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पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation

महर्षि पराशर द्वारा

स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished170 पृष्ठ

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पृष्ठ 90

७४ पराशरस्मृतिः [ अष्टमो-
उद्धरेद् दीनमात्मानं समर्थो धर्ममाचरेत् ।
आपत्काले तु निस्तीर्णे १शौचाऽऽ चारंविचिन्तयेत् ।
शुद्धिं समुद्धरेत् पश्चात् स्वस्थो२ धर्मं समाचरेत् ॥४२॥
इति पाराशरीये धर्मशास्त्रे द्रव्यशुद्धिर्नाम सप्तमोऽध्यायः ॥७॥
अपने दीन आत्मा का उद्धार करना चाहिए । विपत्ति को पार कर
लेने पर, शौचाचार की चिन्ता करनी चाहिए । आपत्काल के अनन्तर
ही अपनी शुद्धि करे । फिर स्वस्थ होने पर धर्माचरण करे ॥४॥
इस प्रकार आचार्य पण्डित शिवदत्तमिश्र शास्त्रिकृत 'शिवदत्ती' भाषाटीका में
पराशरप्रोक्त धर्मशास्त्र में सप्तम अध्याय समाप्त । ७॥
*
८. अष्टमोऽध्यायः
गवां बन्धनयोक्त्रेषु भवेन्मृत्युरकामतः ।
अकामकृत पापस्य प्रायश्चित्तं कथं भवेत् ? ॥ १ ॥
यदि गौ अथवा बैल की मृत्यु अनजान में खूँटे में बांधने अथवा
जूआ आदि में जीतने से हो जाये तो उसका प्रायश्चित्त किस प्रकार
करना चाहिए ? ॥१॥
वेद-वेदाङ्गविदुषां धर्मशास्त्रं विजानताम् ।
स्वकर्मरतविप्राणां स्वकं पापं निवेदयेत् ॥ २ ॥
ऐसे पुरुष को उचित है कि वह वेद, वेदांग तथा धर्मशास्त्र के जानने
वाले एवं स्वकर्म धर्मानुष्ठान में निरत तपस्वी ब्राह्मणों के पास जाकर
अपना पाप बतलावे ॥२॥
१. शौचाचारं न चिन्तयेत्' इति क्वचित्पुस्तके । २. 'समर्थो धर्ममाचरेत्' इति ।