परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
पृष्ठ 115, कुल 320 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्रीक्रमः ७३
त्रितारीं वक्ष्यमाणामुक्त्वा नम इत्यन्तमुच्चरेत्। अनेन भूमौ पुष्पाञ्जलिं
दद्यात्। पुष्पाणामञ्जलिगृहीतानां प्रचयः पुष्पाञ्जलिः।।७।।
त्रितारी तीन शाक्त ओङ्कारवान् बीज मन्त्र हैं। उनकी यथावसर चर्चा की
गयी है। इन तीन शाक्त बीजों के उच्चारण के बाद नमः तक का उच्चारण
करना चाहिये। अर्थात् त्रितारी + नमः। यह मन्त्र दीपनाथ की प्रतिष्ठा के संवर्धन
में प्रयुक्त होता है। इस मन्त्र के कहने के बाद अञ्जलि में रखे पुष्पचय का
भूमि में परित्याग कर देना चाहिये। अगस्त्य-संहिता नामक महान् ग्रन्थ में लिखा
गया है कि, दोनों बँधी अञ्जलियों के मध्य में जो फूल रखे हुए हैं, वे
पुष्पाञ्जलि के पुष्प कहलाते हैं।।७।।
सर्वमन्त्रोपयुक्तां काञ्चित् त्रितारी-परिभाषामाह
सर्वेषां मन्त्राणामादौ त्रितारीसंयोगः। त्रितारी वाङ्माया-
कमलाः ।।८।।
सर्वेषामित्यत्र सर्वशब्दस्य प्रकरणेन श्रीविद्योपास्यङ्गभूतानामेतदुत्तर-
पठितानाम् इत्यर्थः। तेनैतत्पूर्वमन्त्रेषु त्रितारीयोगो नास्ति। आदौ इत्यनेनान्त-
व्यावृतिः। योग इति वक्तव्ये समित्युपसर्गेण त्रितार्युच्चारः स्पष्टमभूत् त्रितारी
वाक् सबिन्दुः द्वादशः स्वरः। माया तुरीयोष्मसहितद्वितीयान्तःस्थोत्तरसबिन्दु-
स्तुर्यस्वरः। कमला प्रथमोष्मसहितद्वितीयान्तःस्थोपरि सबिन्दुस्तुर्यस्वरः।।८।।
श्रीविद्योपासना के अङ्ग और इस सूत्र के बाद आये हुये मन्त्रों में त्रितारी
बीजमन्त्रों का योग अनिवार्यतः आवश्यक माना जाता है। अर्थात् पहले कहे गये
मन्त्रों में त्रितारी संयोग आवश्यक नहीं माना जाता। सम् उपसर्ग के आधार पर
त्रितारी बीजों के व्यवहार में सावधान रहना चाहिये। त्रुटि या स्खलिति होने पर
पुनः स्पष्ट उच्चारण करना चाहिये। त्रितारी के बीज मन्त्रों का उद्धार इस प्रकार
किया जाता है—
१. वाक्— बारहवाँ स्वर + बिन्दु।
२. माया— चतुर्थ ऊष्मवर्ण + द्वितीय अन्तःस्थ वर्ण (र्) + चतुर्थ स्वर
(ई) + बिन्दु।