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पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation

महर्षि पराशर द्वारा

स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished170 पृष्ठ

पृष्ठ 91, कुल 170 में से

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पृष्ठ 91

ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता ८९
अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि उपस्थानस्य लक्षणम् ।
उपस्थितो हि न्यायेन १व्रतादेशनमर्हति ॥ ३ ॥
इसके अनन्तर उस मनुष्य को किस प्रकार उन ब्राह्मणों के पास
जाना चाहिए, यह मैं कहता हूँ । पुरुष को उचित प्रकार से विनय एवं
न्यायपूर्वक विद्वानों के पास जाना चाहिए । तभी वह व्रतादेश का
अधिकारी होता है ॥३॥
सद्यो निःसंशये पापे न भुञ्जीताऽनुपस्थितः ।
भुञ्जानो वर्धयेत् पापं पर्षद्यत्र न विद्यते ॥ ४ ॥
यदि यह निश्चय हो जाय कि मैंने पाप कर दिया है तो उसे
विद्वत्-परिषद् में बिना निवेदन किये हुए भोजन नहीं करना चाहिए ।
क्योंकि पाप के अनन्तर परिषद् में बिना निवेदन किये भोजन कर
लेने पर पाप बढ़ जाता है ॥४॥
संशये तु न भोक्तव्यं यावत्कार्यविनिश्चयः ।
प्रमादश्च न कर्तव्यो यथैवासंशयस्तथा ॥ ५ ॥
यदि पाप में कोई सन्देह हो गया हो तो भी जब तक उसका
निश्चय न हो जाय तब तक भोजन नहीं करना चाहिए । इस विषय
में सर्वप्रथम यही कर्तव्य है कि जिससे सन्देह दूर हो ॥५॥
कृत्वा पापं न गूहेत गुह्यमानं विवर्द्धते ।
स्वल्पं वाऽथ प्रभूतं वा धर्मविद्भ्यो निवेदयेत् ॥ ६ ॥
पुरुष को उचित है कि वह पाप करने पर उसे न छिपावे । क्योंकि
छिपाया हुआ पाप बढ़ता है । पाप चाहे थोड़ा हो अथवा अधिक हो
सर्वप्रथम धर्मवेत्ता से उसको निवेदन कर देना उचित है ॥६॥
१, 'व्रतादेशं समर्हति' इति पाठान्तरम् ।