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पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation

महर्षि पराशर द्वारा

स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished170 पृष्ठ

पृष्ठ 89, कुल 170 में से

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पृष्ठ 89

ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता ७७,
स्त्रियो वृद्धास्तथा बालाः न दुष्यन्ति कदाचन ।
क्षुते निष्ठीवने चैव दन्तोच्छिष्टे तथाऽनृते ॥३७॥
इसी प्रकार स्त्री, बालक तथा वृद्ध ये भी कभी दूषित नहीं होते ।
छींकने पर, थूकने पर, दाँत में जूठा रह जाने पर तथा अकस्मात् झूठ
बोल देने पर, ॥३७॥
पतितानां च सम्भाषे दक्षिणं श्रवणं स्पृशेत् ।
अग्निरपश्च वेदाश्च सोम-सूर्या-ऽनिलास्तथा ॥३८॥
पतितों से संभाषण करने पर ब्राह्मण सदैव अपने दाहिने कान का
स्पर्श करे । क्योंकि अग्नि, जल, वेद, चन्द्रमा, सूर्य, वायु आदि
देवता, । ८॥
एते सर्वेऽपि विप्राणां श्रोत्रे तिष्ठन्ति दक्षिणे ।
प्रभासादीनि तीर्थानि गङ्गाद्याः सरितस्तथा ॥३९॥
प्रभास आदि श्रेष्ठ तीर्थ तथा गङ्गादि उत्तम-उत्तम नदियाँ ॥३९॥
विप्रस्य दक्षिणे कर्णे सान्निध्यं मनुरब्रवीत् ।
देशभङ्गे प्रवासे वा व्याधिषु व्यसनेष्वपि ॥४०॥
ब्राह्मण के दक्षिण कर्ण में निवास करती हैं, ऐसा मनु का कथन है ।
देश में विप्लव होने पर, विदेश में, व्याधि और व्यसन में, ॥४०॥
रक्षेदेव स्वदेहादि पश्चाद्धर्म समाचरेत् ।
येन केन च धर्मेण मृदुना दारुणेन वा ॥४१॥
सर्वप्रथम अपने शरीर की रक्षा करे । पश्चात् धर्म करे । पुरुष को
जिस किसी भी कोमल या कठोर उपाय से विपत्ति में पड़े हुए ॥४१॥