुग्रह करने के निरर्गल अधिकार से यह सम्पन्न हैं। अन्यानपेक्षा
आज्ञा के अधिकार से यह सम्पन्न हैं। अन्यानपेक्षा आज्ञा की अधिकारिणी कोल
के समान मुखवाली माँ वाराही की उपासना करनी चाहिये। यह अत्यन्त
रहस्यमयी समयसङ्केता विद्या है।।१।।
तत्र कथंभावाकाङ्क्षायामाह
तत्रायं क्रमो महारात्रे बुद्ध्वा स्वहृदयपरमाकाशे ध्वनन्त-
मनाहतध्वनिमूर्जितानन्ददायकमवमृश्य ।।२।।
तत्र वाराह्युपास्तावायं क्रमः प्रकारः। महारात्रे इति। धूर्त्तस्वामिभाष्ये
महारात्रिस्त्रिभागावशिष्टा रात्रिः। यद्वा महारात्रिः निशीथः। 'महारात्रिसमुत्पन्नः
कृष्णो गोपालनन्दनः' इति ब्रह्मवैवर्त्तात्। कृष्णजन्मार्धरात्रे इति प्रसिद्धत्वात्।
तस्मिन् समये बोधोत्तरकालीनक्रियामाह—स्वहृदयेति। स्वहृदयरूपो यः परम
उत्कृष्ट आकाशस्तस्मिन् ध्वनन्तं शब्दं कुर्वन्तम् अनाहतस्य द्वादशदल-
कमलस्य ध्वनिं कराभ्यां कर्णपिधाने श्रूयमाणे यः शब्दः सोऽनाहतशब्द
इत्युच्यते। स मध्यरात्रे कर्णपिधानाभावेऽपि अनुभूयते। कथंभूतम्? ऊर्जितः
सिद्धो य आनन्दस्तस्य दायकम्। अभिव्यञ्जकम् अवमृश्य अनुसन्धाय कञ्चित्
कालं श्रुत्वेत्यर्थः ।।२।।
वाराही की उपासना का यह निर्धारित क्रम है। 'महारात्र' एक योगरूढ
शब्द है। 'धूर्त्तस्वामी' नामक भाष्यकार ने इसके भाष्य के सन्दर्भ में 'महारात्र'
का एक विग्रह प्रस्तुत किया था। उसके अनुसार त्रिभागावशिष्ट रात्रिकाल ही
महारात्र मानना चाहिये। रात्रि की बारह घड़ी के समय को तीन भागों में बाँटने
पर और आठ घड़ी बीत जाने पर शेष चार घड़ी रात को महारात्र की संज्ञा
दी जाती है।
एक दूसरा अर्थ भी अभिप्रेत है। अर्धरात्रि को निशीथ कहते हैं। यह
निशीथ काल ही महारात्र काल है। ब्रह्मवैवर्त्तपुराण में यह उल्लेख है कि, भगवान्
श्रीकृष्ण महारात्रिकाल में उत्पन्न हुए थे। यह लोकप्रसिद्ध सत्य है। जन्माष्टमी
१६८ परशुरामकल्पसूत्रम्
की अर्धरात्रि में ही कृष्णजन्म मनाया जाता है। अर्धरात्रि का निशीथ समय चतुर्थ
सन्ध्या का पुण्यप्रद समय भी है। उपासक उस अवस्था का एकान्त सदुपयोग
करता है। उस समय श्रीविद्यासाधक को अनिवार्यतः जगे रहना चाहिये। जगकर
उस समय क्या करना चाहिये, इसका निर्देश कर रहे हैं—
शरीर की संरचना की ओर साधक का ध्यान आकृष्ट करते हुए सूत्रकार
कह रहे हैं कि, मनुष्य का हृदय एक आकाश है। यह परम उत्कृष्ट आकाश
है, उस द्वादशदल कमल रूप आकाश-देश से एक स्वाभाविक शब्द ध्वनित
होता रहता है। हाथों से कान दबा लेने पर वह विचित्र शब्द सुनाई पड़ता
है। वह मध्यरात्र में बाह्य शब्दों के शान्त रहने पर कान विना बन्द किये
भी सुनाई देता है। यह श्रवण एक प्रकार का श्रवणानुभव सदृश माना जाता
है। उस अनाहत शब्द की श्रुत्यनुभूति में एक प्रकार की आनन्दमयी ऊर्जा
का उल्लास होता है। ऐसे ऊर्जस्वल आनन्द को प्रदान करने वाली यह
अनाहत ध्वनि है। इसका अनुसन्धान साधक को उस समय अवश्य करना
चाहिये॥२॥
शिवादिगुरुनमस्कारः
‘शिवादिश्रीगुरुभ्यो नमः’ इति मूर्ध्नि बध्नीयादञ्जलिम् ॥३॥
शिवादि इति स्पष्टम् ॥३॥
आदिगुरु शिव माने जाते हैं। गुरुजनों के प्रणाम करने के अवसर पर
सर्वप्रथम शिव को ही नमस्कार करना चाहिये। इसके बाद अन्य गुरुजनों का
नमस्कार विहित है। प्रणाम करते हुए शिर पर अञ्जलि बाँधकर मस्तक झुकाने
का भी क्रम अपनाना चाहिये। इस प्रक्रिया में श्रद्धा का प्राधान्य रहना
चाहिये॥३॥
वाराहीपद्धतौ सर्वमन्त्रेषु बीजविशेषस्य योगमाह
वाचमुच्चार्य ‘ग्लौं’ इति च पद्धतावस्यां सर्वे मनवो
जप्याः ॥४॥
अस्यां पद्धतौ सर्वमन्त्रादौ, ‘ऐं ग्लौं’ इति योज्यमित्यर्थः ॥४॥
वाराहीक्रमः १६९
वाराही उपासना के क्रम में सर्वप्रथम जिस नियम पर ध्यान देना चाहिये,
वह है कि, वाक् अर्थात् 'ऐं' बीज मन्त्र के साथ 'ग्लौं' बीज का सभी मन्त्रों
के आदि में प्रयोग करना चाहिये॥४॥
अथ भूतशुद्धिं विधत्ते
मूलादिषण्मन्त्रैर्यथामन्त्रं लिङ्गदेहं शोधयेत् ॥५॥
मूलादिषण्मन्त्रैरधस्तन एव सूत्रे वक्ष्यमाणैः, यथामन्त्रैः, मन्त्रे तथा
लिङ्गदेहं सूक्ष्मदेहं शोधयेत् ॥५॥
आगे के मन्त्र में छः मूलादि मन्त्र कहे गये हैं। उनके अनुसार सूक्ष्मदेह
का शोधन करना चाहिये। यह शास्त्र का आदेश है॥५॥
तान् षण्मन्त्रान् आह
मूलशृङ्गाटकात् सुषुम्नापथेन 'जीवशिवं परशिवे योजयामि
स्वाहा' 'यं सङ्कोचशरीरं शोषय शोषय स्वाहा' 'रं सङ्कोचशरीरं दह
दह पच पच स्वाहा'। 'लं शाम्भवशरीरमुत्पादय स्वाहा'
'हंसः सोहमवतरावतर शिवपदात् जीवसुषुम्नापथेन प्रविश,
मूलशृङ्गाटकमुल्लसोल्लस ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल हंसः सोहं
स्वाहा' इति भूतशुद्धिं विधाय ॥६॥
स्वाहेत्यत्रैकमन्त्रसमाप्तिः। सुषुम्णामार्गेण परशिवे शिवयोजनशोषण-
दाहनाप्लावनशाम्भवशरीरोत्पत्ति-जीवस्वस्थाननयनानि क्रमेण षण्मन्त्रैः
कुर्यात्॥६॥
इस सूत्र में छः मन्त्रों के प्रयोग के साथ ही साथ भूतशुद्धि के सन्दर्भ
में जिस साधना-प्रक्रिया का उल्लेख किया गया है, वह उपासना को नव्य आयाम
देने वाला है। साधना का सारा सन्दर्भ इसमें है। इसे सम्पन्न कर लेने के बाद
दिव्यता की नयी भूमिका में उपासक प्रवेश कर जाता है।
१. सर्वप्रथम आसन पर विराजमान उपासक मूलाधार चक्र से सुषुम्णा
नाड़ी के मार्ग से अपने जीवशिव को परशिव में संयोजन करने की प्रक्रिया
१७० परशुरामकल्पसूत्रम्
अपनाता है। यह क्रिया मात्र ध्यान की कल्पना मात्र नहीं होती। यह सूत्रप्रोक्त
मन्त्र के माध्यम से चक्र-साधना में निष्णात व्यक्ति ही कर सकता है। जीवशिव
का परशिव में समायोजन औन्मनस दशा की परा भूमि पर ही सम्पन्न हो सकता
है, इस सम्बन्ध में अधिक कहना उचित नहीं। इस प्रथम प्रक्रिया का मन्त्र है—
‘जीवशिवं परशिवे योजयामि स्वाहा’। दूसरी प्रक्रिया इस ज्ञान पर आधारित है
कि, सङ्कोच से मिला यह शरीर पराविद्या प्राप्ति के लिये पर्याप्त नहीं है। इसलिये
इसमें आयी संकोच की आर्द्रता सूख जाय, इसे जला दिया जाय, जले भस्म
को शिवामृत प्रवाह में बहा दिया जाय, तब शाम्भव शरीर को उत्पादित कर
जीवशिव को शिवपद से उसी शाम्भव शरीर में प्रवेश करा दिया जाय। उसी
नवनिष्पन्न प्रकाशमान शाम्भव शरीर की दिव्यता में स्वात्म को प्रतिष्ठित कर
माँ की उपासना की जाय। यह सब प्रकल्पन की क्रिया होती है और बड़ी
महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया है। इसमें पाँच मन्त्रों द्वारा पाँच प्रकार के प्रकल्पन हैं, जो
क्रम इस प्रकार है—
२. शोषण—‘यं सङ्कोचशरीरं शोषय शोषय स्वाहा’।
३. दाहन—‘रं सङ्कोचशरीरं दह दह पच पच स्वाहा’।
४. आप्लावन—‘वं परमशिवामृतं वर्षय वर्षय स्वाहा’।
५. शाम्भवशरीरोत्पादन—‘लं शाम्भवशरीरमुत्पादयोत्पादय स्वाहा’।
६. जीवस्वस्थानानयन—‘हंसः सोऽहमवतरावतर शिवपदाज्जीवसुषुम्णापथेन-
प्रविश मूलशृङ्गाटकमुल्लसोल्लस ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल हंसः सोहं
स्वाहा’।
इन मन्त्रों के द्वारा गुरुनिर्दिष्ट क्रमानुसार स्वात्म को दिव्य बना लेना
आवश्यक है। इसके बाद ही आगे की उपासना-प्रक्रिया अपनायी जाती है ।।६।।
अथ मातृकासम्पुटिताभ्यां बीजाभ्यां न्यासमाह
[L25
वाराहीक्रमः १७१
मातृकाभिः आदिक्षान्तैः सम्पुटितां द्वितारीप्रकृतत्वाद् ऐं ग्लौं। तद्यथा
आदिक्षान्तं प्रथमं सबिन्दु उच्चार्य मध्ये ऐं ग्लौं इति वर्णबीजद्वयं पुनरपि
आदिक्षान्तं ततो नमःपदं न्यासरूपत्वात्। एवं वक्ष्यमाणैकचत्वारिंशत्स्थानेषु
न्यसेदित्यर्थः। कं शिरः 'कं शिरोऽम्बुनोः' इत्यमरः। आननवृत्तं मुखवृत्तम्,
अक्षिद्वयं, श्रोत्रद्वयं, नासाद्वयम्, गण्डद्वयम्, ओष्ठद्वयं, दन्तपक्तिद्वयम्, मूर्धा
(शिरोरन्ध्र) आस्यं गुहारूपं, दोर्द्वयं, पादसन्धिद्वयं, पादाग्रद्वयं, पृष्ठः, नाभिः,
जठरं, कुक्षिः, हृद्वक्षः, दोर्मूलं, गलस्यापरभागः, पाश्चात्यदेशः, कक्षः,
पुनर्वामपार्श्वे हृदादिकक्षपर्यन्तं पाणिद्वयं, पादद्वयं, पुनर्जठरं, पुनराननम्, एवम्
एकचत्वारिंशत्स्थाने मातृकासम्पुटितां द्वितारीं न्यसेत् ॥७॥
अ से क्ष पर्यन्त ५० वर्णों की मातृका के प्रत्येक वर्ण में बिन्दु लगाकर
बोलने के बाद वार्त्ताली बीज 'ऐं ग्लौं'—बोलकर पुनः मातृका के अ क्ष वर्ण
सबिन्दु बोले जाने पर एक सम्पुट मन्त्र बनता है। ऐसे मन्त्र को इकतालीस
बार इकतालीस अङ्गों पर बोलकर नमः के साथ न्यास करना चाहिये। इकतालीस
शरीर के अङ्ग सूत्र में निर्दिष्ट हैं—
१ शिर, १ मुखवृत्त, २ नेत्र, २ कर्ण, २ नासापुट, २ कपोल, २ ओष्ठ,
२ दन्तपङ्क्ति, १ ब्रह्मरन्ध्र, १ मुखान्त, २ दोर्मूल, २ मध्यसन्धि, २ मणिबन्ध,
२ अङ्गुल्यग्र, २ उरुमूल, २ जानु, २ पादसन्धि, २ पार्श्व, १ नाभि, १ पृष्ठ,
१ जठर, १ वक्ष, २ हाथ, २ पाद, १ हृदादि-मूर्द्धान्त कुल मिलकर ४१
होते हैं॥७॥
अङ्गुलिन्यासः
अन्धेप्रभृति सप्तार्णपञ्चकमङ्गुष्ठादि-कनिष्ठान्तम् ।।८।।
अत्रापि पूर्वसूत्राद्विन्यस्येत्यस्यानुवृत्तिः। 'अन्धे अन्धिनि नमः' इत्यादि।
'स्तम्भे स्तम्भिनि नमः' इत्यन्तैः पञ्चभिः सप्तार्णमन्त्रैरङ्गुष्ठादिकनिष्ठान्त-
क्रमेण विन्यस्य। मन्त्रस्वरूपं तु—अन्धे अन्धिनि नमः अङ्गुष्ठाभ्यां नमः।
एवमग्रेऽप्यूह्यम्। इत्यङ्गुलिन्यासः ॥८॥
अङ्गुलियों पर न्यास करने के पहले मूलमन्त्र के पहले का भाग वाराहमुखि
तक बोलकर—
१७२ परशुरामकल्पसूत्रम्
१. अन्धे अन्धिनि नमः अङ्गुष्ठाभ्यां नमः,
२. रुन्धे रुन्धिनि नमः तर्जनीभ्यां नमः,
३. जम्भे जम्भिनि नमः मध्यमाभ्यां नमः,
४. मोहे मोहिनि नमः अनामिकाभ्यां नमः और
५. स्तम्भे स्तम्भिनि नमः कनिष्ठिकाभ्यां नमः बोलकर 'अस्त्राय फट्' तक मन्त्र
पूरा कर देना चाहिये। १ से ५ तक के सभी मन्त्र सात-सात अक्षरों के हैं।
इसीलिये इन्हें सप्तार्ण मन्त्र कहते हैं॥८॥
अथ हृदयादिन्यासः
वाङ्नमो भगवतीत्यारभ्य त्रयोदशभिर्हृदयं षड्भिः शिरः,
दशभिः शिखां, सप्तभिः सप्तभिः कवचनेत्रास्त्राणि विन्यस्य।।९।।
वागित्यारभ्य मूलमन्त्रत्रयोदशादिमवर्णैर्हृन्मन्त्रसहितैः शिखायाम्, तदग्रि-
सप्तवर्णैः कवचमन्त्रसहितैः नेत्रेषु, तदग्रिमसप्तवर्णैः अस्त्रमन्त्रसहितैः अस्त्रं च
विन्यसेत्। मन्त्रस्वरूपं यथा—ऐं ग्लौं ऐं नमो भगवति वार्त्तालि वार्त्तालि
हृदयाय नमः। एवमग्रेऽपि योज्यम्। इति हृदयादिषडङ्गन्यासः ॥९।।
हृदयादि न्यास का विधान इस सूत्र में दिया गया है। सर्वप्रथम द्वितारी
का प्रयोग कर सूत्र के अनुसार वाग्बीज 'ऐं' का उच्चारण करना चाहिये। पुनः
मूलमन्त्र के १३ वर्णों से हृदय में, छः वर्णों से शिर पर, दश वर्णों से शिखा
में, तथा सात-सात से कवच, नेत्र और अस्त्र में विन्यास होना चाहिये। मन्त्रों
का स्वरूप इस प्रकार होना चाहिये—
१. ऐं ग्लौं ऐं नमो भगवति वार्त्तालि वार्त्तालि हृदयाय नमः।
२. ऐं ग्लौं वाराहि वाराहि शिरसे स्वाहा।
३. ऐं ग्लौं वराहमुखि वराहमुखि शिखायै वषट्।
४. ऐं ग्लौं अन्धे अन्धिनि नमः कवचाय हुम्।
५. ऐं ग्लौं रुन्धे रुन्धिनि नमः नेत्रत्रयाय वौषट्।
६. ऐं ग्लौं जम्भे जम्भिनि नमः अस्त्राय फट्।
इस तरह मूल मन्त्र से हृदयादि न्यास का विधान सूत्रानुसार पूरा
होता है ॥९॥
वाराहीक्रमः १७३
आत्मालङ्करणम्
गन्धादिभिरलङ्कृत्य अर्घ्यं शोधयेत् ॥१०॥
आदिपदेन शस्त्रभूषणादिपरिग्रहः। आत्मानमिति शेषः। अर्घ्यं शोधये-
दित्यस्य अग्रिमसूत्रेण सहान्वयः॥१०॥
वस्तुतः यह सूत्र ग्यारहवें सूत्र का पूरक सूत्र है। इसमें किसी प्रक्रिया
अथवा विधि की चर्चा नहीं है। अर्घ्यशोधन के पूर्व साधक को स्वयं आकर्षक
रूप से सजा लेना चाहिये। कपड़े सुन्दर हों, गहने के रूप में गले में स्वर्णमाला,
अङ्गुलिभाग में अँगूठियाँ आदि पहन लेनी चाहिये। इसके बाद अर्घ्य का शोधन
होता है॥१०॥
अथ अर्घ्यशोधनमाह
आत्मनोऽग्रभागे गोमयेन विलिप्ते, हेतुमिश्रितजलेन चतुरस्रं
वर्त्तुलं षट्कोणं त्रिकोणमन्तरान्तरं विलिख्य, अर्घ्यशोधनमनुभिः
श्यामाक्रमोक्तैः आधारार्घ्यपात्राणि संशोध्य सामान्येनाभ्यर्च्य तदर्घ्यं
वषडित्युद्धृत्य, स्वाहेति संस्थाप्य हुं इत्यवकुण्ठ्य वौषट्
इत्यमृतीकृत्य फडिति संरक्ष्य, नमः पुष्पं निक्षिप्य, मूलेन निरीक्ष्य,
तत्पृषतैः पावयित्वा सपर्यावस्तुनि ॥११॥
हेतुमिश्रितेन प्रथममिश्रितेन। चतुरस्रादिमण्डलं प्रवेशरीत्या, चतुरस्रस्य
सर्वबाह्यत्वेन भूरिदर्शनात्। अनन्तरान्तरं परस्परमसंलग्नं यथा तथा मण्डलं
कुर्यात्। अत्र विशेषांशमुक्त्वा शेषधर्मानतिदिशति-अर्घ्यशोधनेनेति। सामान्येन
समस्तमूलमन्त्रेण। शेषं स्पष्टम्। तदर्घ्यं सपर्यावस्तूनीत्यन्तं स्पष्टोऽर्थः।
एतावत्पर्यन्तं विहितमर्घ्यशोधनं सामान्यविशेषार्घ्ययोः समानम्
अविशेषेणोक्तेः ॥११॥
गोमय से लिपी-पुती भूमि अत्यन्त पवित्र मानी जाती है। उसी भूमि पर
हेतु द्रव्यमिश्रित जल से चतुरस्र वर्त्तुल षट्कोण त्रिकोण मण्डल का इस प्रकार
निर्माण होना चाहिये कि, वे एक-दूसरे से बिना स्पर्श किये अन्तर-अन्तर पर
रहें। अर्घ्यशोधन के मन्त्रों से श्यामाक्रम के अनुसार शोधन करते हैं। यह ठीक