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पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

Padmavat with Hindi Commentary

मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा

DevanagariAwadhipublished318 पृष्ठ

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पृष्ठ 94

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पद्मावत । ६३

अब जो सूर¹ अहे शशिर राता। आये चढ़ सुगगन³ पुनि साता॥
लिखंसो बात सखिन सो कही। यही ठांवे हों बरिते रही॥
परगट हों तो होय असभंगू। जगत दियांकर होय पतंगू॥
दो० जासों चख हेरों१०, सोई ठांव जिव देय।
यह दुख कतहूँ न निसरौं, को हत्या अस लेय॥
कीन्ह पयान सबहिं रथ हांका। पर्वत छांड़ सिंहलगढ़ ताका॥
बलि¹² भये सबै देवता बैली। हत्यारिन हत्या लै चली॥
को असहितू मुवे गहि बाँहीं। जोपै जिय आपन तन नाहीं॥
जौलह जिव आपन सब कोई। बिन जिव कोइन आपन होई॥
भाई बन्धु औ मीत¹³ पियारा। बिन जिव घड़ी न राखै पाराँ॥
बिन जिव पिण्डैं छोर कर कूरा। छार मिलावै सो हित पूरा॥
तेहि जिव बिना अमर भा राजा। को उठि बैठि करब सो काजा॥
दो० परिकायौ भुइँ लोटै, कहारे जिव बलिभीव।
को उठाय बैठारे, बाजै पियारे जीव॥
पद्मावत सो मंदिर पैठी। हँसत जाय सिंहासन बैठी॥
निशें सोती मुनि कथा वहारी। भा बिहान सब सखी हँकारी॥
देवपूज जस आयों काली। स्वप्न एक निश देख्यों आली॥
जनु शेशि उदय पूर्वदिश लीन्हा। औरवि२६ उदय पश्चिम दिश कीन्हा॥
पुनि चलि सूर चांद पहँ आवा। चांद सूर्य दुहुँ भयो भिरावों॥
दिन औ रात जानहु भय एका। राम आय रावण गढ़ छेका॥

सूर्य १-२६ चांद अर्थात् रात को आधे २ आसमान अर्थात् क़िला ३ जगह
४ बच्चे ५ ज़ाहिर ६ नुक़सान ७ दुनियां ८ पांखी ६ आंख से देखों १० कूच
११ क़ुर्बान १२ ज़बरदस्त १३ दोस्त १४-१६-२० मरे की बांह पकड़े १५ रख
नहीं सक्ता १७ वदन १८-२१ राख १६ पहुँचना २२ रात २३ बुलाया २४
चांद २५ मुलाक़ात २७ ॥